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ग़ज़ल की परंपरा और ‘बग़ैर मक़्ता’ का स्थान

किताब का नाम: बग़ैर मक़्ता (ग़ज़ल संग्रह) 
ग़ज़लकार: अमित धर्मसिंह
पृष्ठ: 184
मूल्य: ₹300/-
प्रकाशक: अतुल्य पब्लिकेशंस
दिल्ली–110093

 

ग़ज़ल: उत्पत्ति, स्वरूप और परंपरा:

डॉ. अमित धर्मसिंह का यह पहला ‘ग़ज़ल संग्रह’ है। अब तक उनकी कई साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘बग़ैर मक़्ता’ ग़ज़ल संग्रह में कुल 155 ग़ज़लें हैं जो अपने संक्षिप्त रूप में भाव–संपन्नता, लय, संगीतिकता और संवेदना की गहराई का अप्रतिम उदाहरण है। अरबी–फारसी से होकर यह विधा भारतीय उपमहाद्वीप में आई, जहाँ इसने उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं में अपनी समृद्ध परंपरा विकसित की। ग़ज़ल की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वह संक्षिप्त शब्दों में अनंत अर्थों का विस्तार करती है। दो मिसरों का एक शेर ही किसी पूरे जीवन–अनुभव का सार बन जाता है। प्रेम, विरह, सौंदर्य, आध्यात्मिकता, समाज और मनुष्य की नियति—इन सबका संक्षेप ग़ज़ल में होता है। भारतीय परंपरा में ग़ज़ल केवल प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मा के एकांत की आवाज़ भी रही है। मीर, ग़ालिब, फ़ैज़, फ़िराक़, जोश, और आगे चलकर दुष्यंत, निदा फ़ाज़ली, बशीर बद्र, गोपालदास ‘नीरज’, अदम गोंडवी—सभी ने ग़ज़ल को समय, समाज और मनुष्य के साथ जोड़ा। इस परंपरा में अमित धर्मसिंह की कृति ‘बग़ैर मक़्ता’ भी एक उल्लेखनीय पड़ाव है—जहाँ पारंपरिक ग़ज़ल की संवेदना, आधुनिक मनुष्य के भीतर की बेचैनी और प्रेम की दोधारी पीड़ा, एक साथ उपस्थित है। ‘बगैर मक़्ता’ में शायर स्वयं को ग़ज़ल में उपस्थित करता है—आत्मस्वर और पहचान के रूप में। हिंदी ग़ज़लों में यह परंपरा उतनी सख़्त नहीं रही; अनेक कवियों ने ग़ज़ल को बिना मक़्ता भी लिखा है। इसका कारण यह है कि हिंदी में “कवि का अहं नहीं, भाव व अनुभव” केंद्र में आता है। अमित धर्मसिंह का ‘बग़ैर मक़्ता’ इसी परंपरा का विस्तार है—वह कहना चाहते हैं कि “शायर को नाम से नहीं, उसके भावों से पहचाना जाए।” 

1. अमित धर्मसिंह: कवि की दृष्टि और संवेदनात्मक संसार:

अमित धर्मसिंह की ग़ज़लों में जो भाव–दुनिया उभरती है, वह एक संवेदनशील, आत्मनिष्ठ और प्रेमशील व्यक्ति की है। उनकी रचनाएँ यह बताती हैं कि प्रेम केवल रूमानी विषय नहीं, बल्कि जीवन के हर अनुभव में व्याप्त एक दृष्टि है। ‘बग़ैर मक़्ता’ में 155 ग़ज़लों का संकलन है—और लगभग हर ग़ज़ल में कवि का आत्म–संवाद, उसकी तड़प, उसका जिज्ञासु मन और उसकी आस्था एक साथ बोलते हैं। कवि जीवन को अनुभव की तरह जीता है, और उन अनुभवों को शब्दों में ढाल देता है। उदाहरण के लिए—“ज़िन्दगी ये प्यास जैसी है/आस में ये निराश जैसी है।” यह शेर कवि की जीवन–दृष्टि को उद्घाटित करता है—जीवन अपने भीतर असंतोष और चाहत, दोनों का संगम है। इसी द्वंद्व में कवि का भावनात्मक अनुभव। काव्य भावना का संसार आकार लेता है। 

2. ‘बग़ैर मक़्ता’: शीर्षक का प्रतीकात्मक अर्थ और रचनात्मक साहस:

‘बग़ैर मक़्ता’ केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि एक साहित्यिक घोषणा है। ग़ज़ल के पारंपरिक ढाँचे में मक़्ता का न होना किसी प्रकार की अधूरापन नहीं, बल्कि एक नये आत्मविश्वास का संकेत है। कवि कहता है—“मैं अपनी पहचान से परे जाकर, केवल अनुभव की भाषा बोलना चाहता हूँ।” यह दृष्टिकोण उस आधुनिक शायर का है जो मानता है कि कविता लेखक की नहीं, अनुभव की सम्पत्ति है। इसलिए वह अपने नाम को पीछे रख देता है। साथ ही, ‘बग़ैर मक़्ता’ का शीर्षक एक और गहराई रखता है—यह बताता है कि प्रेम और जीवन दोनों ही अधूरेपन की पूर्णता हैं। मक़्ता का न होना, अधूरापन नहीं, बल्कि अनंतता का प्रतीक है। 

3. ग़ज़लों की शैलीगत विशेषताएँ: भाषा, लय, भाव और प्रतीक:

अमित धर्मसिंह की भाषा न तो पारंपरिक उर्दू की जटिलता रखती है, न ही पूरी तरह साधारण हिंदी की सपाटता। वह दोनों का मधुर संगम है। उनकी ग़ज़लों में बोलचाल की मिठास है, साथ ही शास्त्रीय लय भी बनी रहती है। शब्द-संयोजन सरल, पर अर्थ गहरे हैं—“हर नए मोड़ पे कुछ लोग बिछड़ जाते हैं/गुल खिले कुछ नए तो कुछ उजड़ जाते हैं।” यह शेर एक आम जीवन-अनुभव को ग़ज़ल की सधी हुई लय में बदल देता है। कवि के प्रतीक—प्यास, आस, नज़र, ज़ख्म, याद, मुस्कान, सफ़र—जीवन की यात्राओं के भावात्मक बिंब हैं। ये प्रतीक न केवल प्रेम के, बल्कि अस्तित्व के भी संकेत हैं। 

4. शृंगार रस की द्विविधा: संयोग और वियोग का भाव–संघर्ष:

‘बग़ैर मक़्ता’ का मुख्य स्वर शृंगार रस है, और वह भी उसकी संयुक्त द्विविधा—संयोग और वियोग दोनों। कवि प्रेम को केवल मिलन या आकर्षण तक सीमित नहीं रखता, बल्कि वह उसे आत्मा की तृष्णा और विरह की अग्नि के रूप में देखता है—“तू बता तुझको भुलाऊँ कैसे/या तुझे पास बुलाऊँ कैसे।” यह शेर केवल विरह की व्यथा नहीं, बल्कि प्रेम के अस्तित्वात्मक द्वंद्व की गूँज है। संयोग और वियोग, दोनों ही प्रेम के दो पंख हैं—एक के बिना दूसरा अधूरा। कवि दोनों को समान सौंदर्य और गरिमा के साथ प्रस्तुत करता है। संयोग की ग़ज़लें सौंदर्य और उल्लास से भरी हैं—“नज़र ही नज़र में कोई अपना बना गया।” वियोग की ग़ज़लें पीड़ा और आत्मचिंतन से—“ज़िन्दगी जब भी मुस्कुराई है/एक नई चोट हमने खाई है।” इस द्वैत में कवि की मानवीय संवेदना परिपक्व होती है। 

5. ग़ज़लों का सामाजिक तथा व्यक्तिगत पक्ष:

अमित धर्मसिंह की ग़ज़लें केवल निजी प्रेमकथाएँ नहीं हैं; उनमें समाज का प्रतिबिंब भी स्पष्ट दिखाई देता है। कवि का प्रेम-अनुभव मनुष्य की सार्वभौमिक पीड़ा से जुड़ा हुआ है—“ज़रूरतमंद को गले अपने लगाकर देखो/दूरियाँ बीच की तुम सारी मिटाकर देखो।” यह शेर केवल व्यक्तिगत दया या संवेदना नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक करुण पुकार है। कवि मानवीय एकता में विश्वास करता है—उसकी ग़ज़लें मनुष्य की मनुष्य से दूरी घटाने की चेष्टा हैं। इसके साथ ही कवि अपने व्यक्तिगत संघर्षों को भी ईमानदारी से व्यक्त करता है—“खुद अपने हाथों ही बेकार हुए हम”, “बीच सफ़र के छोड़ दिया है मेरे हमसफ़र ने” इन पंक्तियों में आत्मस्वीकृति है, कोई बनावट नहीं। व्यक्तिगत पीड़ा यहाँ सामाजिक सत्य में रूपांतरित हो जाती है—हर वह व्यक्ति जो अधूरे संबंधों में जीता है, वह कवि के शेरों में स्वयं को पहचान लेता है। 

6. दार्शनिक गहराई और जीवन-दृष्टि:

कवि के भीतर एक दार्शनिक सजगता भी है। वह प्रेम, पीड़ा और असफलता को जीवन के आवश्यक हिस्से के रूप में स्वीकार करता है—“खुशी अज़ीज है अगर तो ग़म भी क़ुबूल कर/ज़ियादा की चाह है गर तो कम भी क़ुबूल कर।” यहाँ कवि जीवन की संतुलन–दृष्टि सिखाता है—सुख और दुख दोनों एक ही वृक्ष की दो डालियाँ हैं। यह दार्शनिकता कवि के अनुभवों से जन्मी है, न कि केवल पांडित्य से। इसी तरह—“हर ग़म मेरा कुछ सिखा रहा था मुझे।” यह पंक्ति बताती है कि कवि दुःख को शिक्षक मानता है। यह दृष्टिकोण उसे पारंपरिक रूमानी कवियों से अलग बनाता है। 

7. ‘बग़ैर मक़्ता’ का समकालीन महत्त्व और हिंदी ग़ज़ल में योगदान:

समकालीन हिंदी ग़ज़ल में दो प्रवृत्तियाँ समानांतर चली हैं—एक ओर सामाजिक–राजनैतिक चेतना, दूसरी ओर आत्मिक–भावनात्मक अभिव्यक्ति। अमित धर्मसिंह की ग़ज़लें इन दोनों के बीच सेतु बनाती हैं। वह समाज से विमुख नहीं, परन्तु आत्मा से भी अलग नहीं। उनकी ग़ज़लें यह सिद्ध करती हैं कि आधुनिकता का अर्थ असंवेदनशीलता नहीं होता। वह आधुनिकता को मानवीय गहराई के साथ जोड़ते हैं। ‘बग़ैर मक़्ता’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने ग़ज़ल के शिल्पगत अनुशासन को बनाए रखते हुए भावों को नई दिशा दी है। कवि न कोई शोर करता है, न कोई उद्घोष; वह बस शेरों के माध्यम से जीवन के अर्थ खोलता चलता है। 

8. निष्कर्ष: भाव, विचार और शिल्प का संगम:

‘बग़ैर मक़्ता’ अमित धर्मसिंह की आत्मा का दस्तावेज़ है—जहाँ प्रेम, पीड़ा, आत्मसंघर्ष, विश्वास और करुणा एक ही धारा में बहते हैं। कवि का नज़रिया मानवीय है, उसकी शैली सहज है, उसकी दृष्टि दार्शनिक है। वह अपने समय का साक्षी भी है और अपने भीतर का यात्री भी। ग़ज़ल के पारंपरिक रूप को उसने नष्ट नहीं किया, बल्कि उसे अंतर्मुखी स्वर दिया है। ‘मक़्ता’ का त्याग करते हुए भी उसने ग़ज़ल को अधूरा नहीं, बल्कि अधिक पूर्ण और सार्वभौमिक बना दिया है। ‘बग़ैर मक़्ता’ की ग़ज़लें पाठक को सोचने, महसूस करने और भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती हैं। वे यह सिखाती हैं कि—प्रेम केवल एक भावना नहीं, बल्कि मानवता का अनुभव है; पीड़ा केवल दुख नहीं, बल्कि परिपक्वता का मार्ग है और कविता केवल शब्द नहीं, बल्कि अंतरात्मा की पुकार है। 

इसी अर्थ में कहा जा सकता है कि—‘बग़ैर मक़्ता’ आधुनिक हिंदी ग़ज़ल की परंपरा में एक सशक्त, संवेदनशील और वैचारिक हस्तक्षेप है। यह संग्रह पाठक को उस अदृश्य पुल पर ले जाता है, जहाँ प्रेम, जीवन और सत्य—तीनों एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। ‘बग़ैर मक़्ता’ एक ऐसी कृति है जिसमें ग़ज़ल की पारंपरिक शालीनता और आधुनिक संवेदना का सुंदर संतुलन है। शृंगार रस इसका केंद्र है, पर उसके भीतर करुण, शान्ति, हास और वीर रस के स्पर्श भी मिलते हैं। यह संग्रह उन पाठकों के लिए अनमोल है जो प्रेम और जीवन की गहराइयों को शब्दों में महसूस करना चाहते हैं। 

संक्षिप्त सार:

‘बग़ैर मक़्ता’—भावना, संवेदना और आत्मदर्शन का ग़ज़ल-संसार है। अमित धर्मसिंह का ग़ज़ल-संग्रह ‘बग़ैर मक़्ता’ आधुनिक हिंदी ग़ज़ल की परंपरा में एक संवेदनशील पहल और आत्मनिष्ठ कृति के रूप में सामने आता है। कुल 155 ग़ज़लों का यह संकलन प्रेम, वियोग, जीवन-संघर्ष और मानवीय करुणा के अनुभवों से बुना गया है। कवि की दृष्टि केवल रूमानी नहीं, बल्कि गहरी अस्तित्ववादी है—जहाँ हर प्रेम आत्मा की तलाश बन जाता है, और हर पीड़ा आत्मबोध का मार्ग। 

‘बग़ैर मक़्ता’ शीर्षक ही कवि की रचनात्मक और साहसिक पहल का संकेत है। पारंपरिक ग़ज़लों में ‘मक़्ता’ वह शेर होता है जिसमें शायर अपना तख़ल्लुस (नाम) जोड़ता है, परन्तु यहाँ कवि अपने नाम से परे जाकर केवल भावों की भाषा में बोलता है। वह अपने “मैं” को मिटाकर अनुभवों को केंद्र में रखता है—यानी ग़ज़ल को व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वभौमिक बनाता है। यह शीर्षक इस बात की घोषणा भी है कि कविता लेखक की नहीं, भाव की सम्पत्ति है। संग्रह की ग़ज़लों में शृंगार रस का द्विविध स्वर प्रमुख है—संयोग की मधुरता और वियोग की करुणा दोनों। कवि के शेर प्रेम की संपूर्ण यात्रा को व्यक्त करते हैं—“तू बता तुझको भुलाऊँ कैसे/या तुझे पास बुलाऊँ कैसे।” यह द्वंद्व कवि के पूरे भावलोक का केंद्र है। 

भाषा की दृष्टि से ‘बग़ैर मक़्ता’ में उर्दू की कोमलता और हिंदी की सहजता का सुंदर संगम है। प्रतीकों और बिंबों—प्यास, आस, नज़र, ज़ख्म, याद, मुस्कान, सफ़र—के माध्यम से कवि ने जीवन की बहुआयामी संवेदनाओं को साकार किया है। हर शेर एक छोटे से क्षण में एक पूरा दर्शन समेट लेता है—“खुशी अज़ीज है गर तो ग़म भी क़ुबूल कर/ज़ियादा की चाह है गर तो कम भी क़ुबूल कर।” सामाजिक दृष्टि से भी कवि का स्वर मानवीय और समरसतामूलक है—“जरूरतमंद को गले अपने लगाकर देखो/दूरियाँ बीच की तुम सारी मिटाकर देखो।” यहाँ प्रेम करुणा का रूप लेता है और कविता जीवन का नैतिक संदेश बन जाती है। 

अंततः, ‘बग़ैर मक़्ता’ अमित धर्मसिंह के अंतर्मन की वह यात्रा है जिसमें शब्द केवल भाषा नहीं, बल्कि अनुभव की गहराई हैं। इन ग़ज़लों में प्रेम, पीड़ा, विश्वास और आत्मसंघर्ष—चारों का अद्भुत संगम है। यह संग्रह हिंदी ग़ज़ल को नया स्वर देता है—संवेदना की गहराई और शिल्प की सादगी का। संक्षेप में कहा जा सकता है—‘बग़ैर मक़्ता’ न केवल एक ग़ज़ल-संग्रह है, बल्कि मानवीय भावनाओं का वह दर्पण है, जिसमें हर पाठक स्वयं को पहचान सकता है। 

समीक्षक: तेजपाल सिंह ‘तेज’

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