लक्ष्मी का विरह
कथा साहित्य | कहानी ज्योत्स्ना मिश्रा ‘सना’15 Jul 2026 (अंक: 301, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
रथ चला . . .
शंख बजे, घंटियाँ बजीं, जयघोषों से आकाश भर उठा। जगन्नाथ अपने भाई-बहन के संग नगर की ओर निकल पड़े। भक्तों का सागर उमड़ पड़ा—किसी की आँखों में उत्सव था, किसी के हाथों में प्रार्थना, किसी के अधरों पर जय जगन्नाथ।
मैं भी उसी भीड़ में खड़ी थी।
पर न जाने क्यों, आज मेरा मन रथ के साथ नहीं गया।
वह लौट-लौटकर मंदिर की उस चौखट पर ठहरता रहा, जहाँ सबके चले जाने के बाद एक स्त्री अकेली खड़ी रह गई थी।
वह लक्ष्मी थीं।
सब प्रभु के जाने की कथा कह रहे थे, पर मेरा मन उस कथा के उस मौन पृष्ठ को पढ़ रहा था जिसे कोई नहीं पढ़ता।
पीछे रह जाने वालों की कथा।
प्रतीक्षा की कथा।
विरह की कथा।
मैं एक स्त्री हूँ।
जानती हूँ, किसी प्रिय को विदा करते समय हाथ तो सहज ही हिल जाते हैं, पर मन बहुत दूर तक उसके पीछे-पीछे चला जाता है।
जो चला जाता है, वह राहों में उलझ जाता है, नए दृश्यों में खो जाता है।
पर जो ठहर जाता है, उसके पास स्मृतियों के अतिरिक्त कुछ नहीं बचता।
वह उन्हीं स्मृतियों को ओढ़ता है, उन्हीं को बिछाता है, और उन्हीं के सहारे दिन काटता है।
शायद इसलिए आज मुझे जगन्नाथ से अधिक लक्ष्मी दिखाई दीं।
वे रूठी हुई नहीं लगीं।
सच्चा प्रेम रूठता नहीं, वह बस थोड़ा-सा मौन हो जाता है।
वह शिकायतों को शब्द नहीं देता, उन्हें दीपक की लौ में रख देता है।
वह द्वार बंद नहीं करता, और न ही प्रतीक्षा छोड़ता है।
बस चुपचाप बैठकर आहटों को सुनता रहता है।
मैं सोचती हूँ—
रात के उस अंतिम पहर में, जब मंदिर की दीवारें भी निद्रा में डूब जाती होंगी, जब धूप की सुगंध भी थककर बैठ जाती होगी, तब लक्ष्मी धीरे से प्रभु के रिक्त सिंहासन के पास जाती होंगी।
अपनी उँगलियों से उस आसन को छूती होंगी, जहाँ अभी कुछ दिन पहले तक उनके प्रिय विराजमान थे।
फिर शायद मुस्कुरा देती होंगी।
एक ऐसी मुस्कान, जिसमें शिकायत भी हो, स्मृति भी हो, और प्रेम भी।
“फिर चले गए . . .”
बस इतना ही।
और फिर उनकी पलकों पर एक बूँद ठहर जाती होगी।
वह आँसू दुःख का नहीं होता होगा।
वह उस प्रेम का होता होगा जो दूरी से कम नहीं होता, प्रतीक्षा से थकता नहीं, और समय से हारता नहीं।
कितना विचित्र है प्रेम!
जिससे सबसे अधिक शिकायत होती है, उसी के लिए सबसे अधिक मंगलकामनाएँ भी निकलती हैं।
तभी तो लक्ष्मी का विरह भी आशीर्वाद बन जाता है।
उनकी नाराज़गी में भी करुणा है, उनके मौन में भी मंगल है, उनकी प्रतीक्षा में भी पूजा है।
और तभी मुझे लगता है—
हर स्त्री के भीतर एक छोटी-सी लक्ष्मी रहती है।
वह अपने प्रिय को बाँधकर नहीं रखती।
वह उसके लिए आकाश बचाकर रखती है, रास्ते सजाकर रखती है, प्रार्थनाएँ सँजोकर रखती है।
पर उसके लौट आने तक अपने भीतर एक दीप भी जलाए रखती है।
एक ऐसा दीप, जो आँधियों में भी नहीं बुझता।
आज रथयात्रा में मैंने केवल भगवान को नहीं देखा।
मैंने एक स्त्री का धैर्य देखा। मैंने उसकी प्रतीक्षा देखी। मैंने उसका मौन देखा। मैंने उसका प्रेम देखा।
और तब लगा—
जगन्नाथ की महिमा जितनी विराट है, लक्ष्मी का विरह भी उतना ही दिव्य है।
क्योंकि भक्ति हमें ईश्वर तक ले जाती है, पर प्रेम हमें मनुष्य बनाता है।
और प्रेम को समझना हो, तो रथ पर बैठे जगन्नाथ को नहीं, मंदिर की चौखट पर खड़ी लक्ष्मी को देखना चाहिए।
वहीं विरह है।
वहीं प्रतीक्षा है।
वहीं प्रेम अपनी सबसे पवित्र अवस्था में है।
और शायद . . .
वहीं ईश्वर का सबसे कोमल रूप भी।
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