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ठेले पर वैक्सीन

जबसे बाहर के देशों समेत अपने देश में वैक्सीन तैयार होने की ख़बरों के बीच पड़ोस में सोए-सोए भी निगेटिव रहने वाले पॉज़िटिव निकले हैं, तब से नए साल के आगमन के तो छोड़िए, रूटीन के सारे सपने तक आने बंद हो गए हैं। हरदम सपने में भी बस, यही डर लगा रहता है कि उम्र भर हर हाल में निगेटिव रहने वाला इन दिनों जो ग़लती से पॉज़िटिव हो गया तो?? गई सारी उम्र भर की जोड़ी निगेटिविटि पानी में। इसीलिए अपने भीतर की इस निगेटिविटि को बचाए बनाए रखने के लिए मैंने अपने नाक के आगे हवा साफ़ करने वाला ईएमआई पर लिया विदेशी नाक फ़िल्टर लगा लिया है ताकि दिमाग़ के भीतर भले ही सबकुछ अनछना जाए तो जाए, पर कम से नाक के थ्रू जो भी अंदर जाए वह ठीक ढंग से छनकर ही जाए। 

इन दिनों जैसे ही बिस्तर पर पड़ता हूँ, रूटीन के सारे सपने चुपचाप अपने आप ही हाशिए पर चले जाते हैं और सुबह तक वैक्सीन की शीशियों के सपने आने शुरू हो जाते हैं। कभी चीन की वैक्सीन के सपने तो कभी ब्रिटेन की वैक्सीन के सपने। कभी अमेरिका की वैक्सीन के सपने तो कभी इटली की वैक्सीन के सपने। कभी फ्रांस की वैक्सीन के सपने तो कभी जापान की वैक्सीन के सपने। बीच-बीच में कभी-कभार अपनी वैक्सीन भी सपने में आ जाती है तो पता नहीं क्यों, एकदम डर से नींद टूट जाती है। 
सच कहूँ तो, जिस पड़ोसी और पड़ोसी देश से अपनी आज तक नहीं बनी अब तो उसकी वैक्सीन के सपने भी आने लगे हैं। मौत का डर ज़हर को भी दवा में ऐसे ही बदलता रहा है। हालाँकि इटली पर देश की जनता अब उतना विश्वास नहीं। पर हो सकता है, वैक्सीन पर तो कर ले। शुद्ध दवाई किसी रोगी को मिलने के बाद उतना सुकून नहीं देती जितना उसके आने पर देती है। दवा आने के बाद दवा का सारा चार्म डर में भी बहुधा बदल जाता है।

आज रात ग्यारह बजे से लेकर सुबह आठ बजे तक मैंने एक बार फिर वैक्सीन के जी-भर सपने देखे। सपने में मैंने देखा कि हमारे स्वच्छ शहर में क़िस्म-क़िस्म की वैक्सीनों की सेल लगी है। पहले जिन शहर की गंदी नालियों पर फल, सब्ज़ी, मूँगफलियाँ बेचने वाले सजे रहते थे, उन्होंने अब गंदी नालियों पर फल, सब्जियों, मूँगफलियों के बदले वैक्सीन की शीशियाँ सजा रखी हैं थोक में । पानी-पूरी वाला पानी में मिर्च, इमली मिलाने के बदले शीशी में से कुछ पानी में डाल रहा है। चाय वाला चाय में दूध की जगह शीशी में से तरल निकाल बूँदें गिनता चाय में डाल रहा है। कोई एक वैक्सीन की डोज़ के साथ दो वैक्सीन के डोज़ फ़्री दे रहा है तो कोई वैक्सीन के फ़ैमिली पैक सजाए अपनी दुकान के काउंटर पर तना है। सड़क से लेकर पनघट तक कल तक अपने को बेचने वाला आदमी, आदमी के पीछे वैक्सीन लिए भाग रहा है। धंधे के प्रति समर्पित की यही ख़ासियत होती है कि वह जहाँ उसे दो पैसे अधिक मिले वह वही बेचने का काम पूरी निष्ठा से शुरू कर देता है। शहर के बाज़ार में नाड़े तक बेचने वाले भी जिसने कभी पाजामा देखा तक नहीं उसे वैक्सीन लिए उसे रोके हैं। बीस के पाँच! बीस के पाँच! शहर की रेड लाइट्स पर वैक्सीन ही वैक्सीन बेचने वाले। ज़रा सा ट्रैफ़िक रुकते ही बीसियों हाथ में वैक्सीन की शीशियाँ लिए जाम को और जाम करते हुए। हर मॉल पर माल की जगह वैक्सीन सजी हुई सोलह सिंगार किए। टीवी पर वैक्सीन के ऑन लाइन विज्ञापन के बाज़ार दिन रात खुले हुए। 

मैंने वैक्सीन से भरे बाज़ार में वर्चुअल टहलने के बाद देखा कि मेरे मुहल्ले में जो आलू, टमाटर, प्याज़, गोभी बेचने आता है, उसने भी उस वक़्त अपने ठेले पर से आलू, प्याज़, टमाटर, गोभी हटा उस पर वैक्सीन भरी है। तरह तरह के ब्रांडों की वैक्सीन। 

अचानक वैक्सीन के ठेले वाला मेरे छह महीने से किराया न चुकाए किराए के कमरे के आगे रुका, ज़ोर से अपनी सारी अनर्जी गले में जमा कर निर्भय आवाज़ दी, "वैक्सीन ले लो! विदेशी फ़्रेश वैक्सीन ले लो! आलू प्याज़ के भाव वैक्सीन ले लो!"

 . . . और मैं सपने में भी हड़बड़ा कर जाग गया। बिन चाय पिए, बिन मुँह धोए, बिन कपड़े पहने ही वैक्सीन से लकदम ठेले की ओर नंगे ही नंगे पाँव बाज़ की स्पीड में ठेले पर पहुँच गया। 

आँखें मलते हुए सामने देखता हूँ कि उसका ठेला वैक्सीन से इतना भरा हुआ जितना पहले सब्ज़ियों से भी नहीं भरा होता था। यह देखकर मन मत पूछो कितना बाग़-बाग़ हुआ कि चलो, महामारी से बचे हुए अब वैक्सीन से ज़रूर मरेंगे।

"और बाबूजी क्या हाल हैं? अभी तक पॉजिटिव तो नहीं हुए न? कौन सी वैक्सीन दूँ?"

 "वाह डियर वाह! आज सब्ज़ियाँ छोड़ ठेले पर वैक्सीन? आम आदमी तक वैक्सीन की पहुँच? ये हुई न बात! कौन-कौन सी वैक्सीन हैं तुम्हारे पास डियर?" 

"जन कल्याण बाबूजी! जन कल्याण! अपना पेट तो कुत्ते भी भर लेते हैं? हर देश की वैक्सीन!" कहते हुए वह पहली बार सामाजिक पशु हुआ। आह रे कोरोना! सोचा न था आज के दौर में तू हर दिमाग़ के आदमी को अव्वल दर्जे का देशभक्त कर देगा। "बाबूजी! महामारी में जिनके हाथ-पाँव भी नहीं, वे भी जब बहती महामारी में अपने सौ-सौ हाथ-पाँव धोने निकले हैं तो मैंने भी सोचा कि जनता के कल्याण करता मैं भी बहती गंगा में हाथ धो ही लूँ। सच कहूँ बाबूजी! किलो के बदले नौ-नौ सौ ग्राम तोल-तोल कर अब आत्मग्लानि सी होने लगी है। आदमी ज़िंदा रहा तो आलू, प्याज़ तो बाद में भी खा लेगा। इन दिनों उसे आलू, प्याज़ की उतनी ज़रूरत नहीं, जितनी वैक्सीन की है। बस इसीलिए . . . "

"आख़िर इत्ती सारी क़िस्मों की वैक्सीन लाए कहाँ से?" मैंने उससे नज़रें छुपाते पूछा तो वह सीना तानकर बोला, "ये न पूछो बाबूजी कि कहाँ से आई? बस, आप जैसों के भले के लिए आ गई तो आ गई। आप तो जानते ही हैं कि अपुन का बाज़ार उतना व्हाइट पर नहीं चलता जितना ब्लैक पर चलता है। व्हाइट आने से पहले ही यहाँ ब्लैक भूसे के भाव उपलब्ध हो जाता है। भाई लोग सरकार से ज़्यादा देश प्रेमी होते हैं सो . . . उन्होंने अबके भी बाज़ार पर अपना अधिकार कायम रखते हुए . . . हम पर भाई लोगों की कृपा न हो तो आधा देश रात को भूखा ही सोए . . . पर देश हित में कुछ बातें छुपी हुई ही बेहतर लगती हैं बाबूजी! वैसे आपको आम खाने हैं कि आम के पेड़ देखने हैं। आम कहीं भी लगें। इससे आपको क्या? आम में आम का स्वाद मिले तो वह चाहे अमरूद के पेड़ का ही क्यों न हो। बाबूजी! हम उस क्लास के जीव हैं जो जन कल्याण के लिए कुछ भी दाव पर लगा सकते हैं। सो, मैंने भी सोचा कि जब पूरे संसार में वैक्सीन! वैक्सीन! हो रही है तो क्यों न मैं भी अपने प्रिय ग्राहकों को . . . धंधा तो मरने के बाद भी होता ही रहेगा बाबूजी! जब बीड़ी सिगरेट वाले तक इन दिनों बीड़ी सिगरेट बेचना बंद कर वैक्सीन बेच रहे हैं तो ऐसे में मेरा भी कुछ सामाजिक फ़र्ज़ बनता है कि नहीं . . . इसलिए जब तक चलता है तब तक कुछ दिन आलू, प्याज़ बेचने के बदले वैक्सीन ही बेच लूँ ताकि . . . "

 . . . और मैं सरकारी राशन की दुकान का सड़ा आटा खाने वाला उसके वैक्सीन से लकदक ठेले पर वैक्सीनों में बेहतर से बेहतर वैक्सीन ढूँढ़ने लगा, उल्ट-पुल्ट कर उन पर लिखे रेटों को देखते हुए। मेरे जैसों के लिए वेट का रेट पहले होता है शुद्धता का वेट बाद में। . . . तभी पता नहीं मेरे सोए के भीतर कहाँ से देशप्रेम जाग उठा। सो दूसरे देशों की वैक्सीनों को उल्टते-पुल्टते मैंने वैक्सीन के ठेले वाले से पूछा, "बंधु! अपने देश की वैक्सीन नहीं दिख रही इनमें? इस देश के होकर भी तुम अपने देश की वैक्सीन बेचना नहीं चाहते या फिर . . ." मैंने पूछा तो उसने ठेले के निचले हिस्से में गंदी सी बोरी में भरकर रखी शीशियों में से एक शीशी निकालते कहा, "माँग ही रहे हो तो ये रही बाबूजी! ऊपर इसलिए नहीं रखी है कि अपने जागरूक ग्राहकों के साथ मुश्किल यही है कि गुण देशभक्ति के गाते हैं, पर बीमार होने के डर से दवा बाहर की खाते लगवाते हैं। बीमार यहाँ होते हैं और इलाज करवाने बाहर जाते हैं। बस, इसीलिए . . . "

"पर यार! ये अमेरिका वाली वैक्सीन तो बहुत महँगी नहीं है क्या?" मैं वोकल फ़ॉर लोकल वाला एक बार फिर विदेशी पर फिसला।

"बाबूजी! छुप छुपाकर आई भी तो सात समंदर पार से है। राम जाने! बेचारी हमारे कल्याण के लिए कैसे-कैसे आई होगी? यही जाने, पता नहीं कितने बेचारों ने हमारे कल्याण के लिए अपनी जान हथेली पर रख ख़ुद ख़ुद को दाव पर लगाया होगा? ये भी तो देखिए। माल का रेट माल पर नहीं, माल के रिस्क पर तय होता है बाबूजी। ये अपने यहाँ के वैद की पुड़िया तो है नहीं कि . . . ब्लैक में ओपनली वहाँ से वैक्सीन लाने पर पता है कितना ख़तरा है?"

 "सो तो है! तो फ़ाइनली कितनी की दोगे इसे?” सात समंदर पार की वैक्सीन हाथ में लेते ही लगा ज्यों मेरी निगेटिविटि का ग्राफ तेज़ी से आसमान की उँचाइयाँ छूने लगा हो। 

 "देखो बाबूजी! सुबह-सुबह बोहनी का टाइम है। सबसे पहले आपके मकान के बाहर ही आवाज़ दी है। आप ज़िंदा तो पूरा मुहल्ला ज़िंदा। एक बात कहूँ बाबूजी, पेट के लिए मोल-भाव कर लो तो कर लो, पर जब सवाल ज़िंदगी और मौत का हो तो मोल-भाव नहीं करना चाहिए। आपसे झूठ क्यों बोलना, केवल आप लिखे रेट से तीस प्रतिशत कम दे दो।" 

"बस, तीस? फिफ्टी फिफ्टी नहीं चलेंगे?" 

"इतने की तो बाबूजी अपने को ही पड़ी है। पूरे-पूरे में बेचूँगा तो अपने बच्चों को लगावाऊँगा क्या? महामारी का डर तो मुझे भी है," उसने हाथ जोड़ते कहा।

"पर . . . "

 "तो ये चीन वाली ले लो। इसे आधे में दे दूँगा। वह भी आपके लिए।"

"पर यार! चीन के माल पर तो बैन है। फिर ये ठेले बाज़ार में कैसे?"

"बाबूजी! बैन तो छोटे लोगों के लिए होता है। बड़े लोगों के लिए नहीं। वे बैन में ही हाथ की सफ़ाई करते हैं। बड़े लोग ही इसे चोरी छिपे अपने देश में लेकर आए हैं।" 

 "पर इसमें वैक्सीन ही है न!"

"अरे बाबूजी! दवा में भी दवा ढूँढ़ क्यों मेरा सुबह-सुबह टाइम वेस्ट करते हो। जब शीशी पर वैक्सीन लिखा है तो . . . अब कहे पर यकीन नहीं रहा तो कम से कम लिखे पर तो विश्वास कर ही लो बाबूजी! तो कौन सी दूँ . . . " पूछते-पूछते वह अपना वैक्सीन का ठेला धीरे-धीरे आगे सरकाने लगा, सार्वजनिक रूप से वैधानिक हाँक देता हुआ, "वैक्सीन ले लो! विदेसी वैक्सीन ले लो! ताज़ी सस्ती वैक्सीन ले लो! बैंगन, कद्दू के भाव वैक्सीन ले लो . . . " 

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