डर का सेल काउंटर
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी डॉ. मुकेश गर्ग ‘असीमित’1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
आइए . . . आइए . . . ज़रा इधर आइए भैया . . .
ए जाने वाले तेरा ध्यान किधर है, डर का सेल काउंटर इधर है
डर का ग्रैंड सेल लगा है बाबू।
सीज़नल नहीं—परमानेंट लगा है बाबू।
यहाँ तारीख़ की कोई पाबंदी नहीं, डर की एक्सपायरी भी नहीं।
काउंटर पर खड़ी सेल्स गर्ल पूरी तमीज़ और पूरे डर के साथ पुकार रही है—
“आइए सर, बताइए . . . किस तबक़े के हैं आप?
स्टुडेंट हैं, नौकरीपेशा, व्यापारी, गृहिणी, बुज़ुर्ग या व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से पास आउट?
हमारे पास हर वर्ग के लिए अलग डर है—
फिटिंग में भी, बजट में भी, औक़ात में भी।”
कोचिंग मैनेजर काउंटर पर रुकता है—
“सर, कोई डर चाहिए तड़कता फड़कता हमारे धंधे के लिए।”
काउंटर के पीछे बैठा सेल्स मैनेजर मुस्कुराता है—
“हल्का डर? आप नए लगते हैं।
ये लीजिए—बोर्ड और एंट्रेंस कॉम्बो डर।
इसके साथ रैंक नहीं आई तो ज़िंदगी नहीं वाला बोनस डर फ़्री।
आज एडमिशन नहीं लिया, तो कल यह डर
डबल फ़ीस और ट्रिपल तनाव के साथ मिलेगा।”
पास खड़ा स्कूल प्रबंधक बीच में टपक पड़ता है—
मुझे भी कोई . . .
“ओह आपके लिए, आप चाहें तो पेरेंट्स मीटिंग स्पेशल डर भी जोड़ लीजिए।
इसमें बच्चा नहीं, माता-पिता काँपते हैं।
रिज़ल्ट से पहले नींद उड़ना गारंटी है।”
उधर कॉर्पोरेट का मालिक आगे बढ़ता है—
“कुछ ऐसा डर चाहिए जो रोज़ काम आए . . .
ऑफ़िस में सूट करे।”
ओह हाँ . . . आपके लिए ये कॉर्पोरेट पैक. . .
वह डर की अलमारी खोलता है—
“बिलकुल सर।
ये लीजिए—जॉब सिक्योरिटी डर।
पैकेज में मिलेगा—
बॉस का रोज़ बदलता मूड,
छँटनी की अफ़वाहें,
और रविवार की ‘अनौपचारिक’ मीटिंग।”
फिर झुककर धीमे से जोड़ता है—
“आज ऑफ़र में EMI का डर बिल्कुल फ़्री है।
घर की किश्त, बच्चों की फ़ीस
और भविष्य का ब्लैंक स्क्रीन—सब शामिल।”
व्यापारी झाँकता है—
“माल ऐसा दीजिए जो बिकता रहे।”
“आपके लिए तो स्पेशल है सर—मार्केट क्रैश कॉम्बो।
GST का डर, नोटिस का डर,
और साथ में ऑनलाइन कम्पटीशन का सैंपल फ़्री।
ले जाइए सर—आपकी रोज़ी-रोटी के लिए ज़रूरी है।”
सेल्स इस महीने रिकॉर्ड पर है।
अचानक एक नेता टाइप ग्राहक दुकान में घुस आता है—
चेहरे पर ढीठता, आँखों में बेहयाई।
“मेरे लिए कुछ बड़ा चाहिए,”
वह आदेशात्मक लहजे में कहता है।
सेल्स गर्ल तुरंत सकते में,
डर का थोक ख़रीदार जो आ गया है।
“सर,” वह सम्मान से झुकती है,
“आपके लिए हमारा प्रीमियम—‘जनता वाला डर’ पैक है।
इसमें भीड़, चुनाव, विरोध—सब शामिल हैं।
और आज के ऑफ़र में—
‘राष्ट्र ख़तरे में है’ बिल्कुल फ़्री।”
नेता भौंहें सिकोड़ता है—
“कुछ और तगड़ा नहीं है?
ऐसा जो टीवी पर चले,
व्हाट्सएप में फैले
और सवाल पूछने वालों को चुप करा दे।”
सेल्स गर्ल मुस्कुराती है—
“बिलकुल सर।
ये लीजिए ‘अर्बन नक्सल ऐड-ऑन’—
इससे हर असहमत नागरिक संदिग्ध बन जाता है।
और चाहें तो इसमें
‘विदेशी साज़िश’ पैक भी जोड़ सकते हैं।
सबूत की ज़रूरत नहीं पड़ती—
बस बयान काफ़ी होता है।”
नेता थोड़ा आगे झुकता है—
“वोट बैंक के हिसाब से कुछ कस्टमाइज़ हो सकता है?”
“सर, यही तो हमारी स्पेशलिटी है, ”
सेल्स गर्ल तुरंत कैटलॉग पलटती है—
“यह रहा धर्म आधारित डर—
इसमें त्योहार, जुलूस और इतिहास सब काम आता है।
और यह रहा सब विपक्ष की चाल है वाला डर—
जो हर पाँच साल बाद जनता को फिर से बेच सकते हैं।”
नेता संतुष्ट दिखता है,
पर फिर भी पूछता है—
“अगर जनता सवाल पूछने लगे तो?”
सेल्स गर्ल धीमे स्वर में कहती है—
“उसके लिए हमारे पास
‘देशद्रोह का लेबल’ है सर।
एक बार चिपका दिया—
फिर सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद देश के ख़िलाफ़ हो जाते हैं।”
काउंटर के ऊपर टँगा स्लोगन चमकता है—
“डर जितना बड़ा, सत्ता उतनी मज़बूत।”
सेल्स इस मौसम फिर रिकॉर्ड तोड़ रही है।
काउंटर के आख़िर में मीडिया वाले खड़े हैं—
हाथ में माइक, आँखों में TRP और गले में हड़बड़ी।
“हमें थोक में चाहिए, ”
सभी एक साथ बोलते हैं,
सेल्स गर्ल चौंकी . . .
थूक सर, वो तो चैनल पर थूकम-फजीती में आपको मिलता ही है।
अरे थूक नहीं हमारा मतलब थोक में-बल्क में!
सेल्स गर्ल बिना चौंके कहती है—
“ज़रूर।
आपके लिए ‘ब्रेकिंग डर पैकेज’ तैयार है।
इसमें लाल पट्टी, तेज़ संगीत
और चीखता एंकर—सब साथ।”
एक रिपोर्टर पूछता है—
“कुछ ऐसा भी हो जो हर आधे घंटे में चल सके?”
“बिलकुल, ”
सेल्स गर्ल रिमोट घुमाती है—
“ये रहा ‘सूत्रों के हवाले से’ डर।
सच की ज़रूरत नहीं,
बस आवाज़ भारी होनी चाहिए।”
दूसरा मीडिया कर्मी बीच में बोल पड़ता है—
“डर टिके रहना चाहिए . . .
ख़त्म जल्दी न हो।”
“इसके लिए हमारे पास
‘पैनल बहस एक्सटेंडर’ है, ”
सेल्स गर्ल समझाती है—
“चार प्रवक्ता, आठ आरोप
और कोई निष्कर्ष नहीं।
डर चलता रहेगा।”
एक वरिष्ठ संपादक आगे आता है—
“अगर ख़बर छोटी हो तो?”
सेल्स गर्ल मुस्कुराती है—
“कोई समस्या नहीं सर।
हमारे पास ‘ग्राफिक्स और रीकैप डर’ है।
एक ही फ़ुटेज दिन भर
नए कोण से चलाइए।”
मीडिया वाले संतुष्ट हैं।
उन्होंने थोक में डर लिया है—
पैसे विज्ञापन देंगे,
क़ीमत समाज चुकाएगा।
काउंटर के ऊपर बोर्ड टँगा है—
“अगर शान्ति दिखे, तो समझिए ख़बर कमज़ोर है।”
स्टुडियो की बत्तियाँ जल उठती हैं।
डर लाइव हो चुका है।
और हाँ—
यहाँ एक डर के साथ एक डर फ़्री है।
क्योंकि डर अकेला नहीं आता,
पूरी रिश्तेदारी लेकर आता है।
तो आइए भैया . . . देर मत कीजिए।
डर की माँग बढ़ रही है,
और समझ का स्टॉक सीमित है।
कल पछताने से बेहतर है—
आज डर ले जाइए।
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