बासंती सी पवन चलती
काव्य साहित्य | कविता डॉ. अनुराधा प्रियदर्शिनी15 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
बासन्ती सी, पवन चलती, क्यारियाँ हैं बुलातीं।
खेतों में जो, फ़सल पकती, स्वर्ण सी है लुभाती॥
मिट्टी में है, कनक उपजा, देखता है ज़माना।
बाग़ों में है, मधुर सुन लो, कोकिला का तराना॥
साँसों की जो, स्वर लहरियाँ, आप ही को सँवारें।
शोभा भारी, हरित धरणी, प्यार के हैं नज़ारे॥
माता देखो, हर दिन यहाँ, ले रही है बलाएँ।
आओ देखो, चमन महका, छा गई हैं घटाएँ॥
गाना गाएँ, कृषक ख़ुश हो, स्वप्न साजे सुहाने।
आओ देखो, सरल मन से, वो भरेंगे ख़जाने॥
आते सारे, मिल-जुल चलें, देख लो ये क़तारें।
झूमे सारी, सुरभि घुलती, प्यार की हैं बहारें॥
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
बाल साहित्य कहानी
गीत-नवगीत
बात-चीत
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं