विलासिता: बदलती हुई दुनिया में परिभाषा की पुनर्रचना
आलेख | सामाजिक आलेख तेजपाल सिंह ’तेज’15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
जब हम विलासिता की बात करते हैं, तो सबसे पहले हमारी कल्पना एक ख़ूबसूरत कार, किसी अंतरराष्ट्रीय गंतव्य या पैसों से भरे कमरे की होती है। लेकिन सच कहूँ तो विलासिता का मतलब यह भी है कि आप शान्ति से लंबी सैर पर जा सकें। विलासिता का मतलब यह भी है कि आप सुबह चैन से उठें और रात को चैन की नींद सोएँ। विलासिता का मतलब यह भी है कि आप सुबह शान्ति से सूर्योदय और शाम को शान्ति से सूर्यास्त देख रहे हैं। विलासिता का मतलब यह भी है कि आप शान्ति से घर का बना खाना खा रहे हैं। विलासिता का मतलब यह भी है कि आपको अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी है।
विलासिता का मतलब यह भी है कि आपके पास एक ऐसा साथी हो जिसके साथ आप बिना किसी तनाव के अपने सुख-दुख बाँट सकें। विलासिता का मतलब यह भी है कि आप सुबह उठें और अपने घर के आस-पास चिड़ियों की चहचहाहट सुनें। तो मुझे लगता है कि अगर आपके पास यह है तो यह भी विलासिता है।
यह भी कि जब हम ‘विलासिता’ शब्द सुनते हैं, तो हमारी चेतना अनायास ही चमक-धमक, वैभव और संपन्नता की ओर मुड़ जाती है—ऐसी वस्तुएँ और अनुभव जो आमतौर पर आमजन की पहुँच से बाहर होते हैं। किन्तु क्या सचमुच विलासिता केवल वही है जो दिखता है? क्या विलासिता केवल अमीरों का विशेषाधिकार है? या फिर यह एक मानसिक अवस्था भी हो सकती है—जहाँ सादगी में संतोष है, और साधारणता में आनंद?
वास्तव में, बदलते समय, सामाजिक परिस्थितियों और मानव संबंधों की जटिलताओं के बीच ‘विलासिता’ की परिभाषा अब एक बहस का विषय बन चुकी है। जहाँ कभी महँगे कपड़े और आलीशान बँगले विलासिता माने जाते थे, वहीं आज की दुनिया में एक अच्छी नींद, सच्चा प्रेम, खुला आकाश और मन की स्वतंत्रता भी विलासिता बनते जा रहे हैं। यह निबंध इसी वैकल्पिक दृष्टिकोण का पुनर्विचार है—जहाँ हम विलासिता को केवल भौतिक उपभोग से न जोड़कर, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों, मनोवैज्ञानिक शान्ति और मानवीय गरिमा के अनुभवों से जोड़कर देखना चाहते हैं। यह प्रयास है उस मौन विलासिता को शब्द देने का, जो हमारे चारों ओर है, पर हम उसकी पहचान भूलते जा रहे हैं।
जब हम ‘विलासिता’ (Luxury) शब्द सुनते हैं, तो हमारे मानस में जो पहली छवि बनती है, वह आमतौर पर समृद्धि, भौतिक संपन्नता और प्रदर्शन से जुड़ी होती है—महँगी गाड़ियाँ, विदेशी पर्यटन, पाँच सितारा होटल, डिज़ाइनर कपड़े, या बड़े-बड़े बँगलों में जीवन। लेकिन क्या विलासिता का मतलब केवल यही है? क्या यह परिभाषा सार्वभौमिक है, या यह समय, समाज और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है? वास्तव में, जैसे-जैसे जीवन की प्राथमिकताएँ बदलती हैं, वैसे-वैसे ‘विलासिता’ की परिभाषा भी पुनर्निर्मित होती रहती है। आज का यह निबंध इसी विचार का विस्तार है—विलासिता को अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक संदर्भों में पुनर्परिभाषित करना।
1. भौतिक विलासिता बनाम आत्मिक विलासिता:
भौतिक विलासिता वह है जिसे आसानी से देखा और आँका जा सकता है—बड़ा घर, महँगे वस्त्र, निजी विमान, या दुर्लभ वस्तुएँ। यह समाज द्वारा अक्सर ‘सफलता’ का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन आत्मिक या मानसिक विलासिता का सम्बन्ध भीतर की शान्ति, संतुलन, और स्वतंत्रता से है। अगर कोई व्यक्ति शान्ति से सो सकता है, बिना चिंता के सुबह उठता है, और किसी प्राकृतिक दृश्य का आनंद ले सकता है—तो यह भी उतना ही विलासितापूर्ण अनुभव है जितना किसी समुद्री तट पर छुट्टियाँ मनाना।
2. परिप्रेक्ष्य का सवाल: एक किसान के लिए विलासिता क्या है?
