इंतज़ार
शायरी | नज़्म अवनीश कश्यप1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
मैंने देखा,
तेरे जाने पर—
गुम होना,
लफ़्ज़ खोना,
चेहरे पर उदासी को,
सवालों को,
जो लाज़मी थी, ख़ास थी।
की आख़िर—
तुम आ कर हर मर्तबा
ठहर क्यों नहीं जाते . . .?
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
हास्य-व्यंग्य कविता
नज़्म
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं