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प्रतीक्षा

खुलती आँख जब सुबह की,
जाग कर आ जाती गौरैया
आदतन मुँडेर पर,
हालाँकि जानती है वो, नहीं रहा नीड़
अब वहाँ उसका
जहाँ कभी पला था उसका वंश,
फिर भी फुदकती मन ले आस
खोए हुए ढूँढ़ती, होती हताश
डाल-डाल घूमती
मिश्री सी घोलकर
उन बीते दिनों की याद दिलाती
जब सारा ही आँगन गूँजता था
साँझ तलक निर्भय वा आश्वस्त
गौरैयाओं से– चुगतीं ‘कनी नन्ही’
चोंचें छोटी सी,
लौटती जब घर, देखती दृश्य
रोज़ मनमोहक
झुण्ड का झुण्ड करता था प्रतीक्षा
मेरे आने की, टँगा बरामदे की जाली पर
मानों हों सीपें
भूरी –सफ़ेद, नीली साड़ी पर
सभी सुंदर,सुघड़ और तराशी।
 
बीते हैं वर्ष पर शेष हैं
वे ही स्मृतियाँ, लुभाती थीं जो
मन, लगाव – भरा।
 
खींच कर लायी हैं शायद
वे ही यादें पुरानी कि तभी
भुला दूरियाँ, चीर कर कोहरा
नन्हा सा जोड़ा चूँ–चूँ करता मानो
प्यार से पुचकारता (शायद), आया
और —
कल फिर लौटने का वायदा कर
लम्बी–ऊँची–चौड़ी मुँडेर पर
नेह भरे रिश्तों की ख़ामोश गरमाहट छोड़
फुर्र से उड़ गया . . . जाते-जाते
मुझे, मेरे चारों ओर फैले नये–पुराने
मूक–वाचाल अपने सभी सुखद
एहसासों से बाँध गया।
उन्हीं एहसासों की डोर से बँधी, आज भी
उसके लौट आने की प्रतीक्षा कर रही हूँ . . .

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