चच्चा जी
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य कविता अवनीश कश्यप15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
पुल गिरे,
टूटे पटरी,
दाम बढ़े,
या बिखरे बजरी—
तान के कम्बल,
लपेटे धोती।
जी, चच्चा जी
सो रहे।
सुने हैं—
चार बरस की थी,
एक ठो थी,
चालीस की भी।
न्याय चाहिए—
ऐसे नारे,
लगाती रही
हर लम्हे नारी।
फ़र्क़ क्या पड़ता
काले कोरट पे—
एक मर जाए,
सौ मर जाए।
पर छुट्टी
सौ दिन की ही चाहे,
लाख केस
चाहे रहे पेंडिंग।
डूबे वो,
अवकाश रहे—
जी, चच्चा जी
सो रहे।
अस्पताल में
मरीज़ रहे—
चर्म रोग के,
ज़ेहन रोग के।
डॉक्टर दुगो ही भले,
आँखें सूजी,
नींद से भारी।
दस घंटे का
पैसा पाकर,
छत्तीस घंटे
मज़दूर रहे—
पर बाल रोग के,
हड्डी रोग के।
दवाई की
का बात कहूँ—
सस्ता वाला
मिलत रहे।
महँगा वाला
दलाल का—
कमीशन से
जो वो पावे,
रोटी उसी की
सेक रहे।
मिल-बाँट के,
दुखिया लूट के—
जी, चच्चा जी
सो रहे।
चार-पाँच बजे
तक नाही,
चार-पाँच साल
की है बात।
फिर गलियों में
लगेंगे झंडे,
कौन लूटेगा,
कौन लुभाएगा।
उसका अवसर
यूँ आएगा,
जैसे हो
सबकी हक़ की बात।
चच्चा जी
जगेंगे फिर,
लुटा के पैसा
थोड़ा सा—
सत्ता को
गले लगाएँगे,
फिर सो जाएँ,
भले वो फिर।
रोएँगे हम फिर,
हक़ लुटा के।
फिर गाएँगे
वही पुरानी
दुखियारी—
चच्चा जी रे, चच्चा जी,
यूँ सो रहे,
क्यों सो रहे?
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