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मेरी पहली रेल यात्रा: लखनऊ से हरसूद (म.प्र.) जाते हुए 

ऐसा माना जाता है कि जिस व्यक्ति का बचपन कष्टों से भरा होता है, उसका बाक़ी जीवन ख़ुशियों से भरा होता है। और जिस व्यक्ति का बचपन ख़ुशियों से भरा होता है, उसका बाक़ी जीवन दुख और पीड़ा से भरा होता है। जो व्यक्ति बचपन में चटाई पर सोया है, जो व्यक्ति बचपन में सूखी रोटी खाता है, उसे जीवन जो भी देगा, वह उससे कहीं अधिक होगा जो उसने अपने बुरे दिनों में भोगा है। किन्तु आजकल हम बिलकुल उल्टा पागलपन करते हैं, जो सुख पिता को नहीं मिलता, वो बेटे को मिलता है। जो सुख घर में नहीं मिलता, वो हॉस्टल में मिलता है, स्कूल में मिलता है। आजकल के बच्चे के 25 साल बिना किसी प्रयास के, बिना किसी मेहनत के, बिना किसी कठिनाई के, बिना किसी संघर्ष के बीत जाते हैं। और 25 साल के बाद जीवन में संघर्ष आता है, प्रयास आता है। और फिर जो भी मिलता है, उससे कोई संतुष्ट नहीं हो पाता। क्योँकि उसी पाने के लिए उसे स्वयं प्राप्त करना होता है। तुलनात्मक रूप से किसी को जो कुछ भी मिलता है, उसी वह सब बेकार लगता है। 

यथोक्त मान्यता ज़रूरी नहीं कि हर किसी पर तथावत लागू होती हो। किन्तु उक्त कथन है तो सच्चाई के आसपास। कारण कि मैंने माँ-बाप को बचपन में ही खो दिया था। फलतः मुझे जो भी अच्छा-बुरा करना पड़ा, स्वयं ही किया। और यही सिलसिला आजतक भी चल रहा है। 

ख़ैर! 1981मैं मेरा तबादला भारतीय स्टेट बैंक के केंद्रीय कार्यालय की शाखा लेखा-परीक्षा (मोबाइल) में हो गया। मुझे पत्नी और बच्चों को पत्नी के मायके जाड़ौल में रहने के लिए छोड़ना पड़ा। अपने नए काम के लिए मुझे लखनऊ ऑफ़िस में रिपोर्ट करना था। जब मैं जाड़ौल से लखनऊ के लिए रवाना हुआ तो पत्नी की आँखों में आँसू थे। मैं बस से दिल्ली आया और दिल्ली से लखनऊ के लिए भी बस से ही निकल पड़ा। लखनऊ के निराला नगर ऑफ़िस पहुँचा। वहाँ पहुँचकर मुझे, परस्पर परिचय के बाद, मध्य प्रदेश स्थित हरसूद शाखा में रिपोर्ट करने का आदेश दे दिया गया। अंतरराज्यीय यात्रा का यह मेरा पहला अवसर था। रेल से यात्रा करने का अनुभव मुझे क़तई नहीं था। निराला नगर कार्यालय से मैं लखनऊ रेलवे स्टेशन पहुँचा। 

ट्रेन में रिज़र्वेशन न हो सका तो मुझे साधारण रेल से ही इटारसी रेलवे स्टेशन के लिए रवाना होना था। पहला झटका तो मुझे लखनऊ रेलवे स्टेशन पर ही लगा। टिकिट काउंटर पर पचास रुपए का नोट दिया और इटारसी का टिकिट देने की गुहार की किन्तु काउंटर क्लर्क ने मुझसे पुनः टिकिट के पैसे माँगे। मजबूरी में दोबारा पैसे दिए . . . टिकिट लिया और संबंधित प्लेट फार्म पर पहुँच गया। 

प्लैटफ़ॉर्म पर एक कुली मेरे पास आया और धीरे से मुझसे पूछा—क्या इस ट्रेन में सीट चाहिए तो पचास रुपए लगेंगे। मैंने बिना किसी पूछताछ के ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। लेकिन शर्त ये थी कि मुझे कुली को पैसे पहले देने होंगे। मरता . . . क्या न करता, मैंने कुली को पचास रुपए थमा दिए। मेरे पास एक छोटा-सा लोहे का बक्सा और छाता था। कुली ने मेरा बक्सा लिया और अमुक जगह पर ले जाकर खड़ा कर दिया। वे दो जने थे। ट्रेन आई तो पहले एक कुली ने बक्से को खिड़के के रास्ते मेरा बक्सा अंदर फेंक दिया। बाद में दोनों ने मुझे उठाया और उसी खिड़की के रास्ते मुझे भी अंदर फेंक दिया। छाते की मूठ से मेरी क़मीज़ के सारे बटन तो टूटे ही, साथ ही मेरी बाज़ू में ऐसी चोट लगी कि आज भी उसका निशान मेरी बाज़ू में चस्पा है। ख़ैर! भीड़ भरी ट्रेन में इस प्रकार सीट तो मिल गई लेकिन इस अनुभव का चित्र हमेशा के लिए मेरे दिमाग़ में छप गया। 

कुछ देर बाद ट्रेन चल पड़ी थी। मेरी क़मीज़ के बटन तो टूट ही चुके थे। भारी भीड़ के बीच मैं क़मीज़ तक नहीं बदल पाया था। छाते की छड़ भी मुड़कर दोहरी हो गई थी, तो मैंने उसे वहीं लखनऊ स्टेशन पर ही फेंक दिया था। ख़ैर! मैं यथास्थिति में ही बैठा रहा। क़मीज़ से बनियान बाहर झाँक रहा था। अब ट्रेन रफ़्तार पकड़ चुकी थी। कुछ यात्रीगण मेरी तरह सीट पा गए थे और बहुत से यात्री ट्रेन में एक दूसरे से चिपक कर ऐसे खड़े थे कि किसी का उनके बीच से गुज़रना नितांत असंभव था। फिर भी शौचालय तक तो लोग किसी ने किसी न किसी तरह जाते ही थे। 

पूछने पर पता चला कि लखनऊ से इटारसी का सफ़र काफ़ी लम्बा है। लगभग दो-तीन घंटे कै सफ़र के बाद मेरा पानी पीने का मन किया। किन्तु मेरे पास पानी की व्यवस्था नहीं थी। सामने की सीट पर बैठी एक महिला मेरे मन को भाँप गई। उसने बिना कुछ कहे, मेरी ओर पानी की बोतल बढ़ा दी। मैंने भी सहज अवस्था में पानी पी लिया। महिला के पास एक छोटा बच्चा भी था। बच्चा बहुत ही प्यारा था। अब मैंने धीरे-धीरे बच्चे से खेलना शुरू कर दिया था। 

बच्चा तो बच्चा था वह कभी मेरे पास आ जाता तो कभी अपनी माँ के पास। दोपहर का समय हो आया था कि यात्रियों में बहुत लोगों ने खाना खाने की जुगत बिठाई। मेरे पास खाना तो न था, कुछ बिस्किट और नमकीन भर था। भूख ने मेरे साथ भी छेड़छाड़ करनी शूरू कर दी थी। इसपर मैंने भी भीड़ में जैसे–तैसे बक्सा खोला और बिस्किट का एक पैकेट निकाला और खाना शुरू कर दिया। बच्चे ने मेरे हाथ में बिस्किट देखे तो वह मेरे पास चला आया। लेकिन मैंने बच्चे की माँ से पूछकर ही बच्चे को बिस्किट दिया। कारण कि यात्रा पर जाने से पूर्व मेरे किसी हितैषी ने मुझसे कहा था कि किसी भी प्रकार के सफ़र में न किसी का दिया खाना है और न किसी को अपना खाना देना है। उसने कहा कि ऐसा करने मुझे रेलगाड़ियों में होने वाले कई तरह की मिथ्या धोखाधड़ी का शिकार होना पड़ सकता है। 

