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वो नदी सी

वो नदी सी रात-दिन,
अनवरत बहती रही,
पुरूष अडिग पहाड़ सा,
चल न पाया एक डग।

मोमबत्ती सी जली वो,
प्रकाशित घर होता रहा,
पुरुष जब भी जला,
धुआँ वातावरण में छा गया।

नारी ने जीवन जिया,
सदैव औरों के लिए,
पुरुष जीवन सिर्फ,
स्वयं के लिए ही कम रहा।

त्याग, प्रेम, सेवा-निधि,
लुटाती रही जो सर्वदा,
पुरुष रहा अभ्यस्त केवल,
जोड़-तोड़ हिसाब में।

नारी रही साम्राज्ञी,
अन्त: के संसार की, 
पुरुष रहा सम्राट,
केवल बाहरी परिवेश का।

नारी अनुभूति प्रेम की,
लयबद्ध कविता सी रही,
अहं के वशीभूत नर,
क्लिष्ट रहा है लेख सा॥

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