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वियोग

 

मुझे याद है—
मुझे उठा लिया गया था अपने घर से, 
छोटी, गोल, 
किसी कोयल की चोंच में। 
 
अकेली। 
डरी। 
हाथ-पाँव मारे। 
 
ज़ोर से चीखी—
चिल्लाई—
पर मेरी आवाज़
बस मुझ तक ही रही। 
 
ख़ुद को वापस
घर की ओर मोड़ने की चाह
गले में ही अटक गई। 
 
कुछ देर
आकाश में हवा खाकर, 
अलग-अलग
पौधों, पेड़ों से टकराकर, 
 
वो एक पहर
मुझे कई साल लगने लगा। 
और लगा—
ये अँधेरा ही
अब से मेरा घर होगा। 
 
और फिर—
उसने
बीच आसमान
मुझे छोड़ दिया। 
 
डर—
इतनी ऊँचाई से गिरने का। 
ग़म—
घर से बिछड़ जाने का। 
दर्द—
सब बिखर जाने का। 
 
एक साथ
मुझे झकझोरते रहे। 
और फिर—
ज़मीन से मुलाक़ात हुई। 
 
ख़ुद से खड़ी होने से
ख़ुद को
दृढ़ता में बाँधने तक, 
 
उसने
न सिर्फ़ अपनाया, 
मुझे
घर बनाने की आज़ादी भी दी। 
 
मैं आगे बढ़ती रही। 
हताशा
धीरे-धीरे मिटती रही। 
 
मेरे बनाए घर
अब बड़े हो चुके थे। 
मेरा बचपन
सामने लौट आया था। 
 
और फिर—
जब सब ठीक था, 
मुझे प्रेम हुआ—
 
उस
चलते-फिरते
छोटे घर से, 
 
जो मुझमें
लिपट जाता, 
कभी भी आकर, 
क़िस्से सुनाता, 
नाराज़ होता, 
ख़ूब हँसता—
और जैसे
सब बाँट जाता। 
 
फिर उम्र बीती। 
अब वो
मुझसे मिलने नहीं आता। 
 
शायद
उसे भी
कोयल ले गई थी। 
 
और फिर—
वो लौटा, 
 
जब प्रेम को तरसती
मेरी सारी शक्ति
समय
चुरा रहा था। 
मैं खिल उठी। 
 
पर क़रीब आने पर
वो
मुझसे गले नहीं लगा। 
 
मैं ये देख
पहले ही
मुरझा चुकी थी। 
 
और वो . . . 
मुझे तब तक काटता रहा—
जब तक
घर बना, 
जब तक
घर रहा। 
 

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टिप्पणियाँ

Aditya Sharma 2025/12/29 09:38 PM

Great man This poem expresses the deep emotions in simple words and leaves a strong impact on the reader.

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