एक छोटे किसान के लिए बारिश समय पर होना, मिट्टी उपजाऊ रहना, और फ़सल का सही दाम मिलना ही सबसे बड़ी विलासिता हो सकती है। उसके लिए शहर में रहने वाला व्यक्ति भले ही ‘विलासी’ हो, लेकिन जब वह किसान एक दिन अपने बच्चों के साथ सुकून से खाना खा लेता है और संतोषपूर्वक रात बिताता है, तो वह भी विलासिता ही है।
3. विलासिता और समय: एक अदृश्य सम्बन्ध:
आज की दुनिया में सबसे दुर्लभ चीज़ों में से एक है ‘समय’। हम सब दौड़ में लगे हैं—काम, सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ, मोबाइल की लत, और प्रतिस्पर्धा। ऐसे में अगर किसी के पास समय है कि वह सुबह सूरज को उगते देख सके, या शाम को परिवार के साथ बैठकर बातचीत कर सके, तो वह भी विलासिता है। आजकल “free time is the new luxury“—यह वाक्य सच साबित हो रहा है।
4. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: लोकतांत्रिक समाजों में विलासिता:
ऐसे कई समाज हैं जहाँ लोगों को अपने विचार खुलकर कहने की आज़ादी नहीं है। जहाँ सत्ता, धर्म, जाति, या लिंग के आधार पर बोलने के अधिकार सीमित कर दिए जाते हैं। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति खुलकर लिख सकता है, सवाल कर सकता है, प्रदर्शन कर सकता है, या अपने मत रख सकता है, तो यह भी एक दुर्लभ विलासिता है। भारत जैसे लोकतंत्र में यह अधिकार मौलिक है, लेकिन धीरे-धीरे जिस तरह से अभिव्यक्ति को संकुचित किया जा रहा है, वह दर्शाता है कि ‘स्वतंत्रता’ भी अब विलासिता बनती जा रही है।
5. प्रेम, साझेदारी और मानसिक सुकून: अनकही विलासिता:
किसी के पास लाखों-करोड़ों की सम्पत्ति हो सकती है, लेकिन अगर उसके रिश्ते अस्थिर हैं, उसका दिल ख़ाली है, तो वह मानसिक रूप से दरिद्र हो सकता है। इसके विपरीत, यदि किसी के पास एक ऐसा साथी है, जिसके साथ वह बिना तनाव के संवाद कर सके, अपनी भावनाएँ बाँट सके, और जीवन के उतार-चढ़ावों में साथ निभा सके—तो यही सबसे विलासितापूर्ण स्थिति है।
6. प्राकृतिक अनुभव: शहरों में विलासिता बनते गाँव के दृश्य:
आज शहरीकरण की अंधी दौड़ में हम उस जीवन से कटते जा रहे हैं जहाँ प्रकृति की उपस्थिति सहज थी। अब पक्षियों की चहचहाहट, स्वच्छ वायु, या खुला आकाश जैसे दृश्य, जो कभी सामान्य थे, अब ‘विकास’ की दौड़ में दुर्लभ हो गए हैं। एक गाँव में रहने वाला वृद्ध व्यक्ति जब सुबह खेतों में टहलते हुए पक्षियों की आवाज़ सुनता है, तो वह अनुभव उसके लिए सामान्य है। लेकिन किसी महानगर में रहने वाले व्यक्ति के लिए वह दृश्य ‘विलासिता’ बन चुका है, जिसे वह वीकेंड रिसॉर्ट या जंगल सफ़ारी में खोजता है।
7. स्वास्थ्य और नींद: अनदेखी लेकिन मूलभूत विलासिता:
आज की दुनिया में जहाँ लोग अनियमित दिनचर्या, तनाव और व्यस्तता के कारण मानसिक व शारीरिक रोगों से ग्रस्त हैं, वहाँ शांतिपूर्ण नींद एक असाधारण सुख बन चुकी है। यदि आप बिना किसी दवा के, बिना तनाव के, चैन की नींद सो सकते हैं—तो आप एक विलासिता का अनुभव कर रहे हैं जो करोड़ों लोगों के लिए सपना है।
8. सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में विलासिता:
एक महिला जो पितृसत्तात्मक समाज में बिना डर के बाहर निकल सकती है, शिक्षा प्राप्त कर सकती है, और अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सकती है—वह भी विलासिता का अनुभव कर रही है। क्योंकि अभी भी समाज के कई वर्गों के लिए यह सहज सुलभ नहीं है। इसी तरह, एक दलित व्यक्ति को यदि बिना भेदभाव के सार्वजनिक स्थल पर बैठने, मंदिर में प्रवेश करने या न्याय पाने का अवसर मिल रहा है, तो यह भी सामाजिक न्याय की विलासिता है।
निष्कर्षत: विलासिता का वास्तविक अर्थ बाहरी चकाचौंध से नहीं, बल्कि आंतरिक सुकून, स्वतंत्रता, प्रेम और आत्म-सम्मान से निर्धारित होता है। हर व्यक्ति, अपनी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के अनुसार ‘विलासिता’ को अलग तरीक़े से अनुभव करता है।
