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एक बिलकुल अलग कहानी – 1

 मूल कहानी (अँग्रेज़ी): डॉ. नंदिनी साहू 
अनुवाद: दिनेश कुमार माली 

"मानवीय सम्बन्धों के आधार पर मीता के हृदय की थाह लेना सबसे मुश्किल काम है! हर संबंध का पालन-पोषण करना पड़ता है, अन्यथा वह दीर्घायु नहीं रहता है।"

उसने सिर्फ सिर हिलाया।

उसके प्रश्न सरल थे, और विचार निर्दोष, मेरे प्रश्नों और विचारों से पूरी तरह अलग।

उसका सवाल होता था, जब बदले में उसे कुछ नहीं चाहिए, तो फिर उस रिश्ते को बचाने की कशमकश से क्या फ़ायदा?

उन वर्षों में, न तो वह किसी चीज़ का शिकवा-शिकायत करती थी, न ही किसी चीज़ को पाने की कोशिश करती थी। फिर भी वह स्वेच्छा से अपने आप को एक जाल में फँसी हुई मछ्ली की तरह क़ैद अनुभव कर रही थी। पहली बार, वह ताज़ी हवा में साँस लेना चाहती थी। क्या यह बहुत ज़्यादा था? क्या वह किसी अक्षम्य चीज़ की कामना कर रही थी? बिलकुल नहीं।

शादी हुए तेरह साल हो गए थे, ख़ुशी से दिन कट रहे थे, उस समय हमारी मुलाक़ात हुई थी। क्रिएटिव राइटर्स वर्कशॉप में वह चुपचाप बैठी हुई थी, फिर भी वह मुझे चिर-परिचित लग रही थी, उसके होंठों पर हँसी थी और आँखों में चमक, शायद प्यार की!

जैसे हर कोई उसे मिला करता था, वैसे मैं भी उसे मिला था, और मन-ही-मन उसके शांत, सौम्य और भाव-प्रवण चेहरा देखकर आकर्षित हो गया था। बहुत ख़ूबसूरत चेहरा, गालों पर दो डिंपल, दोनों भौंहों के संगम-स्थल पर बिंदी, ऐसा लग रहा था जैसे दोनों आँखें उसकी भावनाओं को प्रकट कर रही हों, एक पारदर्शी सेतु बनकर। 

हमने विनीत भाव से बातें की। उसकी आँखें बहुत ज़्यादा चमक रही थीं, इसलिए मैंने आँखों में आँखें डालकर बातें करना ठीक नहीं समझा। वह कहने लगी, उसे गीत गाना, खाना पकाना, पढ़ना-लिखना और मुस्कराना बहुत पसंद है और मैंने देखा कि वह बहते पानी की तरह हँसती थी। धीरे-धीरे कुछ महीनों में मुझे उसकी अभिरुचियों के बारे में पता चला जैसे कि उसे मछली खाना पसंद है, छोटी स्कर्ट, घुटने तक की लंबाई वाली फ़्रॉक, ऊँची एड़ी के जूते पहनना अच्छा लगता है ताकि उसके पतले-चिकने पैर दिख सकें, इसके अलावा, वह अपने घर के सामने हरी-भरी पहाड़ी पर ध्यान करना बहुत पसंद करती थी। 

यह तो मुझे अच्छी तरह से याद नहीं है कि कब मैंने उसके साथ संबंध जोड़ना शुरू किया था, लेकिन मुझे याद है कि कभी भी मुझे उसकी उपस्थिति असहज नहीं लगी। जल्दी ही मैं समझ गया कि उसका मिलन मेरे अधूरे जीवन की तलाश पूरी कर सकता है।

मेरी छठी इंद्री कभी झूठ नहीं बोलती थी।

वह एक प्रसिद्ध लेखिका थीं, लेकिन ज़मीन से जुड़ी हुई। दिन के काम-काज के दौरान, मुझे दर्शकों से उसका परिचय करवाना पड़ा, और मैंने यह काम दिल से किया ... अपने पसंदीदा तथ्यों को जोड़कर प्रस्तुत किया। उसकी रचनात्मक कृति के सूक्ष्म से सूक्ष्मतम विवरण का मैंने पॉवर पॉइंट प्रेज़ेंटेशन तैयार कर लिया था, जिसमें ख़ासकर उन विशिष्ट बिन्दुओं पर ध्यान आकर्षित किया गया था, जब उसने अपनी कम उम्र में साहित्य का एक लंबा सफ़र तय किया था। जैसे-जैसे मैं उसके साहित्यिक सफ़र पर प्रकाश डालता जा रहा था, वैसे-वैसे दर्शक उसकी तरफ़ घूर-घूरकर देखने लगे थे, और वह शरमाकर नीचे देखने लगी थी और अपने नाखूनों को दाँतों से काटने लगी थी। जैसे ही मैं अपना प्रेज़ेंटेशन पूरा कर उसके लाजवंती चेहरे की ओर निहारने लगा तो वह मेरे कानों में धीरे से बुदबुदाई, “इन सब चीज़ों की क्या ज़रूरत थी?” उसकी आँखों में दिखावटी ग़ुस्सा और मन के भीतर छुपे हर्ष के भावों का मनोरम मिश्रण दिखाई दे रहा था। मगर ललाट पर लगी बिंदी, जुड़ी हुई भौहों को और मधुर बना दे रही थी!

उस समय मुझे महसूस हुआ कि मैं उस सरल लड़की के प्रेम-जाल में फ~<स गया हूँ। कहीं अनजाने में, हम दोनों के बीच एक सेतु का निर्माण हो गया है। हम दोनों के बीच एक घनिष्ठ संबंध बनता जा रहा था, हमेशा-हमेशा के लिए।

उसमें वे सारे गुण थे, जो मैं अपने दोस्तों में तलाशता था। ऐसे लोग जो मेरे जैसे हों, कोई ज़रूरी नहीं है कि वे हमेशा ‘गुडी-गुडी’ हों, चेहरे पर सदैव मुस्कान हो। जब मैं कोई प्रेम-गीत गाऊँ तो वह नाचने-थिरकने लगे और जब मैं कहूँ कि आज कार पार्किंग में रहने देते है, मेट्रो से जाएँगें या रात को फ़िल्म देखेंगे तो वह कहे, “चलो मैं तैयार हूँ, चलते हैं।”

संक्षिप्त में, वह पूरी तरह से जंगली थी, आँखों में शरारत के भाव लिए। मैंने उसके जैसी शायद ही किसी सनकी औरत को पहले देखा होगा। उसके व्यक्तित्व मे लालित्य, शिष्टता, सर्जनशीलता और अन्य बहुमुखी प्रतिभा के बीच कूट-कूट कर भरे हुए थे।

लेकिन प्यार में मज़ाक या लालित्य से अधिक गुणवत्ता होनी चाहिए, है न? सही कह रहा हूँ न?

माधवी में ऐसे गुण भी हैं, उसे मालूम तक नहीं था। हम समान उम्र के थे, लेकिन वह ज़्यादा परिपक्व थी। वह ऐसी स्त्री थी, जिसके साथ मैं बॉलीवुड के किसी रोमांटिक हीरो की तरह रह सकता था, मसखरा, मज़ाकिया और अच्छा-बुरा, जो मैं बनना चाहता था, बन सकता था। ऐसा कोई नियम नहीं था। मैं चाहता था कि युवावस्था में वह मेरी पत्नी, प्रौढ़ावस्था में दोस्त और वृद्धावस्था में नर्स बन कर रहे। मगर जो हम जीवन में चाहते हैं, कोई ज़रूरी नहीं कि वह हमें प्राप्त हो। हुआ भी ऐसा ही।

वह चुपचाप लंबी दूरी से संबंध निभा रही थी, विगत पच्चीस वर्षों से मेरे जीवन के बारे में अपनी चिंताओं का साझा करती, मुझे मेसेज, पत्र भेजती, मेरे काम में हाथ बँटाती, अपनी रचनाओं को पढ़ाती, अपने सुख-दुख बाँटती।  भर मेरे साथ ऐसा ही उसका व्यवहार रहा। मैं केवल उसका मौसमी साथी नहीं था, मैं उसकी ज़िंदगी का हिस्सा भी बन गया था। साहित्य की छात्रा होने के नाते, विख्यात हस्तियों को पढ़कर उसका सार वह तुरंत समझ जाती थी और उन्हें अपने जीवन में अमल में लाने कि कोशिश करती थी। अभाव-ग्रस्त होने के बाद भी वह संतोष का जीवन जी रही थी।

जैसे उसके जीवन में और कोई नहीं था,वैसे ही मेरे जीवन में कोई दूसरी महिला नहीं थी। उससे मुलाक़ात होने से पहले मेरी शादी टूट चुकी थी।

उस दिन, सर्जनशील लेखकों की कार्यशाला के समापन-सत्र के बाद आयोजकों ने मुझे उसे एयरपोर्ट छोड़ने के लिए कहा। विगत कुछ दिनों से, हम सकारात्मक संकेतों का आपस में आदान-प्रदान कर रहे थे, हमारी आँखें बातचीत कर रही थी, जबकि ज़ुबान से शब्द नहीं निकल रहे थे और मैं थोड़ा-थोड़ा उसे मिस करने लगा था, उसके औपचारिक सूट, सलवार, आकर्षक साड़ी, रेशमी बाल, उसकी उँगलियों के नाखून से लेकर पैर के नाखूनों तक। भले ही, यह दूसरी बात थी, वह शायद ही नोटिस कर रही होगी कि कोई उसे इतनी बारीक़ी से देख रहा होगा। वह अपने आप को ‘टॉम-बॉय’ कहती थी, या उसे यह नाम पसंद था।

उस दिन, बड़ी मुश्किल से मैंने सुबह तक इंतज़ार किया, केवल इसलिए कि मुझे उसे एयर पोर्ट छोड़ने जाना था। उस रात मैंने उसे कुछ टेक्स्ट मेसेज भेजे, शहर के सबसे अच्छे रेस्तरां और ख़रीददारी के लिए बेहतरीन जगहों के बारे में बताते हुए। प्रतिक्रिया स्वरूप एक सरल शब्द में उत्तर मिला था- "धन्यवाद"। मुझे आश्चर्य होने लगा, क्या मैं उसके प्रति बहुत व्यक्तिगत होता जा रहा था?

मेरा अनुमान पूरी तरह से सही था, उसका व्यवहार एकदम अप्रत्याशित था। देर शाम, उसने मुझे मेसेज भेजा, “मैं आप पर निर्भर हूं। क्या दोपहर 3.30 बजे स्टेशन पर लेने आ सकते हो।” यह मेरी सोच से परे था। मगर हमेशा की तरह मैं अपनी भावनाओं को दबाना जानता था और जब मैं पहली बार उससे मिला तो मेरे चेहरे पर किसी प्रकार के भाव दिखाई नहीं दे रहे थे। एक बड़े सैमसोनाइट बैग के साथ ट्रेन से नीचे उतरकर वह अपने साथ लाए बैग को ख़ुद खींचकर ले जाने लगी। मुझे उसके हाथ से वह बैग छीनना पड़ा था। मैंने उसकी हवाई टिकटों का भी प्रिंट आउट ले लिया था, यह सोचकर कि वह कहीं उन्हें अपने साथ लाना भूल गई हो। पिछले दो दिनों से उसका प्रोग्राम काफ़ी व्यस्त था, दो दिनों में अनेक अलग-अलग कॉलेजों में उसे व्याख्यान देने थे। बाद में उसने मुझे बताया कि वह मेरी देखभाल और आवभगत से ख़ुश थी।

मुझे उसकी कार्य-शैली बहुत पसंद थी। मैंने उसके ‘प्रोफ़ेशनलिज़्म’ की भूरि-भूरि प्रशंसा की, कम उम्र में हासिल की गई उपलब्धियों की भी खुले मन से सराहना की। लेकिन मैंने उसे कभी नहीं बताया कि मैं उसे दिल से प्यार करने लगा था। विगत कुछ दिनों में धीरे-धीरे, नि:शर्त, वह मेरी स्वप्न-सुंदरी बन गई थी। मैं हतप्रभ था, जीवन में जो कुछ घटित हो रहा था उसे देखकर, वह भी उनचालीस वर्ष की उम्र में! वह दुनिया की सबसे मनोरम कृतियों में से एक थी; नारीत्व के चुम्बकीय आकर्षण से भरपूर, विनीत भाव-भंगिमा और दिव्य जुनून के लिए।

उस दिन वह सहज दिख रही थी, तो थोड़ी उलझन में भी। भले ही, उसके होंठ बंद थे लेकिन जीवंत लग रहे थे, कुछ तिर्यक मुस्कान लिए। रंग ताँबे जैसा, चेहरे के हाव-भाव आकर्षक। मेरी कार में वह सहज महसूस करे- उसके लिए मैं अतिरिक्त सावधानियाँ बरत रहा था। इसलिए जैसे ही वह कार में बैठी, वैसे ही मैंने कार की खिड़कियाँ खोल दीं। वह एनपे ‘टॉम बॉय’ वाला परिधान पहने हुई थी, पेंसिल जैसी फ़िट सूती पैंट, गहरे पीले रंग की सूती फ़ुल स्लीव टॉप, हल्का मेकअप, कोमल त्वचा और एक पारदर्शी मुस्कान। तुरन्त ही उसने कार के शीशे बंद कर दिए तो मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। बाद में जब मैंने उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया? उसका उत्तर था- एक महिला आदमी की आँखों में देखकर यह आसानी से बता सकती है कि वह व्यक्ति सज्जन है या और कुछ?

हाँ, मैं उसका 'सज्जन' आदमी था।

आज तक की वह मेरी सबसे बेहतरीन लौंग ड्राइव थी। उसने अपनी गोद में अपना हैंडबैग रखा था, शायद वह मेरी नज़रों से बचना चाहती थी, अपने आप को 'सुरक्षित' रखने के लिए! या यह भी हो सकता है, वह उसकी आदत हो। इधर-उधर की कुछ बात-चीत होने के बाद, उसने कहा कि ब्लोवर अच्छा नहीं लग रहा है, और उसने उसे बंद कर दिया। मेरी लाल अल्टो कार में केवल ए.सी. चल रहा था और एकदम शांत वातावरण। अहा!

परम आनंद वाली निसंगता!

कुछ समयबाद उसे चुप्पी बर्दाश्त नहीं हुई, और वह मुझे अपनी नौकरी, अपने सहकर्मियों, बेटे, अपने प्रारंभिक वर्ष, अपनी व्यक्तिगत लाइब्रेरी, अपने भविष्य की योजनाएँ, सर्जनशील लेखिका के रूप में अपनी पहचान, थिएटर-संगीत के प्रति अटूट लगाव के बारे में बताने लगी। बातचीत करने में माहिर थी वह। बाद में मैंने उसे बताया, उस दिन का उसका रूप देखकर मैंने एक नया शब्द ईजाद किया है, 'टॉम-टॉम' - एक ऐसी स्टाइलिश लड़की जो बहुत तेज़ी से चलती है, जल्दी-जल्दी बातें करती है, जब वह चलती है, तो उसके बाल हवा में उड़ने लगते हैं और बिजली की तरह वह खिसक जाती है। यह सुनकर हँसते-हँसते लोट-पोट हो गई थी वह।

मुझे हर पल नया-नया आश्चर्य हो रहा था, एक ऐसा इंसान जिसे कुछ दिन पहले जानता तक नहीं था, उसे दुनिया सर्वोच्च अहंकारी मानती थी, शायद ही उसने कभी पुरुषों से बातचीत की हो और जिसने महिलाओं के दिल में डर भर दिया हो!

यह रोज़मर्रा की बात नहीं थी मेरे लिए, बहुत ख़ास दिन था वह। उसने मुझे बाद में बताया कि उसके बगल में बैठा आदमी उसकी साधारण बातचीत में भी कविता का अनुसंधान कर रहा था, कार्यशाला में उसके द्वारा बताई गई हर छोटी-बड़ी बात को लेकर वह बहुत उत्साहित था। उसके शहर में उतरते ही उसने मेसेज भेजा था, "आनंद के शहर में पहुँच गई हूँ!" और एसएमएस में उत्तर दिया था, "आनंद के शहर में आपका स्वागत है!" और वह उसके पीछे छाया की तरह कुछ दिनों तक लगा रहा। ऐसा उसका अनुमान था।

लेकिन अभी भी वह औपचारिक, शालीन लड़की थी, जिसे मैं उस व्यक्ति से दूर करने की कोशिश कर रहा था, पता नहीं क्यों। वह कहने लगी, “मैंने तुम्हें परेशान किया! मेरे लिए तुम्हें रविवार के दिन एयर-पोर्ट तक आना पड़ा! ”

"ओह, सच में? ऐसी बात है तो कृपया नीचे उतरो और टैक्सी ले लो!"

"हे भगवान! आप मुझे नीचे उतरने के लिए कह रहे हो? नहीं … मैं नहीं उतरूँगी।”

हम हँसने लगे, हम मज़ाक कर रहे थे एक-दूसरे से। बाद में, उसने मुझे बताया कि मैं ऐसा पहला व्यक्ति था, जिसने उसे बेदम हँसाया। और मैं ही पहला आदमी था जिसने उसकी चापलूसी नहीं की, उसे कुर्सी पर बैठाकर, न ही उसकी पूजा की। यह उसे अच्छा लगा कि मैं पहला व्यक्ति था जिसने उसे मूलत: सीधी-सादी लड़की के रूप में खुले-आम पहचान लिया था। मैं उसे कैसे बता सकता था कि मुझे एलिज़बेथन सोनेट से नफ़रत थी, जो रक्त-मांस की बनी सुंदर महिलाओं को देवी का दर्जा देते थे!

और सही कहूँ तो मैंने वास्तव में उसके व्यक्तित्व के सुषुप्त हिस्से को अनजाने में भाँप लिया था। वह बारहसिंघा- जैसी लग रही थी और, उसने भी, मेरे भीतर के विप्लवी कवि और बंगाली लहज़े वाले दुखद नायक की नब्ज़ पर हाथ रख दिया था। मेरे साथ, वह अनेक प्रकार की भावनाओं को एक साथ महसूस कर रही थी, अपने बचपन की, डरावनी, मधुर और गीतों भरी।

मुझे उसके परिवार के बारे में जानने का भरपूर अवसर मिला। हमारे पास पर्याप्त समय भी था।

तभी कोई छोटी-सी चीज़ उसकी छाती से टकराई और अंदर पेट की तरफ़ चली गई। मगर उसने टी-शर्ट खोलने का फ़ैसला किया और स्पष्ट रूप से, धैर्यपूर्वक मुझसे बोली कि उसने कभी भी किसी पुरुष के सामने नहीं अपने वस्त्र नहीं खोले हैं और उसकी बहुत ही कम सहेलियाँ है, जो उसके निजी जीवन के बारे में जानती हैं। पब्लिक फ़िगर होने के कारण वह इस मामले में कुछ ज़्यादा ही सतर्क रहती थी। आज भी मुझे दृश्य याद है, जब वह अपनी सजल नेत्रों से दिग्वलय की ओर टकटकी लगाकर देख रही थी।

यद्यपि वह निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से सम्बद्ध रखती थी, मगर अपने कैरियर के बारे में उसके बहुत ऊँचे ख़्वाब थे। तेईस साल की उम्र में उसके माता-पिता ने उसकी शादी एक ग़लत आदमी से करवा दी तो वह घरेलू-हिंसा, वैवाहिक-बलात्कार, ईर्ष्या, पुरुष-अहंकार और शारीरिक शोषण का शिकार हो गयी कुछ सालों तक। गर्भावस्था के दौरान, फ़ैलोशिप की परीक्षा पास की और उसके बाद पीएच.डी.। अपने बेटे के जन्म के बाद, वह दूसरे शहर में चली गई और फिर, वहाँ से धीरे-धीरे दिल्ली। शादी के कुछ ही वर्षों में वह अपने मानसिक-विकलांग पति से अलग हो गई।

इसी बीच, उसका और उसके छोटे बेटे का किसी अन्य परिवार से नज़दीकी रिश्ता बन गया; उनके परिवार का इकलौता बेटा उसके बेटे का शुरुआती वर्षों में प्रमुख सहारा था, और एक बहुत अच्छा इंसान भी। उसका बेटा पूरी तरह से उन पर निर्भर करता था, और उसका भी उनके साथ अच्छा तालमेल बन गया था। इसलिए, उन्होंने शादी करने का फ़ैसला किया। वैसे भी, भाग्य कुछ लोगों के साथ क्रूर मज़ाक करता है और उसके साथ भी ऐसा ही हो रहा था। उसके दूसरे पति के लिए सौंदर्यवाद की भावनाओं को समझना तो दूर की बात थी, उसका साहित्य से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था; उसके साथ कभी कोई शारीरिक नज़दीकियाँ भी नहीं बनी थी, और शायद उसकी सेक्सुअल प्राथमिकताएँ बिलकुल अलग थीं। लेकिन उसके पास शिकायत करने का कोई अधिकार या इच्छा नहीं थी, क्योंकि वह घर और अपने बच्चे के लिए शांति चाहती थी, जो उसे बहुत प्यार करता था। और  इस प्रकार, वह सुलह-सुविधा की शादी से कहीं ज़्यादा अकेली हो गई थी।

जिस तरीक़े से धीमी आवाज़ में डरते हुए उसने कहा था, जो मुझे पहले से मालूम था कि वह एक घायल स्त्री है। उसकी भावनाएँ वास्तविक, विशाल और आकाश की तरह स्थायी थीं, जो मुझे किसी भी दिन निगल सकती थी। एक ऐसा सर्वोत्तम पाश में जकड़ने वाला प्रेम या तो आप तोड़कर बाहर निकल जाओ या फिर इंतज़ार करते हुए सावधानी से सहन करो, भले ही, उसका फंदा छोटा हो।

एकदम सन्नाटा, फटी-फटी ख़ामोशी।

चुप्पी तोड़ी, अपना मूड बदला और वह मुझे अपने परिवार के बारे में पूछने लगी।

“फिर से व्यक्तिगत बात करना ठीक रहेगा? मेरी पत्नी मेरे बेटे के साथ दूसरे शहर में रहती है, वहाँ काम कर रही है। वह मेरी बचपन की सहेली थी, लेकिन शादी के कुछ सालों बाद, हमें पता चला कि शादी नहीं टिक पाएगी; मेरा मतलब है कि हम एक-दूजे के लिए नहीं बने हुए थे। इसलिए हमने सोचा कि कुछ समय हमें अलग-अलग जगहों पर रहना चाहिए। अब मेरा बेटा छुट्टियों के समय मुझे और मेरे माता-पिता को मिलने के लिए आता है। बस यही है मेरी कहानी।”

"क्या आप उससे प्यार करते हो?"

"नहीं।"

मुझे उसकी फ्रेंकनेस पर आश्चर्य हुआ। प्यार अपनी जगह पर है– जिसने जीवन को मृग-मरीचिका में बदल दिया था, मगर अभी भी युवा दिनों की कुछ ऐसी यादें बची हुई थीं जो मुझे किसी न किसी तरह अतीत में खींचकर ले जाने के लिए झकझोर देती थीं। वर्तमान की निस्संगता और अतीत की स्मृतियों के बीच मन एक तरह से फटा हुआ था, जिसे जड़ से उखाड़ फेंकना मुश्किल प्रतीत हो रहा था।

“तो फिर आप उससे बाहर निकलने का रास्ता क्यों नहीं खोजते हो? तुम्हें अच्छा जीवन जीना चाहिए!” उसके स्वर में उदासीनता झलक रही थी।

“क्या यह इतना आसान है? क्या आप अपनी वर्तमान स्थिति को बदलने के लिए कुछ भी कर सकती हो? हमारे बच्चे हैं जिन्हें दोनों माता-पिता की ज़रूरत है! ”

फिर से एक लंबी चुप्पी।

पत्नी से प्यार का अभाव, उसके बारे में उल्टा-सीधा बोलना, विवाहेत्तर रिश्ते की शुरुआती रणनीति होती है, जिसका अधिकांश पुरुष भावी साथी को लुभाने के लिए उपयोग में लाते हैं। मगर वह इतनी सरल थी कि मेरे जैसे अजनबी आदमी पर संदेह नहीं कर पाई, जो उसे प्रभावित करने के लिए इस तकनीक का उपयोग भी कर सकता है। वह अपनी स्वाभाविक बुद्धि पर विश्वास करती थी, जो कभी झूठ नहीं बोलती।
मैं उसे कॉफ़ी की दुकान पर लेकर गया, अभी भी हमारे हाथ में एक घंटा समय बचा हुआ था।

हमने अपने मूड को हल्का रखने और मुस्कुराने की कोशिश की, इधर-उधर की हल्की-फुलकी बातों का साझा भी किया।

मैंने दूर से ही सुगंधित चमेली जैसे सौन्दर्य को निहारा। वह अपने आप में खो गई थी, अपने घर पर फोन कर रही थी और मेरा इंतज़ार भी।

हमने पकौड़े खाकर कॉफी पी। इस समय मेरे मन में एक असीम भावना पैदा हो रही थी, और मैं चाहता था यह समय यहीं थम जाए।

एयर-पोर्ट के सामने आदरपूर्वक हाथ मिलाते हुए एक-दूसरे से इस तरह विदा ली, मानो हम किसी सरकारी या निजी फर्म के पार्टनर हों।

मुझे अच्छी तरह याद है, आख़िरी बार जब मैंने उसे देखा था। मेरी आँखों में ताज़गी थी, उसकी आँखें थोड़ी नम, थोड़ी चमक रही थीं, और उसके चेहरे पर एक आकर्षक मुस्कान थी। ऐसी मुस्कान, जो सबसे घातक आतंकवादी को भी धाराशायी कर अपने प्रेम के गिरफ़्त में ला सके। मुझे उसका गौरवर्ण और आकर्षक शरीर साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था। एक पल के लिए, मुझे उसकी ठुड्डी को छूने की इच्छा हुई और उसके छोटे बालों को सहलाने की भी। लेकिन क्या मैं ऐसा कर पाया, अगर ऐसा करता तो मैं उस भद्र महिला का 'सज्जन' पुरुष कैसे रह पाता, और जीवन कुछ अलग ही होता।

इसलिए मुझ जैसे तेज़-तर्रार आदमी ने ख़ुद को वहीं रोक लिया और मैं सपनों की दुनिया में खो गया।

मैं उसके साथ जा रहा था, हवाई अड्डे के बाहरी परिसर में, ध्यान से उसकी तरफ़ देख रहा था।

 देखते-देखते अन्य यात्रियों की पंक्ति में वह कहीं गुम हो गई।

अचानक उसने मेरी सरसरी निगाहों की तरफ़ देखा, जो उसका पीछा कर रही थी। वह विचलित हो गई थी, कई बार उसने पीछे देखा, और लगभग वह अपना रास्ता भूल गई थी।

बाद में, उसने मुझे बताया कि, उसके लिए यह वह क्षण था जब वह अपने आप पर सबसे ज़्यादा आश्चर्य कर रही थी, क्योंकि उस समय वह किसी के लिए ऐसा अनुभव कर रही थी, जैसा उसने अपने जीवन में पहले कभी किसी के लिए अभी तक महसूस नहीं किया था। उस समय उसे लगा था कि मैं पहले से ही उसे चाहने लगा था। काश! बिना किसी समझौते, और आदान-प्रदान के उसके दिल को छू लेता तो शायद कोई अन्य व्यक्ति वहाँ तक पहुँचने का कभी प्रयास नहीं करता।

अब वह और कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। उसके सामान की चेकिंग हो गई थी और वह भीतर चली गई।
मैंने उसे कुछ मेसेज भेजे, धन्यवाद देते हुए, खाने-पीने, हैंडबैग और लैपटॉप का ध्यान रखने के निर्देश देते हुए। फिर मैंने उसे टैगोर के नारी-पात्र के बारे में मेसेज भेजे, जो मुझे हमेशा से प्रेरित करता था और जिस पर मैं शोध-पत्र भी लिख रहा था, और आश्चर्य की बात यह भी थी कि टैगोर के नारी पात्र का नाम उसके नाम से मिलता-जुलता था।

"ओह ... मुझे अब अपना नाम और ज़्यादा पसंद आने लगा है।"

क्या मैं सपना देख रहा था? क्या मैं किसी अकल्पनीय सोच में डूबा था? असंभव?

कुछ समय तक सिर घूमने-सा महसूस हुआ, थोड़ा ठीक लगने पर मैं गाड़ी चलकर वापस चला आया। मन और शरीर दोनों दूसरे का साथ नहीं दे रहे थे। दो घंटे बाद, जब उसकी उड़ान पूरी हुई, तो मुझे उसका एक मेसेज मिला, “पहुँच गई हूँ। ठंडा मौसम है। बारिश हो रही है।” और मैंने उसे फिर से धन्यवाद देते हुए मेसेज दिया और उसके सुरक्षित घर पहुँचने की कामना की।

दो दिन बीत गए थे। माधवी मेरे दिमाग़ में छाई हुई रहती थी,अधिकांश समय तक।

उसकी मुस्कुराहट, उसके संघर्ष की कहानी, उसकी आशावादिता, उसकी महत्वाकांक्षाएँ, उसकी हर चीज़ मुझे अपील कर रही थी। यह परिपक्व उम्र का प्यार था? मैं तो आसक्त नहीं था, मुझे यक़ीन था, मन ही मन विचार कर रहा था, क्या वह मेरे बारे में वह ऐसा ही सोच रही होगी? 

मेरे मन के किसी कोने में ख़्याल आ रहा था कि क्या वह मेरी दोस्त बनेगी; और मन के दूसरे कोने में ऐसा लग रहा था कि अवश्य वह मुझे भूल जाएगी। आख़िरकार, सेलिब्रिटी को अपने व्याख्यान देने के लिए कई स्थानों पर जाना पड़ता है, हर रोज़ नए लोगों से मुलाक़ात करनी होती है। उसे लोगों को भूलकर अपने काम पर ध्यान केंद्रित करना ही पड़ेगा, जो न्याय-संगत भी था।

मुझे ठीक नहीं लग रहा था, मैं मिस कर रहा था, आशा के विपरीत आशा लगाकर बैठा था कि कहीं वह वापस आ जाए।

दो दिन की चुप्पी के बाद, वैसे भी, उसने मुझसे खुलकर कहना चाहा, "मेरे दिमाग़ में कुछ है, जो मुझे हर समय परेशान करता है। पता नहीं क्या! क्या आप बता सकते हो? आप मेरे मन को अच्छी तरह से समझते हो।"

हे भगवान! मैं क्या लिखने जा रहा था? अपने रिज़र्व नेचर के कारण यह मेसेज भेजने से पहले उसने हज़ार बार अवश्य सोचा होगा।

“यह वास्तव में गंभीर मसला है। कोई-न-कोई ज़रूर सुंदर महिला के दिमाग़ को परेशान कर रहा है?" मैंने इसे सरल भाषा में मज़ेदार लहज़े में लिखा और जान-बूझकर नहीं समझने का स्वांग भरा।

उस दिन हमने कुछ और मेसेजों का आदान-प्रदान किया। देर रात उसका मेसेज आया, “प्रो. माधवी इस समय बिना किताब के सोफ़े पर लेटी हुई है, बुरी बात है, बहुत बुरी। है न?” 

 मुझे समझ में आया और साफ़ तौर पर इस बार मैंने लिखकर हामी भरी।

जोश और हास्य दो गुण उसके चरित्र में कूट-कूटकर भरे हुए थे; वह आगामी दिनों, सप्ताहों, महीनों और वर्षों के लिए मेरी रुचि, शोध, विश्लेषण, विचार, प्रेम और ध्यान की वस्तु बन गई। मेरी ज़िन्दगी का प्यार। वह मुझे अपने रचनात्मक लेखन और शोध-पत्र मेरी टिप्पणी के लिए भेजती रहती थी। मुझे शुरू-शुरू में संकोच लग रहा था। वह एक स्थापित लेखिका थी और मैं, आख़िरकर, एक अनिर्वचनीय अकादमिक था। तरह-तरह के विचार मेरे मन में आ रहे थे कि उसे मेरे सुझाव या सुधार कैसे लगेंगे। मैं अक़्सर नुक़सान में रहता था। लेकिन धीरे-धीरे मुझे अहसास होने लगा कि मुझे अपनी भूमिका को गंभीरता से निभाना चाहिए। उसे मेरी क्षमता में बहुत ज़्यादा विश्वास था, जितना किसी और को नहीं था। वह मेरे लेखन, भाषण और समीक्षा को ‘आउटस्टेंडिंग’ मानती थी, जिसके कारण कुछ हद तक मुझे मानसिक दबाव अनुभव होने लगा था। वह कहती थी कि मेरे पास एक विशेष क़िस्म की बुद्धि थी, जो पूरी तरह से कच्ची, आदिम और मौलिक थी। मेरे साथ प्रत्येक शैक्षणिक बातचीत के बाद उसने अनुभव किया कि उसका दिमाग़ और तेज़ी से चलता था।

धीरे-धीरे मैं उसका संरक्षक बनकर उसे लाड़-प्यार देते हुए उस पर अधिकार जताने लगा।

धीरे-धीरे हम दोनों के बीच 'वह' और 'मैं' का नाता ख़त्म हो गया और हम हमेशा के लिए 'हम' बन गए। हर एक घंटे में, या उससे भी कम अंतराल में हम एक-दूसरे को लगातार मेसेज भेजने लगे। जिससे मुझे हमेशा यह पता रहता था कि वह उस समय क्या कर रही होगी, 2000 किलोमीटर दूर रहने पर भी। उसका टेलीफोन मेरे लिए ‘स्टैंड-इन प्रॉक्सी’ बना हुआ था, क्योंकि मेरी अनुपस्थिति उसके लिए कोई मायने नहीं रखती थी। किस दिन उसने कौन से कपड़े पहने हुए हैं, उसने क्या खाना बनाया या किस रात रेकी की, मुझे हमेशा पता रहता था। मैं उसकी हर कविता और कहानी पढ़ता था, मैं उसके हर साक्षात्कार को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देता करता था और विगत पच्चीस सालों में उसके द्वारा दिए गए व्याख्यानों पर भी अपने विचार व्यक्त करता था। मुझे उसके बेटे के बारहवीं बोर्ड के परिणाम, कॉलेज में प्रवेश, घर के त्योहार, उसकी हर बीमारी और उसके बेटे की शादी आदि की जानकारी मुझे फोन के माध्यम से मिलती-रहती थी। मैंने उनके जीवन के हर छोटी-सी चीज़ का विशेष ध्यान रखता था, 2000 किलोमीटर दूर बैठे हुए भी।

धीरे-धीरे लंबी दूरी का रिश्ता आत्मा से आत्मा को जोड़ने वाला बन गया। ज़िंदगी भर वह रहस्यमयी जीवन जीती रही, एक उदासीन जीवन, रियरव्यू मिरर पर अपने अस्तित्व की तलाश करते हुए। वह अकेली थी, अपनी आत्मा पर गहरे ज़ख़्म लिए। धीरे-धीरे मैं उसके लिए ऐसा पात्र बन गया, जिसमें वह अपनी सारी निस्संगता उड़ेलती रहती थी।

 हमारी आख़िरी मुलाक़ात के तीन महीने बाद, उसने मुझसे केवल एक बार मिलने की कोशिश की थी।

मैंने यह कहकर बहुत बड़ी ग़लती कर दी कि, "मुझे उन जगहों पर आमंत्रित कर प्रोमोट करने की ज़रूरत नहीं है, जहाँ आप स्वयं मुख्य वक्ता या मुख्य अतिथि बनकर जाती हो।" उसके बाद उसने तय किया कि वह मुझे और कभी नहीं मिलेगी। कभी नहीं। कभी नहीं।

उसका चरित्र बहुआयामी था। प्रति दिन, प्रत्येक मेसेज, प्रत्येक ई-मेल, प्रत्येक फोन कॉल मेरे सामने उसके व्यक्तित्व का नया रूप प्रकट कर रहा था। ऐसा करते-करते एक सप्ताह, दो सप्ताह, महीने, वर्ष गुज़रते चले गए। देखते-देखते पच्चीस साल गुज़र गए, मगर वह मुझे कभी नहीं मिली।

एक बार मैंने उससे कहा था, “मुझे तुम्हारा नाम बहुत पसंद है, मगर मैं तुम्हें ‘मीता’ नाम से बुलाना पसंद करूँगा। मेरी मीता, मेरी जीवन-संगिनी।”

वह बहुत ख़ुश थी, मेरी मीता, मेरी चमेली, मेरी मम्म। वह मुझे फोन पर यह कहकर प्रतिक्रिया देती थी। उसकी सादगी, मासूमियत, बाल-सुलभ गुण मुझे हर बार आकर्षित करते थे। रॉबर्ट ब्राउनिंग की लास्ट डचेस  की तरह वह मेरे प्यार की छोटी सी अभिव्यक्ति से अभिभूत हो जाती थी। उसकी विनम्र सराहना करने पर उसका चेहरा शर्म से झुक जाता था। लेकिन अपनी सफलता से वह कभी भी फूली नहीं समाती थी, उसने अपनी उपलब्धियों को सर्व-साधारण भाव से स्वीकार कर लिया था।

मीता की घ्राण-इंद्रिय बहुत तेज़ थी। वह कहती थी, “मैं गन्ध के प्रति बहुत जागरूक हूँ। कोई भी गंध मेरे लिए बहुत मायने रखती है।”

