समय के सामने
काव्य साहित्य | कविता सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
समय
किसी राजा का मित्र नहीं,
किसी ग़रीब का शत्रु नहीं।
वह सबके लिए
एक समान चलता है।
उसके सामने
साम्राज्य भी झुके हैं,
और महत्त्वाकांक्षाएँ भी।
मनुष्य
अपने जीवन में
बहुत कुछ इकट्ठा करता है।
धन,
प्रतिष्ठा,
उपलब्धियाँ,
सम्बन्ध।
पर समय
धीरे-धीरे
सबका मूल्य बदल देता है।
जो आज बहुत बड़ा लगता है,
वह कल
एक स्मृति बन जाता है।
जो आज
असहनीय दुःख लगता है,
वह भी
एक दिन
अनुभव बन जाता है।
समय
हमें सिखाता है
कि स्थायी कुछ भी नहीं।
न सफलता,
न असफलता,
न सुख,
न दुःख।
स्थायी है तो केवल
मनुष्य का आचरण।
यही कारण है
कि अंततः
लोग हमारे पद नहीं,
हमारा व्यवहार याद रखते हैं।
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