इसलिए, ज़रूरी है कि हम विलासिता की परंपरागत, भौतिकवादी परिभाषा से आगे बढ़कर इसे समग्रता में समझें—एक ऐसी स्थिति के रूप में जहाँ व्यक्ति को जीवन जीने की स्वतंत्रता, समय, प्रेम, स्वास्थ्य, और स्वाभाविक आनंद मिल सके। अंततः, अगर आप चैन से उठते हैं, सुकून से सोते हैं, और दिल से मुस्कुरा सकते हैं—तो आप विलासितापूर्ण जीवन जी रहे हैं।
विलासिता: अर्थ, अनुभव और सामाजिक पुनर्परिभाषा:
जब भौतिकता सीमित होती है, तो अनुभव गहराते हैं:
विलासिता—यह शब्द सुनते ही हमारी कल्पना में जो छवि बनती है, वह अक्सर चकाचौंध भरी होती है। जब हम ‘विलासिता’ शब्द सुनते हैं, तो हमारी चेतना अनायास ही चमक-धमक, वैभव और संपन्नता की ओर मुड़ जाती है—ऐसी वस्तुएँ और अनुभव जो आमतौर पर आमजन की पहुँच से बाहर होते हैं। किन्तु क्या सचमुच विलासिता केवल वही है जो दिखता है? क्या विलासिता केवल अमीरों का विशेषाधिकार है? या फिर यह एक मानसिक अवस्था भी हो सकती है—जहाँ सादगी में संतोष है, और साधारणता में आनंद? वास्तव में, बदलते समय, सामाजिक परिस्थितियों और मानव सम्बन्धों की जटिलताओं के बीच ‘विलासिता’ की परिभाषा अब एक बहस का विषय बन चुकी है। जहाँ कभी महँगे कपड़े और आलीशान बँगले विलासिता माने जाते थे, वहीं आज की दुनिया में एक अच्छी नींद, सच्चा प्रेम, खुला आकाश और मन की स्वतंत्रता भी विलासिता बनते जा रहे हैं।
यह निबंध इसी वैकल्पिक दृष्टिकोण का पुनर्विचार है—जहाँ हम विलासिता को केवल भौतिक उपभोग से न जोड़कर, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों, मनोवैज्ञानिक शान्ति और मानवीय गरिमा के अनुभवों से जोड़कर देखना चाहते हैं। यह प्रयास है उस मौन विलासिता को शब्द देने का, जो हमारे चारों ओर है, पर हम उसकी पहचान भूलते जा रहे हैं। ऊँची इमारतें, महँगी गाड़ियाँ, विदेशी यात्राएँ, पाँच सितारा होटल, और ऐसे जीवन का स्वप्न जिसमें किसी भी वस्तु की कोई कमी न हो। लेकिन जब हम गहराई से सोचते हैं, तो पाते हैं कि जो कुछ हमारे लिए कभी साधारण था—जैसे सुबह की शान्ति, प्रेममयी सम्बन्ध, स्वच्छ हवा, समय पर भोजन, बिना भय के जीना—अब वह विलासिता बनता जा रहा है। इस निबंध में हम विलासिता को विभिन्न दृष्टिकोणों—भौतिक, मानसिक, सामाजिक, राजनीतिक, और सांस्कृतिक—से समझेंगे, और यह भी खोजने का प्रयास करेंगे कि क्यों आज के समय में 'साधारण जीवन' ही सबसे बड़ी विलासिता बन गया है।
1. विलासिता की पारंपरिक परिभाषा और उसकी सीमाएँ:
शब्द-कोशों में ‘विलासिता’ को प्रायः इस रूप में परिभाषित किया जाता है–“ऐसी वस्तु या अनुभव जो आवश्यक नहीं है, परन्तु सुख और भौतिक संतोष के लिए अर्जित की जाती है।” इस परिभाषा के केंद्र में ‘आवश्यकता’ और ‘भोग’ है। यह दृष्टिकोण पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर विकसित हुआ है, जहाँ मनुष्य की सफलता का पैमाना उसके उपभोग की क्षमता से आँका जाता है। लेकिन यही परिभाषा आज संकुचित और भ्रामक हो गई है, क्योंकि समाज के एक बड़े वर्ग के लिए जो चीज़ें ‘मूलभूत अधिकार’ होनी चाहिए थीं—स्वास्थ्य, शिक्षा, शुद्ध जल, नींद, सुकून, सम्मान—वे अब दुर्लभ हो चुकी हैं। और इसी दुर्लभता ने उन्हें विलासिता का रूप दे दिया है।
2. समय और जीवन की गति: विलासिता का एक नया रूप:
बीते कुछ दशकों में हमारी जीवनशैली अत्यधिक गतिशील और समय-संकीर्ण हो गई है। तकनीक ने सुविधा तो दी है, लेकिन उसने शान्ति छीन ली है। हम 24 घंटे जुड़े रहते हैं, लेकिन अपने आप से कटे हुए हैं। मोबाइल ने संवाद आसान किया है, पर रिश्तों को सतही भी बना दिया है।
आज समय ही सबसे बड़ी विलासिता है।
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एक माँ के लिए अपने बच्चे के साथ बिना किसी डिजिटल व्यवधान के दो घंटे बिताना विलासिता है।
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एक बुज़ुर्ग के लिए शाम को पार्क में बैठकर दोस्तों से बतियाना विलासिता है।
