भोर
काव्य साहित्य | कविता डॉ. अनुराधा प्रियदर्शिनी15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
नव भोर हुई किरणें बिखरी।
बुझती तब है घर की ढिबरी।
वह मद्धिम लौ निशि में जलती।
करती उजियार सदा रहती॥
जब वो जलती अँधियार छँटे।
मन आस रहे तम रैन मिटे।
शुभ दीप हिया जब भी जलते।
तब सुंदर जीवन वो करते॥
कलियाँ चटकीं नव पुष्प खिलें।
खग वृंद सभी दिल देख मिलें॥
सुख से रहते सब साथ जहाँ।
शुभता करती नित वास वहाँ॥
यह जीवन है किस अर्थ बता।
ख़ुद की पहचान ख़ुदी करता॥
सुख शान्ति मन विश्वास जगा॥
नभ स्वर्णिम रोज़ विहान पगा॥
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डॉ दिनेश पाठक शशि 2026/01/08 03:34 PM
डॉ अनुराधा प्रियदर्शिनी जी की उत्तम रचना। हार्दिक बधाई।