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क्या करूँ कोई मुझे जमता नहीं

2122   2122     212


क्या करूँ कोई मुझे जमता नहीं
और तू भी तो मिरा अपना नहीं
 
जा तुझे आज़ाद मैंने कर दिया 
फिर न कहना बाँधना अच्छा नहीं 
 
देखने भर की यहाँ हैं महफ़िलें
कारवाँ में जो है क्या तन्हा नहीं 
 
आपकी मरज़ी है जो चाहें कहें
मैं कभी इतना हुआ सस्ता नहीं
 
काम ही कुछ इश्क़ जैसा हो गया 
किस ज़बाँ पर अब मिरा चर्चा नहीं
 
ज़िंदगी की आज तुमको है क़सम
मौत से पहले कभी मरना नहीं
 
इक समंदर आँख में भी रख लिया
रोज़ तो रहती यहाँ बरखा नहीं

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