आख़िरी फ़ैसला
कथा साहित्य | कहानी ज्योत्स्ना मिश्रा ‘सना’15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
माइक से गूँजती शहनाई की मधुर धुन और आँगन में बैठी महिलाओं के हँसी-ठहाकों के बीच भी शैलजा का मन किसी अनजानी उदासी से घिरा हुआ था। घर उत्सव के रंग में डूबा था, पर उसके भीतर जैसे कोई गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। तभी बड़ी भाभी की चुटीली आवाज़ ने उसकी तंद्रा तोड़ी, “कहाँ खोई हो, ननद रानी? बहू के आने पर तो लोग ख़ुशी से फूले नहीं समाते, और आप हो कि जाने किस सोच में डूबी बैठी हो!” उन्होंने मुस्कराते हुए उसकी कोहनी में हल्की-सी चुटकी ली तो आसपास बैठी सभी महिलाएँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
शैलजा भी होंठों पर मुस्कान ले आई, पर वह मुस्कान सिर्फ़ उसके चेहरे तक सीमित थी, आँखों तक पहुँचने का रास्ता जैसे भूल गई थी। इसी हँसी-मज़ाक के बीच बाहर से किसी ने उत्साह भरी आवाज़ लगाई, “लगता है बारात दुल्हन को लेकर आ गई!”
“शैलजा, चलो, बहू के स्वागत की तैयारी कर लो,” बड़ी जेठानी ने कहा।
“सब कुछ तैयार है, जीजी। बस आरती की थाल लेकर द्वार पर रख देती हूँ।” इतना कहकर शैलजा भीतर चली गई।
आज उसका आशु अपनी दुल्हन सुलेखा को ब्याहकर घर ला रहा था। एक माँ के रूप में उसके सभी कर्तव्य आज पूर्ण हो रहे थे। उसने अपने बेटे को जन्म दिया, पाला-पोसा, उसके हर सुख-दुःख में साथ खड़ी रही, और आज उसे उसके जीवनसाथी के साथ नई राह पर भेज रही थी। बस, यही वह दिन था जिसका वह वर्षों से इंतज़ार कर रही थी। अब उसे अपने आख़िरी फ़ैसले को अमल में लाने से कोई नहीं रोक सकता था।
कार पहले ही द्वार पर तैयार खड़ी थी। लेकिन उससे पहले उसे अपनी बहू का स्वागत करना था, बेटे की ख़ुशियों में शामिल होना था और अपने चेहरे पर वही सहज मुस्कान बनाए रखनी थी, जिससे किसी को उसके मन का तूफ़ान दिखाई न दे। स्वागत की रस्में पूरी होने के बाद उसने अपनी भतीजियों से कहा, “तिथी, शुभ्रा, भाभी को उनके कमरे तक ले जाओ। रात भर की जागी हुई है, थोड़ा आराम कर लेगी। दो बजे तक पंडित जी आ जाएँगे, फिर उसे पूजा में बैठना होगा।” फिर उसने आशु की ओर मुड़कर कहा, “और तू मेरे कमरे में जाकर थोड़ा आराम कर ले। पूजा से पहले अपने कमरे में नहीं जाना है। तेरे कपड़े वहीं रखे हैं। बदलकर सो जा, और नहाना हो तो नहा भी लेना।”
आशु हमेशा की तरह उसके गले में बाँहें डालकर बोला, “जैसा आप कहो, ममा।”
तभी शैलजा की छोटी बहन मुस्कराकर बोली, “अरे वाह! शादी हो गई है, अब तो माँ का पल्लू छोड़ दो जनाब।”
आशु तुरंत तुनक गया, “क्यों? शादी हो जाने पर माँ, माँ नहीं रहती? ग़ैर हो जाती है क्या?” उसकी बात सुनकर पूरा घर ठहाकों से गूँज उठा।
कुछ देर बाद सभी अपने-अपने कामों में लग गए। तभी रसोइया आकर बोला, “भाभी जी, दोपहर का खाना तैयार है। कहें तो परोस दूँ?”
“नहीं,” शैलजा ने धीरे से कहा, “एक बजे के बाद लगाना। अभी कोई नहीं खाएगा। और कल की तरह नीचे वाले कमरे में ही खाने का इंतज़ाम कर देना।”
फिर उसने अपनी छोटी भाभी और बहन की ओर देखकर कहा, “तुम दोनों अपने जीजाजी को कुछ फल वगैरह दे देना। पूजा पूरी होने तक वे कुछ नहीं खाएँगे।”
तभी छोटी भाभी ने शरारत से कहा, “ओहो! जीजाजी की इतनी चिंता! क्या बात है, अब भी इश्क़ कम नहीं हुआ!” सब हँस पड़े। शैलजा भी मुस्करा दी, लेकिन उसके मन में एक टीस उठी। शायद यह वही इश्क़ था जो उसने जीवन भर निभाया था, मगर बदले में कभी पूरी तरह पाया नहीं था।
दो बजे से पहले ही पंडित जी आ पहुँचे, “बिटिया, सारी तैयारियाँ हो गईं?” उन्होंने पूछा।
“जी, सब तैयार है,” शैलजा ने सिर हिलाकर कहा।
“तो फिर बेटे-बहू को नए वस्त्र पहनकर बुला लीजिए। शुभ मुहूर्त निकल रहा है।”
पूजा शुरू हुई और समाप्त होते-होते शाम के चार बज गए। अब रात के रिसेप्शन की तैयारियाँ शुरू होनी थीं। सब लोग अपनी-अपनी भागदौड़ में लग गए, लेकिन शैलजा चुपचाप पूजा घर में जाकर बैठ गई। सामने विराजमान जगन्नाथ जी को निहारते हुए उसने हाथ जोड़ लिए। उसकी आँखें मूर्ति पर थीं, पर मन किसी और ही संघर्ष से गुज़र रहा था। मन ही मन उसने कहा, “प्रभु, आज तक मैंने जो भी किया, सबकी खुशी के लिए किया। आज पहली बार अपने लिए एक निर्णय लिया है। बस . . . इस आख़िरी फ़ैसले में मेरा साथ दीजिए।”
उसी समय पायल और चूड़ियों की खनक सुनाई दी। उसने पलटकर देखा तो शुभ्रा और सुलेखा उसके पीछे खड़ी थीं। सुलेखा ने आगे बढ़कर नींबू-पानी का गिलास उसकी ओर बढ़ाया, “मम्मी जी, इसे पी लीजिए। मौसी जी कह रही थीं कि आपने सुबह से कुछ नहीं खाया।”
शैलजा ने स्नेह से अपनी बहू को देखा। उसकी आँखों में अपनापन था, सम्मान था, और वह मासूम प्रेम था जो किसी नए रिश्ते की शुरुआत में होता है। उसके मन में एक विचार कौंधा— ‘मेरे आशु की पसंद सचमुच बहुत अच्छी है।’ लेकिन अगले ही पल एक दूसरा विचार उसके दिल को चीर गया— ‘मेरे फ़ैसले का सबसे बड़ा असर शायद इसी बच्ची पर पड़ेगा . . .’ उसने गहरी साँस ली और उस ख़याल को मन से झटक दिया। फिर शुभ्रा से बोली, “तुम और तिथी, भैया-भाभी को लेकर ब्यूटी पार्लर चले जाओ। वहाँ से सीधे होटल पहुँच जाना।”
“जी, बड़ी माँ,” शुभ्रा ने मुस्कराकर कहा और सुलेखा को साथ लेकर बाहर चली गई। उनके जाते ही शैलजा की नज़र फिर जगन्नाथ जी पर टिक गई। पूजा घर में अब केवल वह थी, उसकी ख़ामोशी थी, और वह निर्णय . . . जो शायद उसकी पूरी ज़िंदगी बदल देने वाला था।
क्रमशः रात को रिसेप्शन से लौटते-लौटते साढ़े ग्यारह बज चुके थे। दिनभर की भागदौड़ और थकान के कारण घर के सभी लोग अपने-अपने कमरों में जाकर सो गए, लेकिन शैलजा की आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। वह अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी देर तक अँधेरे आकाश को निहारती रही।
‘सुबह बेटा-बहू हनीमून के लिए निकल जाएँगे . . .’ यह सोचते ही उसके होठों पर एक फीकी-सी मुस्कान उभरी और फिर जाने कितनी यादें उसके मन में उमड़ने लगीं। और फिर . . .
पूरा एक सप्ताह बीत गया। आशु और सुलेखा हनीमून से लौटकर घर पहुँचे। दोनों मुख्य द्वार पर खड़े लगातार घंटी बजा रहे थे, लेकिन आश्चर्य की बात थी कि अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही थी। आशु को कुछ अजीब-सा लगा। उसकी मम्मा तो रोज़ सबसे पहले उठ जाती थीं। सूरज की पहली किरण के साथ आँगन बुहारतीं, द्वार पर सुंदर अल्पना बनातीं और फिर पूजा घर में चली जातीं। लेकिन आज न आँगन साफ़ था, न अल्पना बनी थी और न ही घर में वह परिचित चहल-पहल थी। काफ़ी देर इंतज़ार करने के बाद उसने गमले के नीचे रखी अतिरिक्त चाबी निकाली और दरवाज़ा खोल दिया। दोनों जैसे ही अंदर पहुँचे, सामने से विश्वजीत अपने कमरे से बाहर आते दिखाई दिए। उनींदी आँखें मलते हुए उन्होंने आश्चर्य से पूछा, “अरे! तुम दोनों आ गए? बड़ी जल्दी लौट आए!”
“हाँ, पापा,” आशु ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।
सुलेखा ने तुरंत पूछा, “मम्मा कहाँ हैं, पापा?”
विश्वजीत ने लापरवाही से कहा, “वहीं होंगी पूजा घर में। अपने जगन्नाथ जी की सेवा में लगी होंगी।”
यह सुनते ही आशु और सुलेखा लगभग दौड़ते हुए पूजा घर की ओर बढ़ गए। लेकिन वहाँ पहुँचकर दोनों ठिठक गए। पूजा घर में जगन्नाथ जी तो विराजमान थे, मगर शैलजा कहीं नहीं थी। चारों ओर एक अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ था।
आशु अंदर जाने ही वाला था कि सुलेखा ने उसका हाथ पकड़ लिया।, “पहले स्नान कर लेते हैं। फिर पूजा घर में आएँगे।”
आशु ने चुपचाप सिर हिला दिया। दोनों वापस नीचे आ गए। उन्हें लौटते देख विश्वजीत ने कुछ खीझते हुए पूछा, “क्या हुआ? मिल आईं अपनी मम्मा से?”
आशु कुछ नहीं बोला, लेकिन सुलेखा ने धीमे स्वर में कहा, “मम्मा वहाँ नहीं हैं, पापा।”
“तो किसी मंदिर में गई होंगी,” विश्वजीत झुंझलाकर बोले, “घर में कब टिकती हैं वो!” उनकी आवाज़ में वही पुरानी उपेक्षा थी, जिसे सुनकर आशु के मन में हल्की-सी बेचैनी उठी। कुछ देर बाद दोनों अपने कमरे में चले गए।
“तुम पहले नहा लो, सुलेखा,” आशु ने कहा, “फिर चाय बना लेना। तब तक मैं भी तैयार हो जाता हूँ।”
सुलेखा हामी भरकर बाथरूम में चली गई। चाय पीने के बाद आशु ने इशारे से उसे फिर पूजा घर की ओर बुलाया। इस बार दोनों ने ध्यान से चारों तरफ़ देखा। आज पूजा घर की सफ़ाई नहीं हुई थी। दीयों की जगह धूल जमी थी, फूल मुरझा चुके थे और अगरबत्ती की राख वैसे ही पड़ी थी। यह दृश्य देखकर दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। शैलजा के रहते ऐसा कभी नहीं हुआ था। दोनों ने मिलकर पूजा घर की सफ़ाई की, ताज़े फूल चढ़ाए और पूजा संपन्न की। तभी सुलेखा की नज़र जगन्नाथ जी के चरणों के पास रखे तीन लिफ़ाफ़ों पर पड़ी। उसने झुककर उन्हें उठाया। एक लिफ़ाफ़े पर स्पष्ट अक्षरों में ‘आशु’ लिखा था। दूसरे पर ‘सुलेखा’। लेकिन तीसरे लिफ़ाफ़े पर कोई नाम नहीं था—सिर्फ़़ एक बड़ा-सा प्रश्नचिह्न बना हुआ था।
“आशु, देखो . . . ” उसने तीनों लिफ़ाफ़े उसकी ओर बढ़ा दिए।
आशु ने जैसे ही लिखावट देखी, उसका चेहरा बदल गया। “यह . . . यह तो मम्मा की लिखाई है!” उसकी आवाज़ काँप उठी।
“लेकिन . . . उन्होंने ख़त क्यों लिखे? और यह तीसरा ख़त किसके लिए है?” सुलेखा ने उत्सुकता और आशंका से कहा, “खोलो न . . . देखते हैं क्या लिखा है।”
आशु कुछ क्षण सोचता रहा, फिर बोला, “चलो यहाँ से चलते हैं। वैसे भी मम्मा को पूजा घर में ज़्यादा देर बैठना पसंद नहीं था।” दोनों लिफ़ाफ़े लेकर लिविंग रूम में आ गए।
सुलेखा ने फिर विश्वजीत से पूछा, “पापा, सच-सच बताइए . . . मम्मा कहाँ हैं?” विश्वजीत ने कोई उत्तर नहीं दिया। उनकी चुप्पी कमरे में और भारी हो गई। तब सुलेखा ने आशु की ओर देखते हुए कहा, “तुम ख़त पढ़ो। शायद मम्मा के बारे में कुछ पता चल जाए।”
“ख़त?” विश्वजीत चौंक पड़े। “कैसा ख़त?”
“पूजा घर में जगन्नाथ जी के चरणों के पास रखे मिले हैं,” आशु ने बताया। “एक मेरे नाम है, एक सुलेखा के नाम . . . और तीसरे पर सिर्फ़़ एक प्रश्नचिह्न बना हुआ है।”
सुलेखा ने धीमे स्वर में कहा, “शायद हमारे ख़त पढ़ने के बाद समझ में आ जाए कि तीसरा ख़त किसके लिए है।”
आशु ने गहरी साँस ली, “हो सकता है . . . तुम ठीक कह रही हो।”
कमरे में एक अजीब-सी बेचैनी फैल गई। सबकी निगाहें उस लिफ़ाफ़े पर टिक गईं, जो आशु के हाथों में था। काँपते हाथों से उसने उसे खोला। अंदर रखे पत्र को बाहर निकाला। कुछ क्षण वह सिर्फ़़ लिखावट को देखता रहा। फिर पढ़ना शुरू किया— “प्रिय आशु, जब तुम यह पत्र पढ़ रहे होगे, तब तक मैं यह घर हमेशा के लिए छोड़ चुकी होऊँगी . . .” बस इतना पढ़ना था कि आशु के हाथ से पत्र फिसलकर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। सुलेखा अवाक् खड़ी रह गई। विश्वजीत की आँखें भी अविश्वास से फैल गईं। कुछ पल के लिए कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया, मानो समय ही ठहर गया हो। तीनों एक-दूसरे को देख रहे थे—किंकर्तव्यविमूढ़, स्तब्ध और भयभीत। क्योंकि अब उन्हें पहली बार एहसास हुआ था कि शैलजा सचमुच जा चुकी थी . . .
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“प्रिय आशु, जब यह पत्र तुम्हारे हाथों में होगा, तब तक मैं इस घर की चौखट, इन दीवारों और उन सभी रिश्तों से बहुत दूर जा चुकी होऊँगी, जिनके बीच रहकर मैंने अपनी पूरी उम्र बिता दी। मुझे पता है, यह पत्र पढ़ते समय तुम्हारे मन में अनेक प्रश्न उठेंगे। शायद तुम मुझे ढूँढ़ने निकल पड़ो, शायद मेरे इस निर्णय पर क्रोधित हो जाओ, शायद यह सोचो कि तुम्हारी माँ तुम्हें छोड़कर कैसे जा सकती है? पर आज, जीवन में पहली बार, मैं तुमसे एक आग्रह करती हूँ—कृपया मुझे सुन लेना। सिर्फ़ अपनी माँ की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी स्त्री की तरह, जिसकी आवाज़ वर्षों तक उसी घर में दबती रही, जिसे उसने अपना संसार माना था। बेटा, जिस दिन तुमने जन्म लिया था, उस दिन मुझे लगा था कि ईश्वर ने मेरे जीवन की सारी रिक्तताएँ भर दी हैं। तुम्हारी नन्ही उँगलियों को अपनी हथेली में थामकर मैंने अपने सारे दुःख, सारे अभाव भुला दिए थे। तुम्हारी पहली मुस्कान में मेरी सुबह बसती थी, तुम्हारे पहले क़दमों में मेरी उम्मीदें चलती थीं और तुम्हारे पहले शब्द में मेरी पूरी दुनिया धड़कती थी। लेकिन तुम्हें कभी यह नहीं पता चला कि तुम्हें हँसना सिखाने वाली तुम्हारी माँ कितनी रातें तकिए में मुँह छिपाकर रोती रही। तुम्हारे पापा इस घर में थे, पर मेरे जीवन में कभी नहीं थे। लोग कहते हैं कि पति-पत्नी जीवनरूपी रथ के दो पहिए होते हैं, पर मेरा रथ वर्षों तक एक ही पहिए पर घिसटता