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एक शिक्षक के लिए किताब लेकर अकेले बैठना विलासिता है।
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विलासिता अब Rolex नहीं, Routine की सहजता है।
3. नींद, स्वास्थ्य और मानसिक शांति: अदृश्य पर अत्यंत मूल्यवान विलासिता:
स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो–
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एक सामान्य नागरिक जो समय पर सोता है और बिना दवाइयों के जागता है, वह लाखों लोगों से ज़्यादा संपन्न है।
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आज की कार्यसंस्कृति burnout, anxiety और depression को सामान्य बनाकर पेश करती है।
सच यह है – “चैन की नींद, चिंता-मुक्त हृदय और स्वस्थ शरीर—वर्तमान युग की सबसे दुर्लभ विलासिताएँ हैं।”
4. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: लोकतंत्र में भी विलासिता?
ऐसे समाज में जहाँ विरोध को ‘देशद्रोह’ और मतभेद को ‘गद्दारी’ कह दिया जाए, वहाँ बोल पाना भी विलासिता है।
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अगर आप अपने विचार खुलकर कह सकते हैं,
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अगर आप सरकार की आलोचना कर सकते हैं,
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अगर आप अपनी पहचान को बिना डर के जी सकते हैं—तो समझिए, आपने एक गहरी लोकतांत्रिक विलासिता को जिया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आज सिर्फ़ एक संवैधानिक अधिकार नहीं रही, वह अब विशेषाधिकार बन गई है।
5. प्रेम, रिश्ते और भावनात्मक विलासिता:
मानव सम्बन्धों की गहराई में ही जीवन की सच्ची विलासिता छुपी होती है।
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प्रेम, जहाँ शर्त नहीं होती।
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सम्बन्ध, जहाँ भय नहीं होता।
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संवाद, जहाँ स्पर्श शब्दों में होता है।
जब आप बिना भय के किसी को अपना कह सकते हैं, अपने आँसू और हँसी बाँट सकते हैं, और कोई ऐसा है जो आपके मौन को भी समझता है—तो वह विलासिता है जिसे दुनिया की कोई सम्पत्ति नहीं ख़रीद सकती।
6. गाँव बनाम शहर: भौगोलिक परिस्थिति में विलासिता का अंतर:
शहरों में रहने वाले अक्सर शुद्ध हवा, हरियाली, शांतिपूर्ण जीवन की कल्पना करते हैं—जिसे वह ‘रिट्रीट’ कहते हैं। लेकिन ये सब तो कभी गाँव का सामान्य जीवन था। आज जब शहरों में ये अनुभव दुर्लभ हो गए हैं, तो वही गाँव की सादगी विलासिता बन गई है। विचित्र विडंबना यह है कि जो अनुभव पहले 'साधारण' था, वह अब 'विशेष' हो गया है। वही तो विलासिता है—जब आप खुले आकाश के नीचे बिना ध्वनि प्रदूषण के साँस ले सकते हैं।
7. सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ: जाति, लिंग और वर्ग में छुपी असमान विलासिता:
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विलासिता की परिभाषा सामाजिक रूप से भी तय होती है।
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एक दलित व्यक्ति के लिए मंदिर में बिना भेदभाव के प्रवेश करना विलासिता है।
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एक मुस्लिम नागरिक के लिए दंगों के भय के बिना रमज़ान मनाना विलासिता है।
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एक महिला के लिए रात को बिना डर के सड़क पर चलना विलासिता है।
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वास्तविक विलासिता वह है जो समान रूप से सबको उपलब्ध हो। लेकिन जब सामाजिक न्याय और गरिमा भी दुर्लभ हो जाएँ, तो हमें सोचना चाहिए कि हमने समाज के मूल ढाँचे में क्या खो दिया है।
8. तकनीक और जीवन: सुविधा की विलासिता या निर्भरता की ग़ुलामी?
