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पीड़ा और दर्द

पीड़ा और दर्द 
मोह ही देता है;
निर्मोह नहीं करता
समझौता कभी

जिजीविषाओं को
इतना समेट लेता है
इंसान 
उससे नहीं कर पाता 
बिछोह!

जब चढ़ता है 
मौत के घाट 
कोई मानव या पशु-पक्षी 
एक ही जिजीविषा 
उसे ज़िंदा रहना है
तभी उत्पति होती है
दर्द या पीड़ा की

निर्मोह अडिग रहता है
सीमा पर 
सैनिकों की भाँति
न तड़प न दर्द 
जिसे अंतत: 
मालूम है 
मौत निश्चित है, सत्य है

मरणासन्न तक 
हम बनते हैं?
जिजीविषाओं व जिज्ञासाओं 
के पुलिंदे नश्वर संसार के 
तभी बनता दर्द 
तभी पैदा होती है पीड़ाएँ

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