अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

चच्चा जी

 

पुल गिरे, 
टूटे पटरी, 
दाम बढ़े, 
या बिखरे बजरी—
तान के कम्बल, 
लपेटे धोती। 
 
जी, चच्चा जी
सो रहे। 
 
सुने हैं—
चार बरस की थी, 
एक ठो थी, 
चालीस की भी। 
न्याय चाहिए—
ऐसे नारे, 
लगाती रही
हर लम्हे नारी। 
 
फ़र्क़ क्या पड़ता
काले कोरट पे—
एक मर जाए, 
सौ मर जाए। 
पर छुट्टी
सौ दिन की ही चाहे, 
लाख केस
चाहे रहे पेंडिंग। 
डूबे वो, 
अवकाश रहे—
 
जी, चच्चा जी
सो रहे। 
 
अस्पताल में
मरीज़ रहे—
चर्म रोग के, 
ज़ेहन रोग के। 
डॉक्टर दुगो ही भले, 
आँखें सूजी, 
नींद से भारी। 
दस घंटे का
पैसा पाकर, 
छत्तीस घंटे
मज़दूर रहे—
पर बाल रोग के, 
हड्डी रोग के। 
 
दवाई की
का बात कहूँ—
सस्ता वाला
मिलत रहे। 
महँगा वाला
दलाल का—
कमीशन से
जो वो पावे, 
रोटी उसी की
सेक रहे। 
मिल-बाँट के, 
दुखिया लूट के—
 
जी, चच्चा जी
सो रहे। 
 
चार-पाँच बजे
तक नाही, 
चार-पाँच साल
की है बात। 
फिर गलियों में
लगेंगे झंडे, 
कौन लूटेगा, 
कौन लुभाएगा। 
उसका अवसर
यूँ आएगा, 
जैसे हो
सबकी हक़ की बात। 
 
चच्चा जी
जगेंगे फिर, 
लुटा के पैसा
थोड़ा सा—
सत्ता को
गले लगाएँगे, 
फिर सो जाएँ, 
भले वो फिर। 
 
रोएँगे हम फिर, 
हक़ लुटा के। 
फिर गाएँगे
वही पुरानी
दुखियारी—
चच्चा जी रे, चच्चा जी, 
यूँ सो रहे, 
क्यों सो रहे? 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँगूठे की व्यथा
|

  पहाड़ करे पहाड़ी से सतत मधुर प्रेमालाप, …

अचार पे विचार
|

  पन्नों को रँगते-रँगते आया एक विचार, …

अतिथि
|

महीने की थी अन्तिम तिथि,  घर में आए…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

हास्य-व्यंग्य कविता

नज़्म

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं