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हमें बचाना होगा

जब हम स्वार्थ की अंतिम सीमा तक पहुँच जाते हैं तो मूक प्राणी जगत को आह! से गुज़रना पड़ता है। जहाँ हरी-भरी झाड़ियों के झुरमुट, चिल्ल-पों से दूर, पक्षियों से लदे वृक्ष मुस्कान लुटा रहे होते हैं तो हम हस्तक्षेप कर उनकी मुस्कान को उदासी में बदल देते हैं।

सायंकाल को मैं छत पर खड़ा ढलते सूरज को निहार रहा था। उस सूरज से संसार की उदासीनता का प्रश्न करने वाला ही था कि अचानक आवाज़ आई -

"चाचाऽऽऽऽ ओ! चाचा....."

मैंने नीचे उतर कर देखा तो छोटी-सी मेरी भतीजी बाहर से दो सुंदर पिल्ले ले कर आई थी और उनके साथ खेल रही थी। 

मैने पूछा, "कहाँ से लाई ये तुम?"

वो बोली, "सड़क पर रो और चिल्ला रहे थे, तो मैं ले आई।"

"वाह! तुम समझदार हो बेटा, इतनी समझ और संवेदना कहाँ से आई बेटा?"

"चाचा जी इनका घर कहाँ है? ...जैसे हमारा घर है," मासूम बेटी ने पूछा।

"यह धरती ही इनका घर है। मिट्टी को खोदकर ये जीव छोटी गुफा बनाते है उसी के अंदर रहते हैं।"

"तो चाचा जी ये पिल्ले बाहर क्यों घूम रहे थे। इनका घर नहीं है क्या?"

चाचा गंभीर हो गए, "हमने ही उजाड़ दिये हैं इनके घर स्वार्थ के लिये, मानस को अंधाधुंध तृप्त करने के लिए। धरती को ढक दिया है पक्की सड़कों से और दबा दी उसकी रूह को आलीशान महलों के नीचे। दब गई पीड़ा और संवेदना। हाँ, थोड़ा गाँवों में रह गया है धरती का यथार्थ शृंगार। पर वो भी अनुसरण कर रहे हैं झूठी शान-शौकत का। शहर में धुआँ आदमी क्या पशु-पक्षियों के लिये ज़हर बन गया है। हमें बचाना होगा इस धरती को। हाँ बेटा ज़रूरी है। ये मूक प्राणी प्रकृति का अहम हिस्सा हैं।"

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