आज हम यह मानते हैं कि तकनीक ने जीवन को सहज और विलासितापूर्ण बना दिया है-
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घर बैठे खाना आ जाता है,
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बटन दबाते ही टैक्सी मिल जाती है, और
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एक क्लिक पर कोई भी वस्तु मँगाई जा सकती है।
परंतु क्या यह सुविधा हमें मानविकता से दूर कर रही है?
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हम प्रकृति से कटते जा रहे हैं,
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रिश्तों से कटते जा रहे हैं, और
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अपने स्वयं से भी।
सवाल यह है कि क्या यह ‘विलासिता’ है या एक धीमी आत्मविस्मृति?
निष्कर्ष: विलासिता का पुनर्पाठ और पुनराविष्कार:
विलासिता अब किसी महँगी वस्तु का नाम नहीं है, वह उन अनुभवों का नाम है जो आज दुर्लभ होते जा रहे हैं—
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जैसे ईमानदारी से जीना,
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जैसे अपने मन की बात कहना,
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जैसे अपनी माँ की गोद में सिर रखकर सोना,
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• जैसे खुले मैदान में टहलना,
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जैसे मन की सच्ची हँसी हँसना।
हमारी ज़रूरतों की सूची जितनी बड़ी होती जा रही है, हमारी आत्मा उतनी ही ख़ाली।
“जिस दिन चैन से नींद आए और बिना झिझक के मुस्कुरा सकें, समझिए आपने विलासिता को पा लिया।” विलासिता का नया सूत्र–“कम में जो अधिक मिले, वही असली विलासिता है।
न कि वह जो अधिक लेकर भी कम दे।”
अंततः, विलासिता का माप न तो स्वर्ण में किया जा सकता है, न ही डॉलर में। वह मापी जाती है एक आत्मा के संतोष से, एक रिश्ते की सच्चाई से, और एक जीवन की सहजता से। विलासिता वह नहीं जो बाज़ार से ख़रीदी जाती है, बल्कि वह है जो जीवन के अनुभवों से कमाई जाती है—धीरे-धीरे, सच्चे भाव से।
इस निबंध ने यह उजागर किया कि अलग-अलग व्यक्ति, वर्ग, और परिवेश के लिए विलासिता के मायने अलग हो सकते हैं—एक ग़रीब के लिए दो वक़्त की रोटी, एक दलित के लिए गरिमा से जीना, एक स्त्री के लिए स्वनिर्णय का अधिकार, और एक शहरी के लिए थोड़ा सुकून और हरियाली। इसलिए हमें अपने सोचने के ढंग को बदलना होगा। भौतिकता के बजाय संवेदनशीलता को, बाहरी आडंबर के बजाय भीतरी संतुलन को, और उपभोग के बजाय संबंधों और आत्मिक शान्ति को प्राथमिकता देनी होगी।
“विलासिता का वास्तविक अर्थ यह नहीं कि हमारे पास क्या है, बल्कि यह है कि हमारे भीतर कितना शान्ति, प्रेम और स्वतंत्रता है।” यदि हम यह समझने लगें कि कम में भी बहुत कुछ पाया जा सकता है, तब शायद हम जीवन की उस विलासिता को पा लेंगे जिसे हम हमेशा दूसरों की आँखों में खोजते आए हैं।
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