अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

बेटियाँ

वो आँगन जिसमें घुटनों से चलना सीखा, 
वही आज एक पराई जागीर हो गया, 
ब्याह की रस्म क्या हुई, रूह पर बँधन लग गए, 
हक़दार से हाथ, एक पल में ‘मेहमान’ हो गया। 
पिता ने तिलक लगाया, और कह दिया
“अब ये घर तुम्हारा नहीं, वो घर तुम्हारा है,”
पर कोई उस पिता से पूछे, क्या दिल के कोनों में, 
बेटियों के बचपन का अब भी गुज़ारा है?
 
फ़र्ज़ की पोटली कांधे पर उठाए वो चली गई, 
पीछे छूट गई वो खिलखिलाहट, वो नादानी, 
मगर अजब रीत है इस दुनिया की, 
बेटे को विरासत मिली, और बेटी को बस कहानी।
 
उसने कभी हिस्सा नहीं माँगा, न ज़मीन, न सोना, 
उसकी मुट्ठी में तो बस पिता का मान था, 
जिस पिता ने उसे अपनी जागीर से बेदख़ल किया, 
वही पिता उसकी दुनिया का कुल आसमान था।
 
वो महान है, जो ख़ाली हाथ विदा होकर भी, 
मन के संदूक में पिता की यादें सहेजती है, 
हक़ की लकीरें ज़मीन पर खिंचती होगी, 
पर बेटियाँ तो दुआओं में उम्र भर पिता को भेजती हैं। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

नज़्म

कविता - क्षणिका

कविता-मुक्तक

कहानी

खण्डकाव्य

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं