जीवन की अटकलें
काव्य साहित्य | कविता अवनीश कश्यप1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
एक पिंजरे में खड़ा हूँ,
डर से घिरा हूँ।
डगमगाती ये आशाएँ मेरी,
मिटा न जाए ये मेरी परछाईंं मेरी।
आकाश जैसा बनना चाहा ऊँचा,
दुनिया देख अपने को पाया नीचा।
लहरों में डूबते हुए अपने को पाया,
पर कहीं इक तिनका भी न पाया।
शीशे की तरह टूटा सपना,
तब लगा कोई न है अपना।
निराशा की होड़ में अपने को पाया,
तब लगा कैसा जीवन पाया।
लक्ष्य की दुनिया में एक और क़दम बढ़ाया,
डरा-सहमा पड़ा, संशय में—क्या मैंने सही क़दम उठाया?
एक पिंजरे में खड़ा हूँ,
डर से घिरा हूँ।
डगमगाती ये आशाएँ मेरी,
मिटा न ले जाए ये परछाईंं मेरी।
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