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मैं भी लिखूँगी

 

अगर कभी मौक़ा मिला मुझे, 
तो मैं काग़ज़ पर अपनी कहानी लिखूँगी, 
सिर्फ़ मुस्कान नहीं, उन लम्हों को भी, 
जब चुपचाप ख़ुद से हारती रही हूँगी। 
 
मज़बूत दिखती इन आँखों के पीछे, 
एक थकी सी औरत भी बसती है, 
जो हर “मैं ठीक हूँ” के पर्दे में, 
हज़ारों अनकही बातें रखती है। 
 
मैं लिखूँगी वो रातें भी, 
जब तकिया मेरा राज़दार था, 
जब आँसू तक आवाज़ न बन सके, 
और दर्द ही मेरा संसार था। 
 
नहीं लिखूँगी मैं सिर्फ़ जीत के क़िस्से, 
न ही सिर्फ़ हिम्मत की दास्तान, 
मैं तो उस हारी हुई मुस्कान को लिखूँगी, 
जिसमें छिपा था मेरा स्वाभिमान। 
 
मैं लिखूँगी अपने टूटने को भी, 
और हर बार फिर से जुड़ने को, 
उस औरत को जो गिरकर उठी, 
और सीखा ख़ुद को ख़ुद ही चुनने को। 

अगर लिखूँगी मैं कुछ भी, 
तो सच ही लिखूँगी हर बार, 
मैं अपनी ही कहानी में, 
ख़ुद को दूँगी एक नया आकार। 

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