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निज़ाम फतेहपुरी–दोहा–003


1.
कॉकरोच पार्टी बनी, बाॅंट रही है ज्ञान। 
ज्ञानी समझे ज्ञान को, गधे बहुत नादान॥
 
2.
बूढ़ा तो चालाक था, अनशन थी इक चाल। 
सभी फँस गए चाल में, अब हैं सब बेहाल॥
 
3.
वह भी उल्लू बन गए, जिनको था सब ज्ञान। 
हम अज्ञानी क्या करें, हम तो थे नादान॥
 
4.
जंगल का राजा गधा, उल्लू बना वज़ीर। 
हँस मर रहे भूख से, कव्वा खाए खीर॥
 
5.
ताज हरदम रहा नहीं, सदा किसी के पास। 
झगड़े वाली चीज़ है, मत रख इसकी आस॥
 
6.
अपने-अपने कर्म थे, फल उसके अनुसार। 
कुछ अच्छा तो कुछ बुरा, मिला सभी को यार॥
 
7.
समझ है तो समझ गया, ना समझे नादान। 
मंदिर मस्जिद एक है, सभी जगह भगवान॥
 
8.
किसी का मन भरा नहीं, इस माया से यार। 
जिसने माया त्याग दी, उसका बेड़ा पार॥
 
9.
बस ग़म है इस बात का, समझा ना ग़म यार। 
हॅंसकर जी ली ज़िंदगी, मन को अपने मार॥
 
10.
जाने का मत ग़म करो, कुछ दिन का था साथ। 
कोई अमर रहा नहीं, अमर रहेगा नाथ॥

—निज़ाम फतेहपुरी

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