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स्त्री

 

स्त्री . . .! 
माँ, बहन और प्रेमिका बन
पुरुष को स्नेह, करुणा और प्रेम से
इस तरह भर देती है, 
कि जब वह चली जाती है बहुत दूर—
किसी अपने या पराए बनाए घेरों में—
तो कोई पुरुष, 
चाहे पिता हो, भाई हो या मित्र, 
उस रिक्त स्थल को
भरने में असफल रहता है। 
 
और अंततः, 
स्त्री के बिना
पुरुष फिर अधूरा रह जाता है। 
 
फिर पूर्णता की खोज में
शुरू होता है—
भटकना। 
 
विफल होकर, 
बार-बार
उसे यही ज्ञात होता है—
स्त्री कोई भूमिका नहीं, 
वह जीवन की धुरी है। 
 
ठीक समय की तरह, 
समय के लिए—
जीने का
एकमात्र साधन। 
 
पर इस मनोस्थल तक पहुँचने में
देर कर देते हैं हम अधिकांश पुरुष, 
और आख़िर लूटी जाती हैं स्त्रियाँ—
प्रेम, स्नेह और करुणा
बाँटते-बाँटते। 

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