समय की धूल
काव्य साहित्य | कविता सुरेंद्र कल्याण ‘बुटाना’15 Sep 2026 (अंक: 302, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
समय
धीरे-धीरे नहीं चलता,
वह हमारे भीतर
चुपचाप घर बनाता है।
एक दिन
आईने में अपना चेहरा देखते हुए
अचानक पता चलता है
कि बचपन बहुत दूर चला गया है।
कुछ लोग,
कुछ रास्ते,
कुछ सपने
धूल की परतों के नीचे दबे हैं।
फिर भी
उनकी आहट
कभी-कभी सुनाई दे जाती है।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
- अंतिम चिट्ठी
- अंतिम प्रश्न
- आदमी की तलाश
- आदमी के भीतर
- उत्तराधिकारी
- एक अच्छा मनुष्य
- करुणा
- करुणा का घर
- गाँव की शाम
- गाँव जो अब भी बसता है
- जीवन
- दीपक
- नदी
- नदी का धर्म
- पृथ्वी
- पृथ्वी की चुप्पी
- पृथ्वी की थकान
- प्रमाण
- बूढ़ा पेड़
- बूढ़ा पेड़
- भविष्य के नाम
- भारत विभाजन और मानवीय दर्द
- मन की खिड़की
- मनुष्य का घर
- मनुष्य होने का अर्थ
- माँ की अलमारी
- मौन
- मौन - 1
- युद्ध के बाद
- रोटी और सपने
- शहर में अकेला आदमी
- सभ्यता
- समय का पेड़
- समय की धूल
- समय के सामने
- स्मृतियाँ
- स्मृतियों का उजाला
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं