पहला सफ़र
काव्य साहित्य | कविता अवनीश कश्यप15 Jul 2026 (अंक: 301, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
ट्रेन सुरमयी लग रही है।
पर रोने के रुदन को ढकते-ढकते
धक-धक, सट-सट शहर से दूर जाती—15206।
“रुक जा . . . रुक जा . . . मत जा . . . ”
कहते-कहते भी थकती नहीं।
शायद वो भी असहाय है।
शहर पीछे छूटता जाता है,
जैसे तना हुआ धागा
एक सीमा के बाद
बिना आवाज़ टूट जाता है।
ढलता सूरज खिड़की में आ बसता है।
उसकी रोशनी ऐसे तकती है,
जैसे माँ . . .
मेरे क़दम घर से दूर जाने पर
मुझे खींचना चाहती हों।
मैं लौटकर नहीं देखता।
पर उदासी, प्रेम और चिंतन—
कोई इन्हें एक साथ अलग-अलग कर चुन पाया है?
“चाय . . . चाय . . . ”
ज़ोर की आवाज़ जैसे
मुझे वापस ट्रेन में बिठा देती है,
और फिर एक चुस्की—सुररर।
माँ, चाय, प्याला,
और वो आख़िरी शाम
अचानक मेरे बग़ल बैठ जाती है।
रात गहरी हो गई है।
ट्रेन शहर से दूर।
नया शहर मन में सवाल करने लगा है,
पर
माँ अब भी उदासी में लिपटी होंगी—
खाने को न कहना, और फिर
आवाज़ को तकिए में दबाकर रोना।
ख़ाली घर शान्ति से उनके मन को
जैसे हँसिए से रेत रहा होगा,
पर उन्हें कौन रोक पाया है?
शायद माँ . . .
दर्द के पर्याय से भी अधिक भारी हैं।
“टिकट, टिकट . . . ”
नाम?
कहाँ जाना है?
ट्रेन ने और रफ़्तार पकड़ ली है।
अब शहर और दूर है,
घर अब और दूर होगा।
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