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आरआईपी की रफ़्तार और जीवित मिश्र जी

 

जैसे ही ख़बर उड़ी कि वरिष्ठ चिंतक, सामाजिक विश्लेषक और सोशल मीडिया के अनन्य भक्त, आदर्श पुरुष श्री “मान्यवर मिश्र” जी नहीं रहे, देशभर की फ़ेसबुक टाइमलाइनों पर संवेदनाएँ बरसात में शहर की नालियों की तरह फट पड़ी।

जिसने अभी-अभी ‘गोलगप्पा विद फिल्टर’ वाली स्टोरी डाली थी, उसीने बिना मुँह पोंछे अगली स्टोरी में “गॉन टू सून” लिख दिया। आरआईपी के संदेशों की बाढ़ उमड़ पड़ी, संवेदनाओं का स्रोत जैसे अचानक फूट पड़ा। समूह में जिन्होंने कभी मिश्र जी को न देखा, न सुना, वे भी इस भावना की बहती गंगा में हाथ धोकर पीछे पड़ गए।

आजकल सूचना से ज़्यादा उसकी स्पीड मायने रखती है। किसने बताया, क्यों बताया, ये सब बाद की बातें हैं। पहले वायरल हो जाओ, सत्यापन तो बाद में भी हो जाएगा . . . या फिर कभी नहीं होगा, तो भी चलेगा। सबसे पहले संवेदना व्यक्त करने में ऐसी धक्का-मुक्की मची थी, मानो यह कोई प्रतियोगिता हो। वैसे मिश्र जी इतने भाग्यशाली भी नहीं रहे कि अन्य सेलिब्रिटियों की तरह उन्हें बार-बार अपनी ही शोक-संवेदनाएँ जीते-जी देखने का अवसर मिलता। अपने कर्मों का लेखा-जोखा, अपने सामने लोगों की याद करने की शैली से आँकना, यह उनका पहला अवसर था।

मिश्र जी उस समय अस्पताल के बैड पर अंतिम बिल देखकर जैसे-तैसे अपने आप को जीवित रखने की कोशिश कर रहे थे, और इधर सोशल मीडिया पर उन्हें पूरे सम्मान के साथ स्वर्ग रवाना किया जा चुका था। फोटोशॉप में “रेस्ट इन पीस” के फ़्रेम ऐसे तैयार हो रहे थे, मानो स्वर्ग में प्रवेश के लिए पासपोर्ट बन रहा हो।

जिस फोटो में वे पंद्रह साल पहले गोष्ठी में ऊँघ रहे थे, वहीं अब “गंभीर चिंतन की मुद्रा” के साथ, उस पर माला भी चिपका दी गई थी।

डिजिटल शोक का भी एक तयशुदा प्रारूप है, एक स्वचालित सॉफ़्टवेयर की तरह। ऊपर किसी बड़े साहित्यकार की श्रद्धांजलि देखो, नीचे कॉपी-पेस्ट करो, बीच में नाम बदल दो, और संवेदना तैयार। बने-बनाए टेम्पलेट्स भी मिलते हैं। सोशल मीडिया के अनन्य भक्त ऐसे पोस्टों को प्रसाद समझकर सँजोए रहते हैं।

जो लोग कल तक मिश्र जी को देखकर रास्ता बदल लेते थे, आज वहीं सबसे पहले “बहुत बड़ी क्षति” लिखकर आगे आ रहे थे। जिनसे वे जीवन भर “नमस्ते” का जवाब नहीं पा सके, वे भी आज “ओम शांति” के साथ तीन मोमबत्तियाँ जला रहे थे, वो भी जीआईएफ़ में।

एक सज्जन ने तो इतनी जल्दीबाज़ी में आरआईपी लिख दिया . . . फिर पूछ बैठे, “अच्छा, कौन गए?”

तो जवाब आया, “पता नहीं, कोई तो गया हैं . . . बाद में पता कर लेंगे।”

उधर मिश्र जी ने जैसे ही मोबाइल उठाया और अपना ही श्रद्धांजलि संदेश देखा, तो उन्हें भी क्षणभर के लिए लगा, 
“अगर अब मुझे ज़िन्दा देख लिया, तो कहीं ‘जीवित रहने’ के अपराध में पकड़कर जेल न भेज दिया जाऊँ!”

उन्होंने पत्नी से पूछा, “ज़रा देखो तो, मैं साँस ले रहा हूँ या ये साँसें भी किसी और की फ़ॉरवर्ड की हुई हैं?”

पत्नी बोली, “साँस तो ले रहे हो, लेकिन लोगों के हिसाब से तुम स्वर्ग सिधार चुके हो। अभी दो-तीन ग्रुप में ‘तेरहवीं की सूचना’ भी आ जाएगी, तब तक शांत रहो।”

इधर एक कवि-हृदय मित्र ने भावावेश में लिख डाला, “मिश्र जी चले गए, हमें रुला गए . . .”

और नीचे कमेंट में पूछा, “वैसे कन्फ़र्म है न? अभी दो दिन पहले ही तो बात हुई थी . . .”

एक ने कहा, “अभी तो मैं मिलकर आ रहा हूँ, उनके जाने का तो कोई इरादा नहीं था . . . लेकिन होनी को कौन टाल सकता हैं. . . ”

इतने में न जाने किसने इस संवेदनाओं के बहते ज्वार में भाटा बनकर टाँग अड़ा दी, “अरे, मिश्र जी जीवित हैं यार! अस्पताल से डिस्चार्ज भी हो गए।”

अब वही लोग, जिन्होंने श्रद्धांजलि दी थी, तेज़ी से पोस्ट डिलीट करने लगे। कुछ ने तो चालाकी दिखाई, “मिश्र जी के दीर्घायु होने की कामना . . . अभी-अभी बात हुई उनसे।”

और जिन कवि महोदय ने इस बहाने कोई स्व-रचित तुकबंदी रच डाली थी, उन्होंने उसे सेव कर लिया, अगली बार किसीके सच में जाने पर काम आएगी।

मिश्र जी अब भी जीवित हैं, पर उन्हें यह ज़रूर समझ आ गया है कि इस डिजिटल युग में मरना भी आपके हाथ में नहीं है, कभी भी, कहीं भी, कोई भी आपको मार सकता है . . .

बस एक “फ़ॉरवर्ड” बटन दबाकर।

अब मृत्यु कोई घटना नहीं रही,

यह एक फ़ॉरवर्डेबल कंटेंट बन चुकी है।

वैसे ऐसी मौत तो सेलिब्रिटियों को ही नसीब होती है, अपने जीते-जी अपना श्राद्ध होते देखना . . .

कहा मिश्र जी इस लपेटे में आ गए! 

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