रहा। मैंने साथ का सपना देखा था, पर मुझे सिर्फ़ ज़िम्मेदारियाँ मिलीं। मैंने एक हमसफ़र चाहा था, पर मुझे केवल एक सहयात्री भी न मिल सका। जब भी मैं बीमार पड़ी, तब अपनी दवा लेने भी स्वयं गई। जब मन बिखर गया, तब अपने आँसू भी स्वयं पोंछे। जब कोई छोटी-सी ख़ुशी मिली, तब उसे बाँटने के लिए भी कोई कंधा नहीं मिला। तुमने शायद हमेशा हमारे बीच की ख़ामोशी को महसूस किया होगा, पर तुमने कभी सवाल नहीं किया। और इसके लिए मैं तुम्हें दोष नहीं देती। यह तुम्हारी संवेदनशीलता थी कि तुमने उस दर्द को कुरेदना नहीं चाहा, जिसे मैं मुस्कुराहटों के पीछे छिपाती रही। मेरे बच्चे, मैंने जीवन से कभी बहुत कुछ नहीं माँगा था। बस इतना चाहती थी कि दिनभर की थकान के बाद कोई एक बार पूछ ले— ‘कैसी हो?’ लेकिन यह प्रश्न मेरे हिस्से कभी नहीं आया। तुम्हारे बचपन में मैंने अपने हर घाव पर मुस्कान का परदा डाल दिया। तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारे सपने, तुम्हारी छोटी-छोटी इच्छाएँ पूरी करने के लिए मैंने अपनी हर इच्छा को चुपचाप दफ़ना दिया। नौकरी की, घर सँभाला, रिश्ते निभाए, और यह सुनिश्चित किया कि तुम्हें कभी यह महसूस न हो कि तुम्हारी माँ भीतर से कितनी अकेली है। याद है तुम्हें, जब तुम्हें डेंगू हुआ था? पूरी रात मैं तुम्हारे सिरहाने बैठी रही थी। तुम्हारे माथे पर पट्टियाँ रखती रही, तुम्हारा हाथ थामे रही। उस रात मुझे भी तेज़ बुखार था, पर मेरी पेशानी पर हाथ रखने वाला कोई नहीं था। तुम्हारे लिए मैं माँ थी, पर मेरे लिए कौन था, बेटा? तुम्हारे पिता के साथ मैंने एक घर साझा किया, लेकिन कभी जीवन नहीं। मैंने उनके साथ वर्षों बिताए, लेकिन कभी उनका साथ नहीं पाया। फिर भी मैं रुकी रही . . . क्योंकि तुम थे। तुम्हारे हर जन्मदिन पर केक बनाते हुए मैं अपनी उदासी भूल जाती थी। तुम्हारी हर परीक्षा से पहले मंदिर जाकर तुम्हारी सफलता की प्रार्थना करती थी। तुम्हारी हर उपलब्धि पर सबसे अधिक गर्व मुझे होता था। तुम्हारी ख़ुशियों की रोशनी में मैंने अपने जीवन के अँधेरे छिपा दिए। लेकिन आज, जब तुम्हारी पत्नी इस घर में आ गई है, जब तुम्हारे जीवन में तुम्हारा अपना साथी आ चुका है, तब पहली बार मुझे लगता है कि अब मैं निश्चिंत हो सकती हूँ। जाते-जाते तुमसे एक विनती है, बेटा। अपनी पत्नी को कभी वह अकेलापन मत देना जो मैंने जिया है। जब वह थकी हुई लगे, तो उससे पूछ लेना—‘तुम ठीक हो?’ जब उसकी आँखें नम हों, तो उसके आँसू पोंछ देना। जब वह चुप हो जाए, तो उसकी ख़ामोशी को सुन लेना। क्योंकि स्त्रियाँ एक दिन में नहीं टूटतीं। वे हर दिन थोड़ा-थोड़ा टूटती हैं—जब उनकी बातें अनसुनी रह जाती हैं, जब उनके त्याग को कर्तव्य समझ लिया जाता है, जब उनके प्रेम को स्वाभाविक मानकर उसकी क़द्र करना छोड़ दिया जाता है। जानते हो, कई बार मैं आईने के सामने खड़ी होकर ख़ुद से पूछती थी—‘मैं कौन हूँ?’ और हर बार मेरे पास कोई उत्तर नहीं होता था। मैं किसी की बेटी थी, किसी की पत्नी थी, किसी की माँ थी . . . पर मैं ‘मैं’ कब थी? शायद इसी प्रश्न ने मुझे यह साहस दिया कि मैं इस घर से बाहर निकलूँ और उस स्त्री को ढूँढ़ूँ, जो वर्षों पहले कहीं खो गई थी। मैं किसी से नाराज़ नहीं हूँ। मैं किसी को सज़ा नहीं दे रही। मैं किसी से बदला नहीं ले रही। मैं तो बस अपनी तलाश में निकली हूँ। बत्तीस वर्षों तक मैंने यह उम्मीद की कि कोई मेरे मन की आवाज़ सुन लेगा, कोई मेरे मौन को समझ लेगा। लेकिन अब मेरे भीतर इंतज़ार करने की ताक़त नहीं बची। मेरे जाने का शोक मत मनाना, आशु। शोक तो मुझे उस जीवन का है, जिसे मैंने जीने के बजाय केवल निभाया। अगर कभी मेरी याद आए, तो यह सोचकर मत रोना कि तुम्हारी माँ तुम्हें छोड़कर चली गई। यह सोचकर रो लेना कि एक स्त्री ने पूरी उम्र सबका सहारा बनकर बिताई, लेकिन जब उसे सहारे की जरूरत थी, तब उसके पास कोई नहीं था। तुम मेरे जीवन की सबसे सुंदर उपलब्धि हो। तुम्हें पालना, तुम्हें बढ़ते हुए देखना, तुम्हारी हर सफलता पर मुस्कुराना—यही मेरे जीवन का सबसे उजला अध्याय रहा है। ईश्वर करे तुम्हारा घर प्रेम से भरा रहे। तुम्हारी पत्नी कभी अपने ही घर में परायी महसूस न करे। और तुम कभी उस इंसान की उपेक्षा न करना, जो तुम्हें अपना सम्पूर्ण जीवन सौंप दे। और हाँ . . . जब कभी किसी मंदिर में दीप जलाओ, तो मेरे लिए केवल एक प्रार्थना कर देना—‘हे प्रभु, मेरी माँ को वहाँ वह सुकून देना, जिसकी तलाश में वह पूरी उम्र भटकती रही।’ यह पत्र लिखते हुए मेरी आँखों से आँसू बह रहे हैं, लेकिन वर्षों बाद मेरे मन में एक अजीब-सी शांति भी है। तुम्हारे लिए एक पत्र है, सुलेखा के लिए एक पत्र है, और एक तीसरा पत्र तुम्हारे पापा के लिए भी छोड़ रही हूँ, उस पर कोई नाम नहीं लिखा है। तुम्हारे माथे को आख़िरी बार चूमते हुए, तुम्हारे बचपन की हर याद को अपने सीने से लगाते हुए, और तुम्हें अपनी आख़िरी दुआओं में समेटते हुए— सदा तुम्हारी, माँ!
