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युवाणी

 

लूटी चिड़िया, बँटे हिस्से, 
सुने फिर ख़ूब, सिंध के क़िस्से, 
पर कहाँ छूटा हमसे? 
गीता का सार, 
माधव की वाणी, 
द्रौपदी की कहानी, 
अभिमन्यु की शौर्यता, 
नालंदा, शिला की प्रभुता
भारतवर्ष की अखंडता, 
इसका न कोई क़िस्सा है, 
कारण पीछे तार जुड़े पूरे जन के, 
मुख झूठे शान के लेप के तन पर, 
हर एक के हारे मन के। 
 
सवाल है हे भारतवर्ष, 
कर्म कहाँ है, शर्म कहाँ है
कंधे ढीले तो मृत करते, 
साँसों के लिए कायर डरते, 
लाशों के ढेर की भाँति, 
हर ज़ुल्म पर तो वो चुप रहते, 
 
अब नींद में ख़ूब जी लिए, 
सपनों में बसते डर को, 
आँखों से ख़ूब सेक लिए
बारी है फिर से इतिहास के पन्नों को, 
जीने की, जिलाने की, 
 
तुम उठो अब मृत्यु के आसन से, 
मृत्यु के उस पार लड़ो तुम
जहाँ मौत भला मस्तक पर हो, 
सिर कटने को तत्पर हो, 
अंत भला आँखों पर हो, 
पलकें न झुकने के हठ पर हो 
कटती गर्दन, भयमय शत्रु, 
स्याही, ख़ून-पसीने संग बिन अश्रु, 
मानचित्र भारत हो, 
भारत हो और भारत हो। 

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