अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

तेरे जन्म के साथ मेरा भी नया जन्म हुआ

तेरे जन्म के साथ मेरा भी नया जन्म हुआ
एक नन्ही परी मेरे आँचल में आई
जिसके चेहरे में कहकशाँ की झलक पाई
वो लम्हा लम्हा पल पल मेरा जहान होती चली गई
पापा की परी भैया की भावना 
मम्मी की मुस्कान होती चली गई
और इस दौरान
तुम्हें मैंने हर इक तासीर में बहना सिखाया है
बदलते वक़्त की रफ़्तार से चलना सिखाया है
तहज़ीब वफ़ा और प्यार के
साँचे में ढलना सिखाया है
इल्म-ओ-हुनर से रोशनी करना सिखाया है
तू है मेरे चमन की फिज़ाओं में 
शामिल बहार बन कर
तू है घर की रौनक़ 
सावन का झूला, राखी का धागा
ख़ुशियों का त्यौहार बन कर
अब लाड़ली मेरी 
नए रिश्तों की वीणा के 
तारों की मधुर झंकार होगी
तेरी सिफ़त से तेरी शफ़क से 
प्यार की दौलत बेशुमार होगी
इसी प्यार इसी तालीम इसी तरबियत के साथ
आज मेरी लाडो के
नया घर नई दुनियाँ नए सपने हैं आँखों में
मेरी नूर ए नज़र चली है ससुराल 
नम आँखें हैं मगर हो गए निहाल
मेरे आँगन में बचपन अपना छोड़कर
पिया से अब दिल का रिश्ता जोड़कर
दादा-नाना चाचा चाची मामा मामी भैया भाभी 
जीजी जीजा की लाख दुआएँ लेती जा 
जश्न-ए-शादी और विदाई का दस्तूर पुराना है 
मम्मी पापा और भैया को ये रस्म निभाना है
हम हमेशा रहेंगे तेरे और अब तुम्हें पिया का घर अपनाना है

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

1984 का पंजाब
|

शाम ढले अक्सर ज़ुल्म के साये को छत से उतरते…

 हम उठे तो जग उठा
|

हम उठे तो जग उठा, सो गए तो रात है, लगता…

अंगारे गीले राख से
|

वो जो बिछे थे हर तरफ़  काँटे मिरी राहों…

अच्छा लगा
|

तेरा ज़िंदगी में आना, अच्छा लगा  हँसना,…

टिप्पणियाँ

Neera 2022/08/14 02:13 AM

bahut khoob ,dil se nikli hai daad ,kubool karein.

Keshav Srivastava 2022/05/31 03:14 PM

Very touching and honest words. Nicely written

pushkar 2022/05/31 11:51 AM

Bahaut hi sundar lafz. Kamaal.

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

ग़ज़ल

नज़्म

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं