हमें मोहन भला तुम क्यों सताते हो
काव्य साहित्य | कविता डॉ. अनुराधा प्रियदर्शिनी15 Sep 2026 (अंक: 302, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
सिंधु छंद
1222 1222 1222
हमें मोहन भला तुम क्यों सताते हो।
छिपे रहते दृगों से तुम रुलाते हो॥
सजल नैना जहाँ मोती गिराते हैं।
उसी को चुन सदा नभ में सजाते हो॥
कमल नैना हृदय को मोह लेते हो।
नयन से तीर तीखे तुम चलाते हो॥
शरद की पुर्णिमा कान्हा बुलाते हो।
खिंची आती सभी गोपी रिझाते हो॥
अधर धर बाँसुरी को तुम सुनाते हो।
मलय शीतल चले जब गीत गाते हो॥
मधुर सी तान हर पल गुनगुनाते हो।
लिया जो नाम हमने कृष्ण आते हो॥
धरा ब्रज पावनी लीला रचाते हो।
सजा कर रास मंडल तुम बुलाते हो॥
खिली नभ चाँदनी में रास करते हो।
हृदय में राधिका के वास करते हो॥
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