मनुष्य का घर
काव्य साहित्य | कविता सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
मनुष्य
सारी उम्र
एक घर बनाता है।
ईंटों का,
सीमेंट का,
सपनों का,
और उम्मीदों का।
वह दिन-रात
परिश्रम करता है,
अपनी इच्छाओं को टालता है,
और भविष्य के लिए
वर्तमान को गिरवी रख देता है।
धीरे-धीरे
दीवारें खड़ी हो जाती हैं,
छत बन जाती है,
दरवाज़े लग जाते हैं।
लोग कहते हैं—
“अब उसका घर बन गया।”
पर घर
केवल दीवारों से नहीं बनता।
घर बनता है
विश्वास से,
संवाद से,
और उन लोगों से
जो वहाँ रहते हैं।
यदि हँसी नहीं है,
यदि अपनापन नहीं है,
यदि एक-दूसरे के लिए
समय नहीं है,
तो सबसे सुंदर भवन भी
सिर्फ़ एक संरचना रह जाता है।
घर वह जगह है
जहाँ मनुष्य
अपने दुःख उतार सके,
अपनी थकान रख सके,
और बिना किसी भय के
स्वयं हो सके।
शायद
इसीलिए
घर बनाना आसान है,
पर घर बसाना
जीवन भर की साधना है।
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