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प्रिय सुलेखा, मेरी बच्ची, जब यह पत्र तुम्हारे हाथों में आएगा, तब तक आशु का पत्र पढ़कर तुम्हें यह पता चल चुका होगा कि मैं इस घर से जा चुकी हूँ। शायद मेरे इस निर्णय ने तुम्हें दुःखी किया होगा। शायद तुम्हारे मन में यह विचार भी आया हो कि कहीं तुम्हारे आने के कारण तो मैंने यह घर नहीं छोड़ा। इसलिए यह पत्र लिख रही हूँ, ताकि तुम्हारे मन में ऐसा कोई अपराधबोध कभी जन्म न ले। मेरे जाने का कारण तुम नहीं हो, बेटी। सच तो यह है कि इस घर में कदम रखते ही तुम मुझे अपनी-सी लगने लगी थीं। जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा था, तब तुम्हें बहू नहीं, अपनी उस बेटी के रूप में देखा था जिसकी कमी मैंने जीवन भर महसूस की थी। तुम्हारी आँखों में मैंने सपने देखे थे—वैसे ही सपने, जैसे कभी मेरी आँखों में भी थे। एक ऐसा घर . . . जहाँ प्रेम हो। जहाँ अपनापन हो। जहाँ दिन भर की थकान के बाद कोई पूछे—‘कैसी हो?’ जहाँ किसी की चुप्पी भी सुनी जाए और किसी की मुस्कान के पीछे छिपे आँसू भी पहचान लिए जाएँ। लेकिन आज जब मैंने तुम्हें बेटी मान ही लिया है, तो अपने जीवन का वह सच भी तुम्हें बताना चाहती हूँ जिसे मैंने वर्षों तक अपने भीतर क़ैद रखा। जब मेरी शादी हुई थी, तब मैं भी हर लड़की की तरह ढेर सारे सपने लेकर इस घर में आई थी। मुझे लगता था कि मेरा पति केवल जीवनसाथी नहीं होगा, बल्कि मेरा सबसे अच्छा मित्र भी होगा। ऐसा मित्र, जिसके सामने मैं बिना किसी डर के अपने मन की हर बात कह सकूँगी। लेकिन समय के साथ मुझे समझ आ गया कि कुछ रिश्ते निभाए तो जाते हैं, पर जिए नहीं जाते। तुम्हारे ससुर बुरे इंसान नहीं हैं। उन्होंने कभी मेरे साथ कोई बड़ा अन्याय भी नहीं किया। लेकिन वे कभी मेरे अपने नहीं बन पाए। लेकिन तुम बेफ़िक्र रहो तुम्हें बहुत स्नेह करते हैं। वे एक अच्छे बेटे थे। अच्छे भाई थे। अच्छे मित्र थे। लेकिन मेरे साथी कभी नहीं बन सके। हमने एक ही छत के नीचे जीवन बिताया, मगर हमारे बीच वह निकटता कभी नहीं आई जिसमें दो लोग एक-दूसरे के मन तक पहुँच पाते हैं। धीरे-धीरे घर की ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती गईं। रिश्तों की माँगें बढ़ती गईं। और उन सबके बीच मेरी इच्छाएँ, मेरे सपने, मेरी पहचान . . . सब कहीं पीछे छूटते चले गए। कई रातें ऐसी थीं जब मैं तकिये में मुँह छिपाकर रोती थी और सुबह वही चेहरा मुस्कुराते हुए सबके लिए चाय बनाता था। कई बार मन करता था कि कोई बस एक बार पूछ ले—‘क्या हुआ?’ लेकिन वह प्रश्न कभी मेरे हिस्से नहीं आया। फिर आशु मेरे जीवन का केंद्र बन गया। उसकी हँसी में मैंने अपनी ख़ुशी ढूँढ़ ली। उसकी ज़रूरतों में मैंने अपने सपने भुला दिए। उसकी सफलताओं में मैंने अपनी जीत देखी। लेकिन बेटी, एक माँ भी आख़िर इंसान होती है। उसके भीतर भी एक स्त्री होती है। एक ऐसी स्त्री, जो प्रेम चाहती है . . . सम्मान चाहती है . . . साथ चाहती है . . . और सबसे बढ़कर, किसी के जीवन में महत्व चाहती है। आज स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं कि मैं थक गई हूँ। बहुत थक गई हूँ। उन वर्षों से थक गई हूँ जो मैंने अकेलेपन के साथ बिताए। उन मुस्कानों से थक गई हूँ जिन्हें मैंने सिर्फ़ दूसरों को तसल्ली देने के लिए ओढ़ रखा था। उन आँसुओं से थक गई हूँ जिन्हें मैंने हर बार पोंछकर यह जताया कि मैं मज़बूत हूँ। इसलिए मैंने निर्णय लिया है कि अपने जीवन के बचे हुए वर्षों को मैं अपने लिए जीऊँगी। शायद पहली बार . . . सिर्फ़ अपने लिए। लेकिन जाने से पहले तुमसे कुछ बातें कहना चाहती हूँ। उन्हें सलाह मत समझना, एक माँ की विरासत समझना। अपने पति से केवल उसकी सफलताओं की बातें मत करना। उसके डर भी सुनना। उसकी कमज़ोरियों को भी अपनाना। और उससे यह अपेक्षा भी रखना कि वह तुम्हारे मन की आवाज़ सुने। क्योंकि विवाह केवल एक घर साझा करने का नाम नहीं है। विवाह दो आत्माओं के बीच एक ऐसा पुल है, जिस पर दोनों को बराबर चलना पड़ता है। अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम्हारी बातों को महत्व नहीं दिया जा रहा, तो चुप मत हो जाना। अपनी बात कहना। अपना दुःख कहना। अपनी नाराज़गी कहना। क्योंकि चुप्पियाँ रिश्तों को बचाती हुई दिखाई देती हैं, लेकिन भीतर ही भीतर उन्हें खोखला करती रहती हैं। और मेरे आशु को भी यह सिखाना कि प्रेम केवल ज़िम्मेदारियाँ निभाने का नाम नहीं है। प्रेम वह है जब कोई बिना कहे तुम्हारी थकान पढ़ ले। जब कोई तुम्हारी मुस्कान के पीछे छिपा दर्द पहचान ले। जब कोई तुम्हारी ख़ामोशी को भी उतना ही महत्व दे जितना तुम्हारे शब्दों को। बेटी, मुझे जीवन भर एक बात का अफ़सोस रहेगा— मैं वह सम्मान और वह साथ नहीं पा सकी जिसकी हर स्त्री हक़दार होती है। लेकिन मेरी सबसे बड़ी कामना है कि तुम्हारी कहानी मेरी कहानी जैसी कभी न हो। तुम्हारे घर में कभी वह सन्नाटा न उतरे जिसने मेरे जीवन को भीतर से खाली कर दिया। तुम्हारी आँखों में कभी वह प्रतीक्षा न ठहरे जो वर्षों तक मेरी आँखों में ठहरी रही। और तुम्हारे मन में कभी यह प्रश्न न उठे—‘क्या मैं सचमुच किसी के लिए महत्वपूर्ण हूँ?’ अगर कभी मेरी याद आए, तो मुझे एक दुखी और अकेली स्त्री की तरह याद मत करना। मुझे उस औरत की तरह याद करना जिसने बहुत देर से सही, लेकिन एक दिन अपने अस्तित्व को चुनने का साहस कर लिया। और हाँ . . . अगर कभी जीवन तुम्हें अकेला महसूस कराए, अगर कभी तुम्हें लगे कि कोई तुम्हें नहीं समझ रहा, तो आईने के सामने खड़ी होकर ख़ुद से कहना—‘मैं महत्वपूर्ण हूँ। मेरी भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं। मेरे सपने महत्वपूर्ण हैं। और मैं प्रेम और सम्मान पाने के योग्य हूँ।’ क्योंकि यह बात समझने में मैंने अपनी आधी उम्र लगा दी। तुम्हारे लिए मेरे मन में हमेशा वही स्नेह रहेगा जो एक माँ के मन में अपनी बेटी के लिए होता है। ईश्वर करे तुम्हें वह प्रेम मिले जिसकी मैंने कामना की थी। वह सम्मान मिले जिसकी मैं प्रतीक्षा करती रही। और वह साथ मिले जिसकी कमी मेरे जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा बन गई। ढेर सारा प्यार, आशीर्वाद और अनगिनत शुभकामनाएँ। तुम्हारी सास नहीं, तुम्हारी दूसरी माँ, शैलजा।
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“जब आप यह पत्र पढ़ रहे होंगे, तब शायद पहली बार इस घर में सचमुच सन्नाटा होगा। वही सन्नाटा, जिसे मैं वर्षों से अपने भीतर लेकर जी रही थी। इस पत्र में आपके लिए कोई संबोधन नहीं लिखा है। न ‘प्रिय’, न ‘सुनो’, न कोई और रिश्ता। क्योंकि संबोधन वहाँ लिखे जाते हैं जहाँ रिश्तों में आत्मीयता बची हो। हमारे बीच तो बरसों से केवल साथ रहने की औपचारिकता थी। पति-पत्नी का रिश्ता काग़ज़ों पर था, घर की नेमप्लेट पर था, लोगों की नज़रों में था, मगर हमारे मनों के बीच कब का मर चुका था। इसलिए उस लिफ़ाफ़े पर मैंने केवल एक प्रश्नचिह्न बना दिया है। शायद वही हमारे रिश्ते का सबसे सटीक परिचय है। मैं जा रही हूँ। यह लिखते हुए मेरे हाथ काँप रहे हैं, क्योंकि इस घर को छोड़ना आसान नहीं है। यह घर केवल ईंट-पत्थरों से बना मकान नहीं है। इसकी हर दीवार में मेरी उम्र का एक हिस्सा क़ैद है। इस आँगन में मेरी हँसी भी गूँजती है और मेरे आँसू भी। इस रसोई में मेरी अनगिनत सुबहें दबी हैं, और इस कमरे की दीवारों में मेरी अनगिनत रातों की सिसकियाँ। याद है, जब मेरी विदाई हुई थी? माँ ने मेरे कान में धीरे से कहा था—‘बेटी, अब वही तुम्हारा घर है . . . और वही तुम्हारा अपना इंसान।’ मैंने उस बात पर आँख मूँदकर विश्वास कर लिया था। मैं अपने साथ सपनों से भरा एक संसार लाई थी। और आपको अपने मन के मंदिर में एक ऐसी प्रतिमा की तरह स्थापित कर लिया था, जिसे मैंने प्रेम, विश्वास और समर्पण से गढ़ा था। जानते हो, उस प्रतिमा में पहली दरार कब पड़ी थी? हमारी शादी की पहली रात। जब आपने बड़ी सहजता और बेरुख़ी से कहा था कि जब तक तुम्हारे प्रथम प्रेम का विवाह नहीं हो जाता, तब तक आप हमारे वैवाहिक जीवन की शुरुआत नहीं करोगे। उस क्षण मेरे भीतर कुछ टूट गया था। बहुत ज़ोर से। लेकिन मैंने अपने टूटे हुए मन को यह कहकर समझा लिया कि शायद यह किसी अधूरे प्रेम की पीड़ा है, जो समय के साथ भर जाएगी। मैंने इंतज़ार किया। आपके बदलने का। आपके अपनेपन का। आपके प्रेम का। लेकिन प्रतीक्षा के अलावा मेरे हिस्से कुछ नहीं आया। फिर वह दिन आया जब आपकी छोटी भाभी के पिता के निधन पर हम उनके मायके गए थे। वहाँ एक पुरोहित आए थे जो हाथ देखकर भविष्य बताते थे। आपने भी अपना हाथ आगे बढ़ाया था। और फिर हँसते हुए उनसे पूछा था—‘बताइए, हमारा तलाक़ कब होगा?’ फिर तुरंत हँसकर कह दिया था—‘अरे, मज़ाक कर रहा हूँ।’ सब लोग हँस पड़े थे। लेकिन उस दिन आपकी प्रतिमा में एक और गहरी दरार पड़ गई थी। और शायद हमारे रिश्ते में भी। क्योंकि कुछ मज़ाक केवल शब्द नहीं होते, वे मन की अनकही सच्चाइयाँ भी होते हैं। मैं अपना सब कुछ छोड़कर आपके पास आई थी। अपना घर। अपना बचपन। अपनी आदतें। अपने सपने। यहाँ तक कि अपना नाम तक। मैं आपकी पत्नी बन गई। आपके परिवार की बहू बन गई। आपके बेटे की माँ बन गई। बस . . . कभी आपकी साथी नहीं बन सकी। या शायद आपने मुझे बनने ही नहीं दिया। याद है शादी के शुरुआती दिन? मैं घंटों आपका इंतज़ार करती थी। सोचती थी, आज आप मुझसे बातें करोगे। आज मेरे दिन के बारे में पूछोगे। आज मेरे साथ बैठोगे। लेकिन आप घर आते, खाना खाते और सो जाते। मैं अगले दिन का इंतज़ार करती। फिर अगले दिन का। फिर अगले सप्ताह का। फिर अगले महीने का। और देखते ही देखते वह इंतज़ार वर्षों में बदल गया। मैं सिर्फ़ एक वाक्य सुनना चाहती थी—‘तुम कैसी हो?’ लेकिन वह प्रश्न कभी मेरे हिस्से नहीं आया। जानते हो, इंसान अकेले रहने से नहीं टूटता। वह तब टूटता है जब वह किसी के साथ रहते हुए भी अकेला महसूस करे। जब पूरी दुनिया उसे किसी की पत्नी समझे, लेकिन वह ख़ुद अपने जीवन में अजनबी बन जाए। जब पार्टियों में लोग मेरी तारीफ़ करते थे, तब आप अक्सर कहते—‘वो होती तो बात ही अलग होती . . .’ आपका अधूरा प्रेम हमारे बीच कभी मौजूद न होकर भी हमेशा मौजूद रहा। मैंने समझौता कर लिया था। सोचा था, शायद यही मेरी नियति है। लेकिन जिस दिन मुझे पता चला कि विवाह के सत्रह वर्ष बाद भी आप उसी अधूरे प्रेम से जुड़े हुए हो . . . उस दिन आपकी प्रतिमा पूरी तरह बिखर गई। मैं उस घटना का विवरण नहीं दूँगी। क्योंकि आपको कटघरे में खड़ा करना मेरा उद्देश्य नहीं है। बस इतना कहूँगी कि उस दिन के बाद मेरे भीतर आपके लिए जो अंतिम सम्मान बचा था, वह भी समाप्त हो गया। और उसी दिन से हमने अलग-अलग कमरों में रहना शुरू कर दिया। क्योंकि मैं किसी की बची हुई भावनाओं पर अपना जीवन नहीं बिता सकती थी। उस समय क्रोध में आपने मुझे घर छोड़कर चले जाने को कहा था। मैं जाना चाहती थी। सचमुच जाना चाहती थी। लेकिन आशु की ज़िम्मेदारी ने मेरे क़दम रोक लिए। मैं रुक गई। आपके लिए नहीं। अपने बेटे के लिए। जब आशु छोटा था, तब मेरे पास जीने का एक कारण था। उसकी हँसी में मैंने अपने आँसू छिपा लिए। उसके सपनों को पूरा करते-करते अपने सारे सपनों को भुला दिया। याद है, जब तुम्हारी नौकरी में संकट आया था? तुम महीनों तनाव में रहे थे। उसी समय हमारी वह बेटी, जो कभी इस दुनिया में आ नहीं सकी, मेरे भीतर पल रही थी। तुम्हें शायद याद भी न हो। लेकिन उन दिनों मैं हर रात भगवान से तुम्हारे लिए प्रार्थना करती थी। तुम्हारे डर को अपना डर समझती थी। तुम्हारी चिंता को अपनी चिंता। इसलिए मैंने भी नौकरी करनी शुरू कर दिया। लेकिन जब मुझे डर लगता था . . . मैं किसके पास जाती? जब मैं टूटती थी . . . मुझे कौन सँभालता? जब मैं रातों को रोती थी . . . मेरे आँसू कौन देखता? कितनी ही रातें मैंने तकिए में मुँह छिपाकर रोते-रोते गुज़ारी हैं। कितनी बार तेज़ बुखार में भी रसोई में खड़ी रही हूँ। कितनी बार मन सिर्फ़ इतना चाहता था कि कोई कह दे—‘आज तुम आराम कर लो।’ लेकिन मेरे हिस्से में केवल ज़िम्मेदारियाँ आईं। आपने मुझे चोटें तो बहुत दीं। पर सहारा कभी नहीं दिया। और यक़ीन मानो . . . सहारे की कमी, चोट से कहीं अधिक दर्द देती है। लोग कहते हैं, आप अच्छे पति थे। हाँ, शायद थे। याद है, जब आपकी बुआ के बड़े बेटे की मृत्यु हुई थी? लोग कहते थे कि घर में वर्षों से चल रहे सास-बहू के झगड़ों और मानसिक तनाव ने उनके दिल पर ऐसा बोझ डाला कि एक दिन हार्ट अटैक ने उनकी जान ले ली। उस दिन आपने बड़े गर्व से कहा था—‘मैं तो ऐसी बातों पर कभी ध्यान ही नहीं देता। घर में क्या कलह चल रही है, उससे ख़ुद को दूर रखता हूँ।’ आपकी बात सुनकर मैं चुप रह गई थी। क्योंकि आप यह भूल गए थे कि हमारे घर की कलह आप तक पहुँची ही कब थी? मैंने हमेशा उसे आपके दरवाज़े तक आने से पहले ही रोक लिया था। रिश्तों की दरारें, मनमुटाव, ताने, शिकायतें—सब अपने हिस्से में लेती रही। हर आग को अपने भीतर समेटती रही ताकि उसकी आँच आप तक न पहुँचे। लेकिन यह मैंने इसलिए नहीं किया था कि आपको दुःख होगा, या आप परेशान हो जाएँगे। सच तो यह है कि मैंने इसलिए किया क्योंकि मुझे पता था—आप सुनेंगे ही नहीं। मैंने कई बार चाहा कि आपके सामने बैठकर अपने मन का बोझ हल्का करूँ, आपको बताऊँ कि मैं किन परिस्थितियों से गुज़र रही हूँ। लेकिन हर बार आपके चेहरे की उदासीनता ने मेरे शब्दों को वापस मेरे भीतर ही लौटा दिया। धीरे-धीरे मैंने शिकायत करना छोड़ दिया, फिर उम्मीद करना छोड़ दिया, और अंत में बोलना ही छोड़ दिया। उस दिन जब आपने गर्व से कहा था कि ‘मैं घर की कलह पर ध्यान नहीं देता’, तब पहली बार मुझे लगा था कि शायद आपको इस बात का अंदाज़ा ही नहीं है कि आपके शांत जीवन की क़ीमत किसी और ने अपने भीतर तूफ़ान सँजोकर चुकाई है। आपने मुझे रहने को घर दिया। समाज में पत्नी का स्थान दिया। लेकिन वह नहीं दे सके जिसकी मुझे सबसे अधिक आवश्यकता थी—सम्मान, अपनापन और भावनात्मक साथ। जानते हो, मैंने अपने अधूरे सपनों का कभी शोक नहीं मनाया। अपनी खोई हुई जवानी का भी नहीं। मैंने शोक मनाया उस स्त्री का . . . जो धीरे-धीरे मेरे भीतर मरती चली गई। और जिसकी मृत्यु पर किसी ने आँसू तक नहीं बहाए। आज जब हमारा बेटा अपनी दुनिया में ख़ुश है . . . जब उसके जीवन में उसका अपना साथी आ चुका है . . . तब पहली बार मैंने ख़ुद से पूछा—‘क्या अब मेरे जीवन का कोई हिस्सा मेरे लिए भी बचा है?’ और शायद पहली बार मैंने अपने लिए उत्तर खोजने का निर्णय लिया। मैं इस घर से नहीं भाग रही। मैं उस जीवन से दूर जा रही हूँ जहाँ हर दिन मैं अपने अस्तित्व का एक टुकड़ा खोती रही। मुझे नहीं पता मेरे जाने के बाद तुम्हें मेरी कमी महसूस होगी या नहीं। शायद सुबह की चाय की। शायद समय पर रखे कपड़ों की। शायद उस आवाज़ की जो रोज़ पूछती थी—‘खाना खा लिया?’ लेकिन मैं चाहती हूँ कि एक बार . . . सिर्फ़ एक बार . . . आप उस स्त्री को याद करो जिसने बत्तीस वर्ष तुम्हारे साथ बिताए। जिसने आपके बच्चे को जन्म दिया। जिसने आपके घर को घर बनाया। जिसने कभी अपने हिस्से की ख़ुशियाँ नहीं माँगीं। और फिर भी अंत में ख़ाली हाथ रह गई। अगर कभी मेरी तस्वीर के सामने खड़े होना तो फूल मत चढ़ाना। बस एक बार अपने दिल पर हाथ रखकर कहना—‘मुझे माफ़ कर देना . . . मैं तुम्हारा अकेलापन कभी समझ नहीं पाया।’ शायद उस दिन मेरी सारी पीड़ा मिट जाएगी। मैं उस इंतज़ार को छोड़कर जा रही हूँ जो मैंने पूरी उम्र किया। उस आशा को छोड़कर जा रही हूँ जो कभी पूरी नहीं हुई। उस दर्द को छोड़कर जा रही हूँ जिसे मैंने मुस्कुराकर छिपाया। और उस लड़की को खोजने जा रही हूँ . . . जो एक दिन लाल जोड़े में तुम्हारे घर आई थी, लेकिन रास्ते में कहीं खो गई। आपकी कभी न कही गई बातें, मेरे कभी न सुने गए शब्द, और हमारे बीच पसरा वह अथाह सन्नाटा— शायद अब ईश्वर ही उन्हें समझ पाए। अंत में, ‘आपकी शैलजा’ भी नहीं लिखूँगी। क्योंकि ‘आपकी’ होने का अधिकार मुझे कभी मिला ही नहीं। क्यों? इस प्रश्न का उत्तर मैं नहीं दूँगी। यदि संभव हो, तो जीवन में पहली बार स्वयं ढूँढ़ने की कोशिश करना। — शैलजा
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