ट्रायल का बकरा मैं मैं
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी डॉ. अशोक गौतम1 Feb 2021 (अंक: 174, प्रथम, 2021 में प्रकाशित)
जिस तरह आदमी के लिए बनाई दवा का ट्रायल सबसे पहले वैज्ञानिक चूहों, सूअरों पर करते हैं, भले ही ट्रायल सफल होने पर चूहे, सूअर बचे रहें और आदमी मर जाएँ, उसी तरह घर में बनी हर चीज़ का सबसे पहले ट्रायल मेरी बीवीजी मुझ पर करती हैं। और मज़े की बात! मैं उनके हर ट्रायल में आज तक बचता रहा हूँ यह जानते हुए भी कि उन जैसी नीम-हकीम बीवी का शौहर आख़िर कब तक ख़ैर मनाएगा!
बीवीजी चाय बनाती हैं तो चाय बन जाने के बाद सबसे पहले चमच भर चाय मेरे ऊपर ट्रायल करती हैं, “जानू! देखो तो चाय कैसी बनी है?” और मैं उसका शौहर होने के बाद भी उसके सामने चूहा, सूअर हो जाता हूँ आँखें मूँद कर। जब चाय से मुझे कोई एक्शन रिएक्शन नहीं होता, वे उसके बाद मुस्कुराते हुए सिप-सिप करती चाय ग्रहण करती हैं।
बीवीजी घर में दाल बनाती हैं तो दाल बन जाने के बाद उसका ट्रायल मुझपर करती हैं। जब मुझ पर दाल का कोई एक्शन रिएक्शन नहीं होता ओर मैं अपने को ज़िंदा सा महसूस करता कहता हूँ कि दाल में नमक मिर्च सब ओके है तो वे उसे पड़ोस के दूसरे घरों को सार्वजनिक रूप से सप्लाई कर देती हैं। यह देखकर तब कई बार तो यह भी लगता है जैसे मैं उनका पति न होकर कोई लैब हूँ। यह सब देखकर तब कई बार तो मुझे लगता है मैं जैसे उनका शौहर न होकर चूहा, सूअर होऊँ। तब बहुत बार मुझे यों लगता है ज्यों घरवालों ने मुझे बीवीजी के हाथों की गर्म-गर्म चपातियाँ खाने को उनके साथ बंधन में न बाँधकर उनकी हर बनाई चीज़ का ट्रायल करने को मुझे उनके साथ ट्रायल बंधन में बाँधा हो।
उधर कोरोना को मारने के लिए पूरी धरती पर तरह-तरह के ट्रायल हो रहे हैं तो इधर मेरी बीवीजी भी कोरोना को हराने के लिए अपने दिमाग़ के हिसाब से आयुर्वेदिक काढ़ा बनाने में जुटी हुई हैं। हर रोज़ शाम को काढ़े में नया कुछ डालतीं और मुझसे साधिकार कहतीं, “लो प्लीज़! चखो तो सही इसे जनहित में। अब तुम ही कहो, मैं इसका ट्रायल तुम पर न करूँ तो किस पर करूँ? काश! मेरे पास दो-तीन पति और होते तो मैं . . . डियरेस्ट वन! ज़िंदा रहे तो अगले ट्रायल के लिए काम आओगे और जो सिधार गए तो जनहित के काम करने पर जन्नत में हूर नहीं, हुरें मिलेंगी,” और तब मैं हुरों की चाह में उनके बनाए काढ़े का आँखें मूँद कर सेवन कर लेता, वायरस से ये प्रार्थना करते कि हे वायरस! अब मुझे रोज़-रोज़ के इन ट्रायलों से जन्नत दे दो प्लीज़! रोज़-रोज़ के ये ट्रायल अब मुझसे और सहन नहीं होते। पर पता नहीं क्यों ट्रायल के बाद मैं हर बार बच जाता। लगता, खोजी प्रवृत्ति की बीवियों से वायरस भी जैसे डरते हों। पता नहीं, ऐसी खोजी बीवीजी के साथ और कितने ट्रायलों का शिकार होना बाक़ी लिखा है हे मेरे बाप?
कल ज्यों ही वे अपने कोरोना के काढ़े को बिल्कुल फ़ाइनल टच देने ही वाली थीं तो उन्होंने मुझसे मायूस होते कहा, “सुना तुमने?” तो मैंने काँपते हुए पूछा, “क्या? क्या पड़ोसन का मासूम पति अपनी बीवी द्वारा जनहित के लिए बनाए जा रहे कोरोना के काढ़े के ट्रायल का शिकार हो आख़िर दम तोड़ ही गया? हे ख़ुदा! तेरा लाख-लाख शुक्र! उस बेचारे को तूने बीवी के प्रतिशोध से तो मुक्ति दी, वर्ना बेचारे को बीवी के शोध के नाम पर और पता नहीं क्या-क्या खाना पीना पड़ता।” तो वे मुझ पर ग़ुस्सा होती बोलीं, “पता नहीं कैसे मॉडल शौहर हो तुम! जब देखो! अपनी बीवी को उत्साहित करने के बदले क़दम-क़दम निरुत्साहित करते रहते हो। जानते नहीं, हर सफल बीवी के पीछे तुमसे ही पति का हाथ होता है। पता नहीं क्यों, मेरे होते भी जब देखो, बस, मरने की कामना करते रहते हो। तुम चल गए तो मेरी बनाई चीज़ों पर कौन ट्रायल के लिए बलि का बकरा बनेगा? तुम्हें तो अभी कौवे सी उम्र जीना है मेरे मजनूँ!”
“तो क्या हो गया?”
“हुआ ये कि अभी पड़ोसन का फोन आया था कि कोरोना वायरस ने अपनी चाल बदल ली। हाय! अब मेरी इतनी मेहनत का क्या होगा? मेरा तो काढ़े का ट्रायल अंतिम चरण में था। पर अब? सोचा था, बस, आज तुम पर अपने कोरोनिल काढ़े का फ़ाइनल ट्रायल करूँगी और कल प्रेस कांफ्रेंस बुलवा घोषणा कर दूँगी कि दुनिया का पहला काढ़ा पिओ और कोरोना मुक्त होकर जिओ पर . . .”
“मतलब ये कि बीवीजी का पसीना पानी? मतलब, बीवीजी का परिशोधित काढ़ा गटर का पानी?” कुछ देर को मेरी अंदर की साँस अंदर तो बाहर की साँस बाहर। लगा, अभी मेरे ऊपर बीवीजी के शोधों के ट्रायल का कर्ज़ और बाक़ी हो जैसे।
“हाय मेरा काढ़ा!” वे फूट-फूट कर रोने लगीं।
“मतलब ये कि मुझ पर अब फिर नए सिरे से ट्रायल? हे वायरस! तू मरे या न, पर मुझे बीवीजी के ट्रायलों के हाथों एक न एक दिन ज़रूर जनहित में शहीद करवा कर रहेगा,” मेरा रोना निकल आया तो वे मेरे आँसू पोंछती बोलीं, “रोते नहीं जानू! हद है। मुझे भी देखो, मैं थक गई मानवता की भलाई के लिए काढ़ा बनाती, तुम्हें पिलाती और एक तुम हो कि . . . पता नहीं तुममें मेरी तरह की सोशल सेंसेटिविटी कब आएगी?” बीवीजी ने एकबार फिर मेरी झंड की तो मैंने दूसरे ही क्षण सोशली सेंसेटिव होते, बीवीजी को हिम्मत बँधाते कहा, “हे मेरी खोजी बीवीजी! दुखी मत हों! मैं हूँ न! क्या हुआ जो वायरस ने तुम्हारा काढ़ा आते देख अपनी चाल बदल ली। मतलब, वह तुम से डर गया। डरता न तो अपनी चाल न बदलता। समाज में हमें जीने का हक़ हो या न, पर समाज में वायरसों को जीने का पूरा हक़ है। समाज में काढ़ा प्रधान नहीं, खाँसी प्रधान है। समाज वैक्सीन प्रधान नहीं, वायरस प्रधान है। यहाँ एक ही चाल आज तक चला कौन? देखा नहीं, राजा को देख वज़ीर अपनी चाल बदल लेता है। देखा नहीं, वज़ीर को देख प्यादा अपनी चाल बदल लेता है। देखा नहीं, संपादक को देख लेखक अपनी चाल बदल लेता है। देखा नहीं, पुलिस को देख चोर अपनी चाल बदल लेता है। देखा नहीं, कुर्सी को देख लीडर अपनी चाल बदल लेता है। देखा नहीं, साहब को देख चमचा अपनी चाल बदल लेता है। देखा नहीं, ऑफ़िस में बजट को देख क्लर्क तक अपनी चाल बदल लेता है। इस जीव जगत में सभी तो स्थितियाँ परिस्थितियाँ देख अपनी चाल बदलते रहे हैं डार्लिंग! माफ़ करना जो सच कहूँ तो, तुम भी तो क़दम-क़दम पर स्थितियाँ परिस्थितियाँ देख अपनी चाल बदलती हो कि नहीं? ऐसे में कोरोना ने भी तुम्हारा काढ़ा आता देख ऐन मौक़े पर अपनी चाल बदल ली तो परेशान क्यों? मैं हूँ न ट्रायल के लिए! मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि मैं अपनी अंतिम साँस तक बिन कुछ कहे, सिर उठाए, तुम्हारे हर ट्रायल में ट्रायल का बकरा बनता रहूँगा। उठो और बदले वायरस की चाल के काढ़े पर लग्न से अनुसंधान करो। नए काढ़े का सामान तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है,” मैंने बीवीजी का हौसला बनाए रखने के लिए मरते-मरते सीना चौड़ा कर कहा तो बीवीजी के चेहरे पर ए ग्रेड वैज्ञानिक सा नूर छा गया।
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