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मेरे पूज्य ‘बाबू’ आँखों में नमी सी

मुझे याद है, 
मेरा हँसता हुआ मुख; 
उनकी धुँधली आँखों की चमक, 
उनका अद्भुत सुख।
  
मेरी हार पर, 
उनका साहस बढ़ाना; 
जीत की, 
नई युक्ति सुझाना। 
 
ख़ाली होते थे तो भी, 
जीवंत थे मेरे जन्मदाता के हाथ; 
और अब कितना निष्प्राण है, 
ये जग का साथ। 
 
जब वो थे तो मैं ख़ुश था, 
आज नहीं हैं तो आँखों में नमी सी है; 
तिरस्कृत हूँ मैं, 
प्रेम, स्नेह, अनुराग की कमी सी है। 

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