“मगर हर शाम मैं सूअर का बच्चा बन जाता हूँ! प्रतिदिन पचास किलोमीटर की यात्रा सार्वजनिक परिवहन से करता हूँ, और आप तो अपनी कार से यात्रा करती हो। आप चमेली हो और मैं सूअर का बच्चा।"

“सूअर का बच्चा भी प्यारा होता हैं। मुझे प्यारे सूअर के बच्चे से प्रेम है।"    

मैंने उसे हँसाया, ख़ूब हँसाया, अपने आप पर व्यंग्य करते हुए।

“क्या आप जानते हो कि मैं अपनी पसंद के आदमी में कौन से चार आवश्यक गुण देखती हूँ? मेरी नज़रों में वह दिल से संवेदनशील और ईमानदार होना चाहिए। वह कला, साहित्य, संस्कृति और संगीत का अनुरागी होना चाहिए। उसकी घ्राण शक्ति तेज़ होनी चाहिए और ख़ासकर उसे मुझे हँसाना आना चाहिए।”

आह ह! कितनी सादगी थी उसके व्यक्तित्व में! वह समृद्ध, सफल और सुंदर औरत थी। लेकिन उसकी ज़रूरतें बहुत ही कम थीं।

एक बार जब मैंने उसे चिढ़ाते हुए हल्के मूड में कुछ स्माइली भेजी, और उसने मुझे वापस मैसेज किया, "आप मुझ पर हँस क्यों रहे हो?" और जब मैंने कैपिटल अक्षरों में कुछ शब्द लिखे, तो उसने लिखा, "क्या आप मुझ पर चिल्ला रहे हो?" कितनी गहरी संवेदनशील थी वह! ऐसा लग रहा था कि वह ऐसे परिवार से आई है, जहाँ कुछ ऐसे संस्कार उसके रक्त में घोल दिए है कि किसी लड़की को चिल्लाना नहीं चाहिए, उसकी आवाज़ तेज़ नहीं होनी चाहिए कि पास वाले कमरे में सुनाई दे। वह किसी प्रकार का शोर, किसी भी तरह की हिंसा और असभ्यता को सहन नहीं कर सकती थी।

यह मेरी मीता थी — अतिसंवेदनशील।

उस दिन मैंने उसे एक मेसेज भेजा, "किसी आदमी ने, जिसे मैं ज़्यादा नहीं जानता, मुझे कुछ समय पहले बताया कि तुम्हारा किसी ज़िंदा-दिल व्यक्ति से संपर्क हुआ है और उस व्यक्ति ने अपनी आत्मा किसी 'बेजान' हृदय में डाल दी है। अब उसे बार-बार उससे सलाह-मशविरा करने और मदद लेने की ज़रूरत पड़ती है।”

"बेजान? मदद? उन शब्दों पर मैं थूकती हूँ। आप तो विशाल हृदय वाले थे, निर्बल आदमी की तरह सोचने की हिम्मत कैसे कर सकते हो? बकवास न करें। आख़िर मीता सबके लिए समान है।”

उसकी छोटी-सी इच्छा पर, मैं सारी दुनिया न्यौछावर करने को तैयार था। लेकिन मीता किसी भी बदलाव से डर रही थी। उसका फोन नंबर दशकों से वही था। उसका पसंदीदा रंग सफ़ेद था, हमेशा से। पसंदीदा गायक - लता जी; उसका सबसे अच्छा दोस्त और प्रेमी, मैं। सदैव। वह कभी नहीं चाहती थी कि उसके किसी भी निर्णय के कारण उसका परिवार दुखी हो।

“...मैं तुम्हारे जीवन का हिस्सा बनना चाहती हूँ, लेकिन मैं अपनी ज़िम्मेदारियाँ किसी दूसरे के कंधों पर नहीं थोप सकती। यदि आप चाहते हो कि मैं सब कुछ छोड़ कर तुम्हारे पास चली जाऊँ, तो मैं ऐसा नहीं कर सकती। स्वीटहार्ट! मैं तुम्हें कभी 'नहीं' नहीं कह सकती! मैं बहुत स्वार्थी हूँ, तुम्हें पाने के लिए। लेकिन कृपया मुझे मेरी ज़िम्मेदारियों से दूर मत करना। अगर मैं ऐसा करती हूँ, तो आप उस स्त्री को नहीं पा सकोगे, जिसे आप प्यार करते हो। मुझे पछतावा होगा, अफ़सोस लगेगा, और जो मुझे पूरी तरह से बदल देगा।"

लेकिन मैं हमेशा यही चाहता था कि वह जैसी है, वैसी बनी रहे। भ्रमणशील, विंटेज, क्लासिक, आधुनिक महिला, जो पूरी तरह से नि:स्वार्थी थी। अजब विडम्बना थी! अगर वह ऐसी नहीं होती तो मुझे नहीं लगता है कि जो मैं आज हूँ, वैसा होता। अपने पत्रों और मेसेजों में, उसने मुझे एक ब्रह्मांड प्रदान किया और मुझे व्यापक इकाई बना दिया, जो बाद में टुकड़ों-टुकड़ों में बिखर चुका था और वह कहती थी, मैंने उसमें प्राण फूँके हैं, उसके टुकड़े-टुकड़े को जोड़कर। यहाँ तक कि जब हम अपनी चेतनावस्था में नहीं रहते थे, फिर भी हम एक-दूसरे का आकर्षण महसूस करते थे। हम हमेशा के लिए एक-दूसरे के बंधन में बँध चुके थे। देखते-देखते हम जवानी से वृद्धावस्था की ओर अग्रसर हो गए। उसने कभी भी मेरे शरीर का स्पर्श नहीं किया, मगर मेरे हृदय को अदृश्य स्पर्श अवश्य किया था।

उसका अपना परिवार था, मगर वह दुखी थी कि मेरे साथ कोई नहीं है। फिर भी वह मेरा हर पल साथ निभा रही थी, मेरी नींद में, जागते समय, मेरे दिल और आत्मा में। उसने मुझे प्यार का असली मतलब समझाया – पहली बार मुझे पता चला कि प्यार का भी कोई अस्तित्व होता है!

जितना कुछ होने पर भी हमने हमारे प्यार को कभी सार्वजनिक नहीं किया। हमारे दिल की व्यथा किसी को कभी नहीं बताई। न कभी मिले, न कभी जुदा हुए। फिर भी ऐसा लग रहा था मानो हमारा दिल टूटा हुआ था। हम अकादमिक हलकों की हर छोटी ख़बर को गंभीरता से ले रहे थे, जैसे प्रो. जे.बी. परित एक साल में पचास शोध-पत्र लिख सकते हैं; छात्रों के विरोध को नज़रअंदाज़ करते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी चार साल का बी.ए. ऑनर्स कोर्स शुरू करेगा; देश में दस नए केंद्रीय विश्वविद्यालय खुलेंगे और पंद्रह नए आईआईटी; और इतना कुछ होने के बाद भी हमारी चेतना में कोई ख़ास हलचल नहीं होती थी। 

मगर प्रोफ़ेसर माधवी श्रीवास्तव, प्रसिद्ध लेखिका, अगर किसी श्री ए, बी या सी के साथ दिखाई दे दी तो वह राष्ट्रीय स्तर की ख़बर बन जाएगी। ब्रेकिंग न्यूज़! सेमिनारों में, विश्वविद्यालय के गलियारों में चर्चा का विषय, हर प्रकार के न्यूज़ रिपोर्टर द्वारा मिर्च-मसाला मिलाकर बनी-बनाई ख़बर। इसलिए हमने ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया कि दुनिया में किसी के कानों-कान खबर नहीं कि विगत पच्चीस साल से प्रोफ़ेसर माधवी श्रीवास्तव घमंडी, ‘फ़ुल ऑफ़ एटिट्यूड’ वाली लेखिका (कभी-कभी मैं उसे मिस एटी कहकर चिढ़ाता था!) मेरा प्यार बनी हुई थी। जिसे मैं प्यार से ‘पगली मीता’ कहता था, सरल और सबसे आकर्षक महिला थी वह! 

मीता छोटी-छोटी बातों पर अपने निर्णय तुरंत लेती थी, "आप मुझे प्यार नहीं करते हो। तुम्हारे पास मेरे लिए समय नहीं है”। ऐसे भी दिन थे, जब मैं एक लोकल ट्रेन में दो मोटी चाचियों के बीच सेंडविच बनकर बैठा हुआ था, और उस लड़की का कॉल आया। बहुत कठिनाई से मैंने अपनी जेब में से मोबाइल निकाला और कहने लगा, "हेलो!"

"हे भगवान, आप हमेशा सड़कों पर घूमते रहते हो?"

“हेलो…आवाज़ नहीं आ रही है, बेबी! "

“ओह प्लीज़, आप चिल्ला क्यों रहे हो? क्या कहीं दर्शकों को संबोधित कर रहे हो?"

उसके बाद नेटवर्क कट गया। तुरंत दो मिनट के बाद, उसने मुझे मेसेज भेजा, “आप मुझे प्यार नहीं करते हो। मुझे और फोन करने की ज़रूरत नहीं है। मैं तुम्हारी मीता नहीं हूँ… ”

उस उदास महिला ने मुझे बांग्ला गीत याद दिला दिया, "ओ मो मीता, मोरो सुदूरेर मीता ..", और एक ओड़िया गीत, "मो प्रिया थारू किए अधिका सुंदर ... " यह गाना मुझे तब से याद है जब मैं भुवनेश्वर में रहता था अपने जवानी के शुरुआती दिनों में। और उसके बाद मुझे अगले चार-पाँच घंटों तक बैठकों, अकादमिक परिषदों, स्कूल बोर्ड, बाथरूम से उसे रिझाने के लिए मेसेज भेजने पड़ते थे, उसकी ख़ुशामद करनी पड़ती थी, उसके साथ फ़्लर्ट करना पड़ता था।

 लेकिन उस संवादहीन अवधि की नीरवता हमारे रिश्ते को और मज़बूत बनाती थी।

"मीता ...बात करते समय, हो सकता है, मेरे शब्दों ने तुम्हें चोट पहुँचाई हो। नहीं, तो आप मज़ाक कर रही हो। सवाल यह नहीं है कि कौन सही है और कौन ग़लत है, बल्कि इसके बारे में सबसे अच्छा तरीक़ा क्या है, यह खोजना है। मैं निश्चित रूप से तुम्हारा ग़ुलाम नहीं होना चाहताहूं। आप एक अच्छी इंसान हो, प्रतिष्ठित महिला हो, और पहले से ही जीवन में पर्याप्त परेशानियाँ झेल चुकी हो। कृपया मुझसे बात करें।” 
तब जाकर वह मेरा फोन उठाती थी।

मेरे दिन-रात ख़ूबसूरत तरीके से निकल रहे थे। वह उन्हें सुंदर बना रही थी। मुझे उससे प्यार हो गया था – गहरा प्यार, पागलपन भरा प्यार, बुरी तरह से। 

एक बार उसने मेरी कॉल उठाई, तो पंखुड़ी-दर-पंखुड़ी वह अपने आपको खोलती चली गई। वह अपनी संवेदनाओं को सशक्त शब्दों में व्यक्त कर रही थी। वह मेरी सरस्वती थी। मुझे उसकी काव्य-कविताएँ बहुत पसंद आती थी, प्रत्येक कविता को अत्यंत ही सहज-भाव और वाक्पटुता के साथ लिखती थी। वह ऐसी थी, जो सोचा करती थी कि एक दिन अपनी छाती पर किताब रखकर पढ़ते-पढ़ते मर जाएगी। मैं कभी-कभी उसकी कविता की खुले मन से सराहना करता था, उसके मनोभावों को ऊँचा बनाए रखने के लिए। 

वह लिखती थी, “नहीं...काव्य-कविता की बात मत किया करो। हाँ, मैंने बहुत सारी क्लासिक कविताएँ पढ़ी हैं, मगर आधुनिक कविता? आधी मेरे सिर के ऊपर से गुज़रती है– मेरा मतलब शब्दों से नहीं है, लेकिन लोग विशेषणों के लंगर की जुगाली करते हैं– वह मुझे समझ में नहीं आता। काश, कुछ तार्किकता के बिच्छू इन कवियों की पीठ पर डंक मार देते। आप आधुनिक कवि केवल छींकना जानते हो। मिर्च पाउडर से भरे मेरे इस रुमाल को उनके चेहरे पर उड़ेल दीजिए।"

कैसे-कैसे मज़ाक! मज़ाकिया मीता। बहती नाक वाली मज़ाकिया लड़की।

— क्रमशः

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