मेरी छाया तले
काव्य साहित्य | कविता मीनाक्षी झा1 Mar 2022 (अंक: 200, प्रथम, 2022 में प्रकाशित)
मेरी छाया तले भी हुए सब निहाल
नैहर हो मेरी या हो ससुराल
पर मेरे अंश में है गरल ही गरल
शंकर बनना भी क्या है इतना सरल
मंज़िल पास से तो गुज़र भी गए
पहचाना ना मुझको, न लगाया गले।
मेरी वाटिका में जो फूले फले
मंज़िल उन्हें तो बहा ले गई
चलो मेरा होना अकारथ न गया
सूखी डाली को भी वो हरा कर गया
मेरी छाया तले भी हुए सब निहाल
नैहर हो मेरी या हो ससुराल।
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