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यूपीआई: जेब से दुनिया तक


(संदर्भ: यूपीआई दस साल का हुआ)
 
न जेब में सिक्कों की खनक, न नोटों की कोई क़तार,
मोबाइल उठाया, पिन लगाया, पल में हुआ कारोबार।
दस वर्ष पहले जो सपना था, आज वही पहचान बना,
छोटे चायवाले तक पहुँचा, “डिजिटल” हिंदुस्तान बना।
 
न बैंक की लंबी लाइन रही, न ही छुट्टे का झंझट भारी,
एक क्लिक में भुगतान हुआ, आसाँ हुई दुनिया सारी।
कभी पैसे भेजना मुश्किल था,अब पल में पहुँच जाता,
दूर खड़ा अपना इंसान भी मोबाइल से पास हो जाता।
 
बाज़ारों से लेकर गलियों तक, इसकी गूँज सुनाई देती,
भारत की डिजिटल ताक़त, दुनिया को “राह” दिखाती।
तकनीक तब ही महान है, जब जन-जन के काम आए,
यूपीआई की यह छोटी-सी धारा देश को आगे ले जाए।
 
नोट से डिजिटल सफ़र तक, बदला भुगतान का संसार,
दस साल की यात्रा ने बढ़ाया भारत का “गौरव” अपार।
कल जो थी कल्पना कभी, आज हक़ीक़त बनकर आई,
मोबाइल की लघु स्क्रीन ने भारत की तस्वीर बदलवाई।


संजय एम तराणेकर

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