टंकी का बयान: एक गिरावट की आत्मकथा
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी डॉ. मुकेश गर्ग ‘असीमित’1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
अभी एक टंकी ने अपनी गिरावट दर्ज करवाई है। वैसे भी यह दौर गिरावटों का ही चल रहा है। शेयर मार्केट गिर रहा है, पुल गिर रहे हैं, रुपया तो कब से गिरता चला आ रहा है। नेता और अफ़सर रोज़ गिरने के नए-नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। ऐसे में भला एक टंकी क्यों पीछे रहती? अगर वह खड़ी रह जाती, तो उसे असामयिक ही नहीं, असामाजिक भी कहा जाता।
दरअसल आज गिरना कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक चलन है। जो गिर नहीं रहा, वही शक के दायरे में है। स्थिर खड़ा रहना अब ईमानदारी नहीं, पिछड़ापन माना जाता है। टंकी ने समय की नब्ज़ पहचान ली थी। उसने समझ लिया था कि इस देश में अब वही संरचना प्रासंगिक है, जो समय-समय पर गिरकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराए। जो लगातार खड़ी रहे, उसे इतिहास की फ़ाइलों में धूल खाने के लिए भेज दिया जाता है।
ख़ुशी की बात बस इतनी है कि टंकी ने आत्महत्या करने से पहले औपचारिकता निभाई। उसने गिरने से पहले अपने गिरने पर खेद व्यक्त किया और एक आत्मकथा लिख डाली।
अगर आप भी इस आत्मकथा में दिलचस्पी रखते हैं, तो पढ़ डालिए।
हे उद्घाटनकर्ताओ,
कृपया मुझे क्षमा कीजिए। मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। मैं देख रही हूँ आप सबके उदास चेहरे—नेताजी के हाथ में कैंची है, पर वह हवा में ही अटक गई है। मुझे बेपर्दा करने से पहले ही मैं स्वयं बेपर्दा हो गई। कितनी शिद्दत से मुझे बनाया गया, यह मैं जानती हूँ । चाहे बेवुकूफ़ ही बनाया, बनाया तो सही। सुना है मुझे बनाने में इक्कीस करोड़ का बजट लगा। मैं जड़ हूँ, इतनी गणित नहीं समझ पाई। सरकारी बजट की जोड़-घटाव उतनी सीधी नहीं होती, जितनी मैं समझ बैठी थी। सच कहूँ तो कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर ही सही, मुझे बनाया तो गया था। मेरा इतना स्वार्थी होना भी नहीं बनता था। कम से कम मुझे बनाने में जिन अफ़सरों और ठेकेदारों के घर बने होंगे, उनका ही ख़्याल नहीं रखा। पर क्या करूँ—मैं सरकारी अव्यवस्था की भावनाएँ पढ़ नहीं पाई।
मैं अफ़सरों के लटकते चेहरे देख रही हूँ, निर्माण विभाग की शर्मिंदगी भी दिख रही है। सबकी उँगलियाँ मेरी ओर उठ रही हैं। यह शिकायत मैं सात जन्मों तक नहीं भूलूँगी। लोग कह रहे हैं—क्या होता, उद्घाटन तक ही रुक जाती। मैंने गिरने में उतनी जल्दी कर दी, जितनी मेरे निर्माताओं ने बनाने में भी नहीं की थी। काश, सारा दोष मैं अपने सिर ले लेती। काश, मेरे गिरने को लोग दुर्घटना मान लेते। पर सच यही है कि मैं पानी के दबाव से ज़्यादा भ्रष्टाचार और मिलावट के दबाव को सह नहीं पाई। यह गिरना नहीं था, यह बैठ जाना था—थककर, उकता कर, व्यवस्था की इस बेरुख़ी से।
आम जनता ने मेरे लिए कितने सपने पाले होंगे। मुझे पानी भरना था, जनता की प्यास बुझानी थी, उद्घाटन के दिन मंच की शोभा बढ़ानी थी। पर नियति को कुछ और मंज़ूर था। मेरे जन्म से पहले ही तय हो गया था कि मुझे पानी से ज़्यादा भाषण ढोना पड़ेगा। मेरे भीतर पानी से पहले फ़ाइलें भरी गईं—टेंडर की, कमीशन की, स्वीकृति की और ‘सब ठीक है’ की। मुझे बनाने से पहले जो तैयारियाँ हुई थीं, उनसे मैं कितनी ख़ुश थी। इंजीनियर ने मुझे नक़्शे में मज़बूत बनाया, ठेकेदार ने बिल में, और अफ़सर ने नोटशीट में । सौ तरह के झाड़फूँक टन-टोटके करके मेरे पैदा होने की मन्नत माँगी होगी। अब क्या हुआ—सपने हक़ीक़त में बदल जाएँ, ऐसा नसीब तो लिखकर नहीं लाई थी मैं। मैं जड़ हूँ, पंचभूत भी पूरे नहीं—मिट्टी और जल से बनी थी; मिट्टी में मिल गई, यही नियति है। इसमें रोना कैसा। पर मेरे कारण कोई और बदनाम हो—यह मुझे सहन नहीं हो रहा। हम ख़ुद तो अपना नाम नहीं कर सके, उलटे दूसरों को बदनाम किया जा रहा है।
अब मेरी मज़बूती पर सवाल उठ रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि इक्कीस करोड़ की टंकी इतनी जल्दी कैसे गिर गई। मैं उनसे पूछना चाहती हूँ—क्या आपने कभी इक्कीस करोड़ की नीयत देखी है? नीयत खोखली हो, तो कंक्रीट को दोष देना अन्याय है। मुझे जितना सीमेंट मिला, उससे ज़्यादा समझौते मिले। जितनी रेत डाली गई, उससे ज़्यादा ‘रेट’ तय हुई। और लोहे का जितना सरिया था, उससे ज़्यादा नियमों की धाँधलेबाज़ी का लचीलापन था।
टेस्टिंग के नाम पर मुझमें पानी भरा गया। कहा जा रहा है कि पानी भारी था—हो सकता है सामान्य पानी की जगह ‘हेवी वॉटर’ भर दिया गया हो। मुझे अपने न सही, पानी पर दया आ रही है। क्या पानी पर भी जाँच बैठेगी? मित्रों, पानी तो टंकियों में ही नहीं, अफ़सरों के घरों के दाना-पानी भरने के काम भी आता है।
गिरकर भी कुछ तो हासिल हुआ। देखिए न—रील चली, ब्रेकिंग न्यूज़ आई। विपक्ष ने मेरी टंकी के मलबे और पानी से मुद्दों की खिचड़ी पका डाली। एक तरफ़ सत्तर साल पुरानी टंकी का गौरवगान, दूसरी तरफ़ मेरी ताज़ा गिरावट का मातम। मेरे गिरने में तीन मज़दूर घायल हुए। उनके परिवार मुआवज़े की रक़म से मुँह बंद करने को बेचैन हैं।
सरकारी मशीनरी का कोई दोष नहीं बताया जा रहा। मशीनरी दरअसल बहुत चुस्त है—जब बिल पास करने हों, भुगतान रोकना हो, ज़िम्मेदारी नीचे की ओर धकेलनी हो, तब देखिए कैसी बंदर जैसी फ़ुर्ती दिखाती है। थक गई है मशीनरी भी—आख़िर मशीन है, इंसान थोड़े ही। पर जब गुणवत्ता जाँचने की बारी आती है, तो वह ध्यान में चली जाती है। मीन-मेख निकालना इंसानों का काम है, सरकारी मशीनरी का नहीं।
अब कहा जा रहा है कि मैंने सरकार को शर्म से पानी-पानी कर दिया। मैं सोचती हूँ—सरकार तो पहले ही भ्रष्टाचार के गड्ढे तक डूबी हुई है; मेरे गिरकर बहाए गए उन्नीस लीटर पानी का योगदान भला कितना होगा?
मुझसे यह भी कहा जा रहा है कि कम से कम उद्घाटन तक तो खड़ी रहती। सच है—देखिए न, कितनी भली लग रही होती। गिरी तो कोई नेता-अफसर पास नहीं खड़ा हुआ। अगर खड़ी रहती, तो बड़े सलीक़े से बेपर्दा होती—नेता-अफसरों के साथ सेल्फ़ी खिंचती, अख़बार के पन्नों में शान से दमकती। ख़ैर, छप तो अब भी रही हूँ, पर मेरे मलबे के पास फटकने को कोई तैयार नहीं। अगर उद्घाटन के बाद गिरती, तो क्या मुझे ज़्यादा सभ्य माना जाता? उद्घाटन से पहले गिरकर मैंने शिष्टाचार भंग कर दिया—यही मेरा अपराध है।
अब मुझसे माफ़ी माँगने को कहा जा रहा है। तो मैं सरकार से क्षमा चाहती हूँ। मुझे नहीं पता था कि मेरी मज़बूती से ज़्यादा आपकी असहजता उजागर हो जाएगी। मैं समझ बैठी थी कि बड़े बजट के साथ बड़ी ज़िम्मेदारी भी आती है। मुझसे यह भूल हो गई। अगली बार ध्यान रखूँगी।
मैं गिरकर ख़ामोश होना चाहती हूँ। मेरे मलबे में सवाल दबे हैं—कोई उन्हें न निकाले। पड़े रहने दीजिए मुझे। मलबा हटेगा, तो सवाल भी उछलकर बाहर आ जाएँगे। आप चाहें तो नई टंकी बना लीजिए—और ज़रूर बनाइए। लेकिन एक सुझाव है, जो बिना टेंडर के दे रही हूँ—इस बार टंकी में पानी भरने से पहले व्यवस्था में थोड़ी ईमानदारी भरिए। वरना कोई गारंटी नहीं कि ये टंकियाँ भी भारतीय रुपये और अमेरिकी टेरिफ्फ़-दादा की तरह गिरने की हद से भी ज़्यादा न गिर जाएँ।
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