अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

बह जाने दो

आज मेरे सब दुःख दर्द तुम
अश्रु में बह जाने दो
भरे घाव में रक्त रवानी
अब मुझको सहलाने दो
बचपनकी यादों में ख़ोकर
भूल सभी कुछ जाने दो
खेल-खेलकर दिनभर यूँ ही
नटख़ट सी कहलाने दो
माँ की ममता के आँचल में
छुप छुप कर खो जाने दो
थक कर के फिर गोद में उसकी
सिर रख़कर सो जाने दो
शीत लहर छू गई हो जैसे
तन में थिरकन आने दो
मंद मंद मैं चलूँ पवन सी
दुल्हन सा शरमाने दो
आज मेरे सब दुःख दर्द तुम
अश्रु में बह जाने दो
गगन चुम्बी इच्छाओं को मेरी
अमर बेल बन जाने दो
आज न रोको मुझे तुम ऐसे
मन मुखरित हो जाने दो
पिंजर द्वार खोल दो सारे
खुले गगन उड़ जाने दो
सतरंगी रंगों में ढलकर
गुंचों सा खिल जाने दो
आज मेरे सब दुःख दर्द तुम
अश्रु में बह जाने दो
पुष्पों की पंखुङी में मुझको
खुशबू सा बस जाने दो
पात-पात और डाल-डाल पर
भँवरों सा मँडराने दो
वर्षा की बूँदों की भाँति
वसुधा से टकराने दो
हरा भरा ये जग हो सारा
खेतों को लहलहाने दो
अल्हड़ बाला सी मैं नाँचू
मस्ती में रम जाने दो
ढलते सूरज की लाली को
मन के भीतर आने दो
शीत लहर में सर्द धूप सी
तन मन को छू जाने दो
कल-कल करती सरिता को तुम
पथ अपना अपनाने दो
आज मेरे सब दुःख दर्द तुम
अश्रु में बह जाने दो
बाँधो न मुझको झील सा तुम
सागर से मिल जाने दो
जाग-जाग कर बुने सपनों को
नयनों में बस जाने दो
आज न भींचो अधरों को तुम
प्रणय-गीत अब गाने दो
बाहुपाश में प्रियतम के अब
पिया मिलन हो जाने दो
आज न रोको मुझ को कोई
पानी सा बह जाने दो
अश्रु पूर्ण आँखों में मेरी
आस-किरण जग जाने दो
आज मेरे सब दुःख दर्द तुम
अश्रु में बह जाने दो॥

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

स्मृति लेख

दोहे

बाल साहित्य कहानी

आप-बीती

कहानी

कविता - हाइकु

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं