उसी तरह
काव्य साहित्य | कविता अवनीश कश्यप15 Jul 2026 (अंक: 301, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
मैं छूकर देखता हूँ,
ये पानी में परछाईं तुम्हारी तो नहीं।
नहीं . . .
ये तो आसमान है,
जो तुम्हारी तस्वीर बनाकर
धुँधली-से रंग, एक-एक कर,
आखों में भरता जा रहा है,
ठीक उसी तरह,
उसी तरह।
जैसे आख़िरी मुलाक़ात में,
तुम्हारे पास होने का एहसास,
वो तुम्हारा चेहरा, आँखें,
और अलविदा कहती हुई
तुम्हारी लहराती ज़ुल्फ़ें।
और हाँ . . . आख़िर तुम्हारी ट्रेन,
जो न लौटने के वादे की पटरी पर
चलते-चलते
गुम-सी हो रही थी,
ठीक उसी तरह,
उसी तरह।
आखों के सामने,
ठीक ओस की तरह धुँध है,
पर नर्म-सी, गालों पर,
अपनी दिशा बनाती,
मन को यादें से रेतते-रेतते,
छल्ली-छल्ली कर गई
और आख़िर तालाब को गले जा लगी।
ठीक उसी तरह,
उसी तरह।
अब तुम ही कहो,
गलियों में चलते-चलते,
जब मैं नाउम्मीदी से टकराऊँगा,
और किसी मशग़ूल पल में
अचानक तुम्हें नहीं पाऊँगा,
क्या मैं आसमान से लड़ पाऊँगा?
या तुम थम जाओगे,
पहली मुलाक़ात की तरह?
लौट आओगे,
जैसे लौटती है अक़्सर
यादें की परछाईं,
हाँ . . . ठीक उसी तरह।
शायद . . . उसी तरह।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
हास्य-व्यंग्य कविता
नज़्म
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं