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बाढ़ नहीं यह...

कल बस्ती थी
आज ताल है।

बूढ़ी माँ
टूटी खटिया को
मुश्किल छत तक ठेला
लोटा-थाली-आटा-दालें
संग गया ले रेला
जल है यह
या एक जाल है।

सोना तो
मेरी गोदी थी
रूपा कौन संभाले
धनिया को तो लील गए थे
आसपास के नाले
बाढ़ नहीं यह
महाकाल है।

बेघर तो
पहले से ही थे
अब छूटा फुटपाथ
पा लेंगे क्या सभी निवाले
जितने पसरे हाथ
डालों पर भी
कहाँ छाल है

कौन उठाएगा
छिगुनी पर
अब के यह गोवर्धन
इनका तो खुद ही संकट में
रहता है सिंहासन
इंद्रासन की
तुरुप-चाल है

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