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मौत सच है रहेंगे सदा हम नहीं

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212     212    212    212
 
मौत सच है रहेंगे सदा हम नहीं
जीने का भी यहाँ पे मज़ा कम नहीं
 
ज़िंदगी चार दिन की जियो शान से
बाँटो ख़ुशियाँ जहाँ में मगर ग़म नहीं
 
ज़ुल्म सहते रहे उनके हँसते हुए
रोए ऐसे कि आँख नम हुई नहीं
 
ज़ेहनी कमज़ोर जो लड़ते फिरते हैं वो
ग़ुस्से में काँपते जिनके कुछ दम नहीं
 
जंग बल से नहीं तुम लड़ो अक़्ल से
नज़रें दुश्मन पे हों ये मगर ख़म नहीं
 
चढ़ने के बाद जल्दी न उतरे मिरी
फूल महवे की पीता कभी रम नहीं
 
लोग क्यों डर रहे देख मुझको निज़ाम
ठर्रा बोतल में है, ये कोई बम नहीं

—निज़ाम फतेहपुरी

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