उल्लेखनीय है कि पूरे इटारसी के आने तक बच्चा अधिकतर मेरे पास ही खेलता रहा। अपनी माँ के पास जाने को तैयार ही नहीं था। और मैं भी बच्चे के साथ बच्चा हो गया था। जहाँ कहीं भी कोई कुछ खाने-पीने की चीज़ें बेचने को आता तो मैं थोड़ा-बहुत उस बच्चे को दिला दिया करता था। अब तक मुझसे इतना घुलमिल गया कि मुझे टूटी-फ़ूटी भाषा में ‘अंकिल’ कहने लगा था। इटारसी से थोड़ा पहले ट्रैन में खरबूजे बेचने वाला आया तो मैंने भी एक खरबूजा ख़रीद लिया और अपने पास रख लिया। बच्चे के साथ खेलते-खेलते पता ही नहीं चला कि कब इटारसी आ गया। जैसे ही मैंने अपना सामान समेटा और गाड़ी से उतरने को हुआ तो बच्चे ने ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा और मेरे साथ चलने की कोशिश में उछ्ल-कूद करने लगा। वहाँ ट्रेन का ठहराव कुछ लम्बा था। मैं रुका और मेरे पास जो खरबूजा मेरे पास रखा था, उसे बच्चे को दिया और बोला—लो बेटा! थोड़ी देर तुम इस गेंद से खेलो, मैं अभी आता हूँ। इस तरह मैं झूठ बोलकर इटारसी के स्टेशन पर उतर पाया। लेकिन मेरे ज़ेहन में बच्चे की याद बराबर आती रही। 

इटारसी से हरसूद (मध्य प्रदेश) के लिए बस ली और तीन-चार घंटे के सफ़र के बाद हरसूद पहुँच गया। वहाँ के लोगों की स्थानीय बोली मेरी समझ तो आ जाती थी किन्तु मेरे लिए यह काफ़ी मुश्किल लग रहा था। मई के महीने में इतनी सड़ी हुई गर्मी थी कि मैं पसीना-पसीना हो गया था। ख़ैर! हरसूद के बस स्टेंड से रिक्शा लिया और भारतीय स्टेट बैंक की शाखा की ओर रवाना हो गया। हरसूद की मुख्य सड़क से गुज़रते हुए देखा कि हरसूद एक उजड़ा चमन-सा लग रहा था जैसे दिल्ली का कोई बड़ा-सा गाँव हो। दाएँ-बाएँ कुछ भी तो आकर्षण नहीं था। ख़ैर! अब मैं शाखा में पहुँच गया था। एक दिन और एक रात के सफ़र में मेरा हाल बेहाल हो गया था। 

मैं शाखा में पहुँचा तो जाना कि बैंक एक बहुत ही पुराने भवन में चल रही थी। 

जैसे ही हाथ में टिन एक बक्सा लेकर मैं शाखा के अंदर गया तो गार्ड ने गेट पर ही रोक लिया और बक्से के साथ शाखा में अन्दर जाने का कारण पूछा तो मैंने पूरी बात गार्ड को जैसे ही बताई तो उसने बक्से को अपने हाथ में लिया और शाखा का ऑडिट कर रहे मुख्य प्रबंधक आर ऐन प्रभाकर जी के पास पहुँचा दिया। प्रभाकर जी से मिलकर सारा हवाला दिया कि उन्होंने तुरंत ही पानी मँगाया और मुझे कुछ आराम करने को कहकर शाखा प्रबंधक को मेरे नहाने के लिए पानी मँगाने का निवेदन किया। मैं लगभग दिन के तीन बजे शाखा में पहुँचा था। थोड़ी देर में पानी आ गया। मैं नहाने गया तो देखा कि पानी इतना गंदला था जैसे किसी पोखर से लाया गया हो। मैंने जब ये बात प्रभाकर जी को बताया तो उन्होंने कहा कि यहाँ नदी/तालाब से पानी लाया जाता जो गंदला ही होता है। अब जैसा भी है, नहा लो। ख़ैर! मैंने नाक-भौं चढ़ाकर स्नान किया और कपड़े बदले। प्रथम मुलाक़ात में प्रभाकर जी का व्यवहार में इतना अपनापन था जैसे कोई अपने परिवार का कोई मिल गया हो। 

उल्लेखनीय है कि इससे पहले मैं किसी बैंक कर्मी से रात को रहने का इंतज़ाम करने के लिए कहता, उससे पहले ही प्रभाकर जी ने एक बैंक कर्मी के साथ रहने की व्यवस्था कर दी थी। ज्ञात हो कि वह बैंक कर्मी अकेला ही घर किराये पर लिए था। दोनों सुबह का नाश्ता और शाम का खाना होटल पर ही खा लिया करते थे। लेकिन मेरे सामने सबसे बड़ी समस्या ये थी कि वहाँ सब्ज़ियों आदि के नाम दिल्ली में बोले जाने नामों से भिन्न थे जैसे बैंगन को ‘भटा’, तोरई को ‘गिलकी’ आदि आदि नामों से जाना जाता था। पीने के पानी की व्यवस्था बड़े-बड़े घड़ों/मटकों में गंदला पानी ही भर दिया जाता था जिनमें घंटे-दो घंटे में पानी की गंदगी मटकों के तले में बैठ जाता था और पानी पीने के लायक़ हो जाता था। पानी की क़िल्लत के मद्देनज़र वहाँ पहले से ही नलकूप के लिए बोरिंग हो रहा था। हरसूद से विदा लेने से एक दिन पूर्व उस नलकूप से पानी आना शुरू हुआ तो हरसूद का मेन बाज़ार एक मेले में बदल गया था। लोग पानी मिलने की ख़ुशी से फुदक-फुदक कर नाच रहे थे . . . एक दूसरे के गले मिल रहे थे ऐसा था मध्य परदेश का हरसूद ज़िला। ख़ैर! हमने हरसूद शाखा का ऑडिट कार्य पूरा किया और अगली शाखा के लिए रवाना हो गए। 

अरे! सब्ज़ी में नमक और मत डाल देना . . . 

हरदा (म.प्र.): एक बार हमें भारतीय स्टेट बैंक हरदा ऑडिट करना था। हरदा शाखा में हम सुबह के लगभग नौ बजे ही पहुँच गए थे। शाखा में काम-काज शुरू होने से पहले ही हमें ऑडिट की प्रक्रिया शुरू करने के भाव से हमें शाखा में पहुँचना होता था। जैसे ही शाखा खुली, हमारा काम शुरू हो गया। अक्सर पहले दिन तो नक़दी की जाँच करने में ही गुज़र जाता था। शाखा प्रबंधन ने हमारे रहने का प्रबंध शाखा के क़रीब ही एक मकान में करा दिया था। होटल पर खाना खाने के बदले हम ख़ुद ही खाना बनाया करते थे। एक दिन की बात है कि सुबह के समय जब खाना बनाया जा रहा था तो मेरे बॉस श्री पी.डी. शर्मा सब्ज़ी बनाने के चूल्हे पर भगोना रखकर मकान के एक कौने में पूजा करने चले गए। कुछ देर बात मैंने सब्ज़ी के भगोने को खोलकर यह देखने की कोशिश की कि सब्ज़ी बनी है कि नहीं। मैंने ऐसा करना ही शुरू किया था कि पूजा कर रहे शर्मा जी ने मुझसे ज़ोर देकर कहा कि अरे! सब्ज़ी में नमक डाल दिया है मैंने, और मत डाल देना। मैं शर्मा जी की आवाज़ सुनकर चौंका और मन ही मन सोचने लगा कि शर्मा जी पूजा कर रहे हैं या?. . .

मुझे उनकी पूजा करने की एकाग्रता पर मेरा मन हँसने को कर रहा था किन्तु हँसी को रोकना प्रोटोकोल की माँग भी थी क्योंकि शर्मा जी एक वरिष्ठ अधिकारी थे, ये बात अलग थी कि रोज़-रोज़ अकेले रहते हुए हमारे बीच में असिसटेंट और इंस्पेक्टर होने का रिश्ता फीका पड़ गया था किन्तु ऑफ़िस में असिसटेंट और इंस्पेक्टर होने के प्रोटोकोल को प्राथमिकता अवश्य दी जाती थी। शर्मा जी की और मेरी क़द-काठी लगभग एक जैसी ही थी। 

सब्ज़ी बनाने की बात को लेकर मुझे ओशो की एक बात याद हो आई। वह यह है कि माँ-बाप जन्म के समय ही बच्चों के दिमाग़ में ज़हर भरने की कोशिश करने लगते हैं। अगर बच्चा पैदा हो जाए तो उसे जल्दी से जल्दी हिंदू बना दो। अगर वो समझदार हो गया और हिंदू बनने से मना कर दिया तो बहुत देर हो चुकी होगी। तो जल्दी से उसके दिमाग़ में डाल दें कि वो हिंदू है, मुसलमान है, ईसाई है या जैन है। आज तक मानव जाति के बच्चों के साथ जितना अत्याचार हुआ है, उतना किसी और के साथ नहीं हुआ। सबसे बड़ा अत्याचार तो यह है कि बच्चों को पिंजरे में बाँध दिया जाता है। उनकी सत्य की खोज को हमेशा के लिए स्थगित कर दिया जाता है। अब वे कभी हिम्मत से यह सवाल नहीं पूछ सकेंगे—सत्य क्या है? उन्हें उत्तर पहले ही दे दिया जाता है। उन्हें होश आने से पहले ही उन्हें शास्त्रों की ओर धकेलने का काम शुरू कर दिया जाता है। इससे पहले कि वे अपनी जिज्ञासा जगाएँ, उनके हाथों में सिद्धांत थमा दिए गए। वे बच्चे हमेशा असत्य में जिएँगे। वे असत्य में ही मरेंगे। वे कभी भी सत्य की खोज नहीं कर पाएँगे। सत्य की खोज का पहला तरीक़ा निष्पक्षता है। दूसरा तरीक़ा है जिज्ञासा, पूछताछ। और हम हैं कि बच्चों की सारी जिज्ञासा को मार देते हैं। यह भी कि बच्चों के मन में भगवान का इतना डर बिठा दिया जाता है कि वे डर के कारण भगवान की पूजा करने को बाध्य होते हैं। लोगों ने डर के कारण मंदिर बनवाए और डर के कारण ही तरह-तरह भगवानों की प्रार्थना करते हैं। कभी वृक्ष की पूजा करता है, कभी पत्थर की पूजा करता है, कभी मंदिर में मूर्ति की पूजा करता है, कभी मस्जिद में मूर्तिविहीन ख़ुदा की पूजा करता है। लेकिन ग़ौर से देखें तो जान पड़ेगा कि हमारे तमाम मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चैत्य, शिवालय, गिरिजाघर आदि-आदि मठ आदमी डर के बल पर ही खड़े हैं। और बुद्ध कहते हैं, जो भय के बल पर खड़ा है, वह कभी सत्य को नहीं जान सकेगा। 

