ख़्याल
शायरी | नज़्म अवनीश कश्यप1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
अँधेरा है शहर,
शोर भी कहीं गुम है।
बाक़ी है रात पूरी,
लोग भी कहाँ कम हैं।
सब्र है, वही बातें हैं,
तुम न हो, तुम्हारी बातें हैं।
फिर क्या ग़म है?
क्यों ग़म है?
तुम कहीं हो भला,
फिर ये आँखें क्यों यूँ नम हैं।
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