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सामाजिक समरसता–हिंदू समाज की आत्मा

 

भेद मिटे मन से सभी, जुड़े हृदय के तार। 
समरसता से ही बने, भारत सदा महान॥

“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।” 

अर्थ—हम साथ चलें . . . साथ बोलें . . . और हमारे मन एक हों। 

आदरणीय संतजन, विद्वतजनों और सज्जनों, किसी भी जाति या राष्ट्र की सभ्यता के भीतरी भाग में जो चेतना प्रवाहित होती है—वही उसकी संस्कृति कहलाती है। भारतीय संस्कृति केवल प्राचीन नहीं . . . बल्कि अपने जीवन आदर्शों के कारण विश्व में वंदनीय है। 

इस संस्कृति में आत्मा को प्रधानता दी गई। 
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।” 

हमारा समाज मूलतः एकात्म भाव पर आधारित था। 
मंदिर पूरे गाँव के होते थे। 
गुरुकुल में सभी विद्यार्थी एक साथ शिक्षा प्राप्त करते थे। 
गुरु-शिष्य परंपरा में कहीं भेदभाव नहीं था। 
 
भगवान श्रीराम और निषादराज की मैत्री . . . 
भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता . . . 
आचार्य चाणक्य और चंद्रगुप्त का सम्बन्ध . . . 
समर्थ गुरु रामदास और छत्रपति शिवाजी का समन्वय . . . 
ये सभी उदाहरण बताते हैं—
हिंदू समाज की आत्मा समरसता है . . . विभाजन नहीं। 
 
कुंभ—हमारी समता व्यवस्था का जीवंत प्रतीक है। 
जहाँ करोड़ों लोग बिना भेदभाव एक आस्था में एकत्र होते हैं। 
कालांतर में सामाजिक विघटन और बाहरी आक्रमणों के कारण कुछ कुरीतियाँ पनपीं। 
जाति आधारित विसंगतियाँ बढ़ीं। 
लेकिन—
यह हमारी मूल संस्कृति नहीं थी . . . यह विकृति थी। 
 
समय-समय पर संतों और महापुरुषों ने इन भेदों को मिटाने का प्रयास किया। 
उन्होंने कहा—हिंदवः सोदराः सर्वे न हिंदू पतितो भवेत अर्थात्‌ 
कोई भी हिंदू छोटा या बड़ा नहीं है। 
सभी एक ही माता की संतान हैं। 
यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है—
तो फिर कुछ भी पाप नहीं है। 
 
आज भी कुछ स्वार्थी तत्त्व समाज को बाँटने का प्रयास करते हैं। यह असंवैधानिक अन्यायपूर्ण और अमानवीय है 
इसलिए संघ के स्वयंसेवक समाज के साथ मिलकर सामाजिक समरसता के माध्यम से समाज को समरस करने का प्रयास कर रहे हैं
 
पर हमें याद रखना है—
भेद नहीं . . . भाव चाहिए। 
विभाजन नहीं . . . संगठन चाहिए। 
अहंकार नहीं . . . आत्मीयता चाहिए। 
समरस समाज के लिए आवश्यक है—
समान व्यवहार। 
सम्मानपूर्ण सम्बन्ध। 
मंगल अवसरों पर परस्पर सहभागिता। 
मंदिर, जलस्रोत, श्मशान—सबके लिए समान अधिकार। 
ईश्वर सेवा—सभी का अधिकार। 
हमने इसका सुंदर उदाहरण अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण में देखा—
जहाँ समाज के प्रत्येक वर्ग की सहभागिता सुनिश्चित हुई। 
यह केवल मंदिर निर्माण नहीं . . . 
यह समरसता का प्रतीक है। 
 
भारतीय संस्कृति कहती है—
“वसुधैव कुटुम्बकम्।” 
जब पूरा विश्व परिवार है . . . 
तो हमारा समाज विभाजित कैसे रह सकता है? 
समरसता कोई आंदोलन नहीं—
 
यह हृदय परिवर्तन की साधना है। 
“समानी व आकूतिः समाना हृदयानि 
 
ना कोई छोटा यहाँ, ना कोई है बड़ा। 
समरस हिन्दू समाज ही, भारत की पहचान खड़ा॥
 
आइए संकल्प लें—
समरसता ही शक्ति है। 
संगठन ही साधन है . . . 
और सम्मान ही हमारा धर्म है। 

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