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तेरहवीं का रायता

 

शक्ल पर बेशर्मी की चादर ओढ़े, 
उँगली बड़े चाव से मुँह तक जा रही। 
सुर-सुर की आवाज़
एक साथ उदासी को थप्पड़ चखा रही। 
 
तब तक एक और संदेश आता है—
वो डेढ़ साल की बच्ची . . . 
एक साथ भोज खाने वाला समूह, 
आह की आवाज़ निकालता है। 
 
“उसे छुटकारा जल्द मिला। 
अठारह तक जीती, सत्तर तक जीती—
फिर उसे ग़म होता, मिलती मायूसी।” 
 
एक और आह के बाद
सुर-सुर की आवाज़ माँ तक फिर पहुँची। 
 
आँखें गईं दीपक की लौ पर, 
जो नज़र गड़ाए था माला पर। 
खिलती तस्वीर, मुस्काती माला, 
दिखती नज़रें—बस माला, माला। 
माँ की आँखें डबडबा चुकी थीं। 
 
पंद्रह मोतियों की वो माला, 
अभी तो चमकती थी—
बहुत मज़बूत, बिन उलझन के। 
अभी तो घर को रोशन करती थी। 
 
फिर पंद्रह को ग़ौर से देख, 
घर का मालिक बिखर चुका था। 
आँखों से निकलती हर बूँद पर
जैसे यादों का मेला था। 
 
अचानक तीखा लगा वो रायता। 
खाते-खाते पंडितजी की सिट्टी हुई ग़ुल। 
बिन पानी, पकड़े धोती, 
दौड़े घर—जैसे बिखर गई हो
क़ीमती, इकलौती उनकी माला। 
 
पूरी गलियों में दौड़ते, पागल जैसे, 
आह की जगह “हाय” चिल्लाते। 
बूढ़े पंडित आँसुओं से भीग चुके थे। 
पहुँचे, टूटे किवाड़ खोल, वो आँगन। 
 
सफ़ेद रंग ओढ़े वो मोती, 
अपनी चमक खो चुका था। 
बदहवास पंडित गिरे ज़मीन पर, 
मुँह से लार टपक रहा था। 
 
धड़कन बंद होते-होते, 
वो सूखा रायता वाला हाथ
चमक को वापस लाने की
जी-तोड़ कोशिश कर रहा था। 
साँसें धीमी हो गईं, 
आँखें मोती की ओर। 
 
आँगन सुनसान था, 
चिड़ियों की चहचहाट थी। 
घर का आख़िरी सदस्य
भौं-भौं कर रो रहा था। 
और दूर कहीं, उस सुर-सुर की आवाज़
और आह का मिलाप
अभी भी किसी घर को कौंध रहा था। 

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