ख़ैर! जो कुछ भी हो लेकिन यह भी सच है कि घोर धार्मिक होने के बावजूद भी शर्मा जी हृदय से साफ़ और तमाम सामाजिक बंधनों से मुक्त थे। वे जाति के आधार पर किसी से भी कोई मतभेद नहीं रखते थे। इस सच की असली परीक्षा तो तब हुई कि तब बीच यात्रा में शर्माजी और मैं एक रात के लिए एक मित्र के घर पर रुके। उल्लेखनीय है कि उनका वो मित्र वाल्मीकी (भंगी) जाति के थे। ख़ैर! यहाँ कुछ विषयांतर होता नज़र आ रहा है। मैं फिर वापस हरदा की ओर लौटता हूँ। बता दूँ कि हरदा मध्य प्रदेश का एक ज़िला है। हरदा को ‘हृदयनगरी’ (इसके अलावा ‘भुआना: उपजाऊ भूमि’) भी कहा जाता है। यह बड़ा ही साफ़-सुथरा शहर होने के साथ-साथ यहाँ के लोगों में विविध खेल खेलने का शौक़ भी देखा गया। हमारे शर्मा जी को खेलने और खेल देखना का बहुत ही शौक़ था। अतः शाम को शाखा बंद होने के बाद हम भी लॉन टेनिस देखने चले जाते थे और रात को लगभग नौ बजे बैडमिंटन के इंडोर स्टेडियम में पहुँच जाते थे। मुझे तो कोई खेल खेलना नहीं आता था किन्तु शर्मा जी बैडमिंटन खेलने में ख़ासे रुचि रखते थे। सो वो तो बैडमिंटन खेला करते थे और मैं बैठकर उनका खेल देखा करता था। एक दिन ऐसा हुआ कि शर्मा जी ने ज़ोर देकर मुझे भी बैडमिंटन खेलने के लिए मैदान में उतार दिया। और इस तरह हरदा में लगभग एक महीने के प्रवास के दौरान शर्मा जी ने मुझे भी बैडमिंटन के प्राथमिक गुणा-भाग समझा दिए। अब मैं भी बैडमिंटन के खेल में रुचि रखने लगा। 

उल्लेखनीय है कि हमारे देश में दर्जी से सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार बनने वाले कवि माणिक वर्मा का नाम कोई अछूता नाम नहीं है। माणिक वर्मा (Manik Verma) मंचों पर उस दौर के व्यंग्यकारों में शामिल हैं, जब छन्द मुक्त व्यंग्य विधा को स्वतंत्र स्थान मिलने लगा था। एक ओर हास्य कविता में काका हाथरसी, निर्भय हाथरसी, गोपाल प्रसाद व्यास, रमई काका, शैल चतुर्वेदी, हुल्लड़ मोरादाबादी आदि थे तो दूसरी ओर देवराज दिनेश, माणिक वर्मा, सुरेश उपाध्याय, ओम प्रकाश आदित्य, गोविन्द व्यास, आदि थे जिनमें माणिक वर्मा जी का विशेष स्थान था। बाद में अशोक चक्रधर, प्रदीप चौबे, मधुप पांडेय आदि जुड़े। इसके बाद की पीढ़ी में तो फूहड़ चुटकलों ने ही कविता की जगह लेना शुरू कर दिया था। 

देश के सुप्रसिद्ध कवि माणिक वर्मा का 81 वर्ष की आयु में 2019 में निधन हो गया था। वैसे वो मूलतः मध्य प्रदेश के हरदा नामक क़स्बे के रहने वाले थे किन्तु जीवन के आख़री दिनों में तबीयत ख़राब होने के चलते वे इंदौर में ही परिवार के साथ रह रहे थे। माणिक वर्मा जी अपने व्यंग्यात्मक रचनाओं के ज़रिए हमेशा मंचों की शान रहे। उनकी कविताओं में शामिल व्यंग्य हमेशा सच्चाइयों की ओर इशारा करते हैं। लेखकीय रुचि रखने के कारण मेरी माणिक वर्मा जी से मिलने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई और जब मैं उनके निवास पर गया तो मालूम हुआ कि वे इंदौर गए हुए हैं। उनसे न मिल पाना मुझे काफ़ी दिनों तक सालता रहा।
 

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