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बढ़ी है नफ़रत बढ़ें हैं शूल

1212    2121    21

 

बढ़ी है नफ़रत बढ़ें हैं शूल। 
खिला है जब से विषैला फूल॥
 
ये ख़त्म कैसे हुआ है अम्न। 
कहाँ पे हमसे हुई है भूल॥
 
धुऑं बचा है बची है राख। 
बची न बस्ती बची है धूल॥
 
गधे हैं ख़ुश सब यहाँ पे आज। 
कि ढो रहे बोझ वो अमूल॥
 
किया था झूठे ने वादा झूठ। 
थी उसकी बातें सभी फ़ुज़ूल॥
 
जो कहते करते अच्छे लोग। 
गधों का कोई नहीं उसूल॥
 
वफ़ा के बदले जफ़ा निज़ाम। 
दिया है उसने मुझे ये मूल॥

—निज़म फ़तेह्पुरी

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