अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

बाँस बरोबर आया पानी

बादल आए इंद्रधनुष ले
         टूट पड़ी सेना अंबर से
                 हुए पराजित गाँव। 
 
                  बाँस बरोबर आया पानी
                  बहती जाती छप्पर-छानी
                  फिर भी मस्ती में ’रजधानी‘
 
                   यों तो उत्सव-संध्याओं में 
                   चर्चे इनके ही होते हैं 
                          पर आशंकित गाँव।
 
                 ढाणी, टिब्बों फोग-वनों में 
                 कैसा छाया ’सोग‘ मनों में
                 भय का फैला रोग जनों में
 
                       बिजली कोड़े बरसाती है      
                       खाल उधेड़ी इसने तन की
                              थर्-थर् कंपित गाँव।
 
                 किधर गया रलदू का कुनबा
                 बिखर गया हरदू का कुनबा
                 बदलू का भी डूबा कुनबा
 
                   बोल लावणी के कजली के 
                   सब गर्जन-तर्जन में डूबे
                      छितरा जित-तित गाँव। 
 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

साहित्यिक आलेख

दोहे

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं