भारत विभाजन और मानवीय दर्द
काव्य साहित्य | कविता सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
वो ज़मीन तो वही थी,
वो आसमान भी वही था,
नदियाँ भी बहती थीं पहले जैसी,
बस इंसान का दिल कहीं खो गया था।
कल तक जो पड़ोसी थे,
आज सरहद के उस पार हो गए,
कल तक जिनके घरों में दीप जलते थे,
आज राख के ढेर और अंगार हो गए।
न किसी खेत ने धर्म पूछा,
न किसी पेड़ ने जात बताई,
फिर किसने इंसानों के बीच
नफ़रत की दीवार उठाई?
माँ की गोद दोनों तरफ़ रोई,
दोनों तरफ़ बहनों ने भाई खोए,
दोनों तरफ़ बच्चों ने पूछा था—
“हमने कौन से अपराध किए?”
रेलें चलती थीं पहले मुसाफ़िर लेकर,
अब लाशों का कारवाँ ढोती थीं,
पटरियों पर बिखरे सपनों की ख़ामोशी
हर रात इतिहास से कुछ कहती थी।
कितने घर एक रात में उजड़े,
कितने रिश्ते रास्तों में छूट गए,
कुछ लोग मुल्क तो पा गए,
मगर अपने लोग पीछे छूट गए।
एक बूढ़ा आज भी चौखट पर बैठा
अपने गाँव का रास्ता देखता है,
जिस मिट्टी में जन्म लिया था उसने,
उसे आज भी अपना कहता है।
विभाजन केवल नक़्शे का नहीं था,
विभाजन दिलों का भी हुआ था,
सीमाएँ तो काग़ज़ पर खींची गईं,
मगर घाव इंसानों पर हुआ था।
इतिहास अक्सर तारीख़ें लिखता है,
पर दर्द नहीं लिख पाता,
जो उजड़े घरों ने सहा था,
उसे कोई शब्द नहीं बता पाता।
आज भी जब सरहद पर सूरज उगता है,
वह दोनों ओर बराबर चमकता है,
शायद प्रकृति अब भी इंसानों को
एक होने का संदेश देती है।
आओ याद रखें उस त्रासदी को,
पर नफ़रत को विरासत न बनने दें,
जो दर्द बँटवारे ने दिया था,
उसे आने वाली पीढ़ियों तक न जाने दें।
क्योंकि मुल्क बँट सकते हैं,
मगर इंसानियत नहीं बँटनी चाहिए।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं