उत्तराधिकारी
काव्य साहित्य | कविता सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’15 Jul 2026 (अंक: 301, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
हमने
अपने बच्चों को
घर दिए,
ज़मीन दी,
डिग्रियाँ दीं,
बैंक खाते दिए।
बस एक चीज़
देना भूल गए—
शर्म।
इसलिए
वे सब कुछ
विरासत में ले गए,
लेकिन
मनुष्य होना
नहीं सीख पाए।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं