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आँख ये धन्य है —जो सपनों को साकार होते देख रही है

काव्य संग्रह: आँख ये धन्य है
रचयिता: नरेंद्र मोदी
अनुवाद: अंजना संधीर
प्रकाशक: विकल्प प्रकाशन, 2226/B, प्रथम तल,
गली न. 33, पहला पूस्ता, सोनिया विहार, दिल्ली
110094। फोन: 09211559886 
पन्ने: 104
मूल्य: रु. 250

"आपको मानवता में विश्वास नहीं खोना चाहिए। मानवता एक समुद्र है, यदि समुद्र की कुछ बूँदें सूख जाती हैं, तो समुद्र मैला नहीं होता!"—महात्मा गाँधी। पथरीली राहों पर चलकर अपने रास्ते ख़ुद बनाने वाले पथिक, कहने में नहीं, करने में विश्वास रखते हैं। उनका जीवन एक चलती फिरती मानवता की मशाल होता है जो इतिहास में सदियों तक याद रखा जाता है।

साहित्य समाज का पथप्रदर्शक है। जो साहित्य समाज तथा समूची मानवता को कुछ नहीं देता, उसका सृजन करके काग़ज़ काले-पीले करना बेमतलब है। ऐसी ही भावनात्मक ऊर्जा के धनी पद्मश्री-डॉ. श्याम सिंह "शशि" का लिखा एक दस्तावेज़ी वाक्य चंद शब्दों में बहुत कुछ कहने की तासीर रखता है -

"वे दो अक्षर लिखते हैं तो उम्र भर गाते हैं।
हम पोथियाँ लिखते हैं, एक उम्र दे जाते हैं।"

गागर में सागर समावेश हुआ है। सच ही तो है, मानवता एक समुद्र है....यह भी सच है समुद्र की कुछ बूँदें सूख भी जाती हैं ...पर आत्मविश्वास मानवता की कोख से फिर झरना बन कर फूट पड़ता है- वन्दे मातरम के गान की मानिंद। जी हाँ, इस सच के ज़ामिन हैं हमारे आदरणीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, जो आम जनता के दिलों की धड़कन बन कर रवां हो रहे हैं। उनकी काव्यात्मक रचनाएँ "आँख ये धन्य है" साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान है, जिसे गुजराती से हिन्दी में अनुवाद करके डॉ. अंजना संधीर ने हम तक पहुँचाया है। इस कृति में श्री नरेंद्र मोदी मानवता का प्रतिनिधित्व करते हुए "कारगिल" नाम की रचना में लिखते हैं-

"धधकते अंगारे समान /वीर जवानों की गरम साँसों से पिघलती बर्फ़ / झरना बन बहती थी/ झरने की गति में/ समाया था सुजलाम...सुफलाम....!"

इसी प्रवाह में गतिमान होते हुए वे आगे लिखते हैं—

"भारत का भाव और झरने की कोख से/ फूट रहा है/ वन्दे मातरम का गान/"

सपनों के बीज बोने वाले कवि, जीवन के यथार्थ से जूझकर अपने जिये हुए कल और आज के संधिपूर्ण हक़ीक़त को सामने लाते हैं। इसमें कई मसाइल भी हैं और कई समाधान भी हैं, जिनके संदर्भ में वे अपनी मनोभावनाओं को एक अर्थपूर्ण अभिव्यक्त के रूप में लिख रहे हैं-

"सपनों के बीज मैं/ अपनी धरती पर बीजता हूँ/ और प्रतीक्षा करता हूँ पसीना बहअकर/ कि वे अंकुरित हों उनका वह वृक्ष बनें/ फिर किसी विराट पुरुष की बाहों समान / उनकी शाखाएँ फैलें/ पक्षी उनपर घोंसले बनाएँ/ और आकाश को छूने लगें....!/उनके कंठ से नदी की कलकल की/ ध्वनि समान ईश्वरीय गीतों के स्वर लहराएँ।"

ये लिखे हुए शब्द नहीं हैं, वक़्त की शिलाओं पर तराशे हुए प्रतीक हैं। यह एक ही संदेश है जो हर युग में कर्मयोगी, अपनी सकारात्मक सोच और निष्ठा से मानव हित के लिए, हिमालय की ऊँचाइयों को ललकारते, चुनौतियाँ स्वीकारते अपना रास्ता ख़ुद बना लेते हैं। संदेश अनुकरणीय है... यह बार-बार याद दिलाता है कि मानवता में विश्वास नहीं खोना चाहिए। आदरणीय मोदी जी की काव्य सरिता भी राह से गुज़रती हुई अपनी रवानी में कह रही है- "भाग्य को कौन पूछता है यहाँ?

"मैं तो चुनौती स्वीकारने वाला मानव हूँ/ मैं तेज उधार नहीं लूँगा/ मैं तो ख़ुद ही जलता हुआ लालटेन हूँ।"

ऐसी ही बुलंदियों के शिखर पर अपनी तेजस्वी सोच को शब्दों में बुनते हुए कहते हैं -

"मैं ख़ुद ही मेरा वंशज हूँ/ मैं ख़ुद ही मेरा वारिस हूँ।

एक स्थान पर उनका कथन तेज़ाबी तेवर लिए कह रहा है-

मेरे शब्द तलवार हैं/ बहते शब्द हैं कलरव करता पानी/ एक दूसरे के लिए परस्पर पूरक खड़ग –नदी की वाणी /

ऐसी वाकवाणी के जन्मदाता, श्री मोदी जी की क़लम के तेवर एक नया पैमाना सामने ला रहे हैं, और यही पैमाना न्याय का पक्षधर है। वे डंके की चोट पर अपने मनोभावों को प्रत्यक्ष रूप में कहने का मनोबल रखते हैं। जहाँ गुनाह, ज़ुल्म और नाइन्साफ़ी की दलदल देखते हैं, वहीं मानवता के हितों में कुछ करने की तमन्ना में, उन्हें उद्देश्यों को बचाने के लिए बीहड़ में गहरे उतरते हैं। क्योंकि चुप रहना, कुछ कर पाने की क्षमता रखते हुए कुछ न कर पाना उनकी नज़र में एक पाप है। उनकी बानगी के अंदाज़ देखिये—

"किसी की निंदा सुनना/ और चुप रहना पाप है सत्य बोल स्वीकार करे जो/ उसके सब गुनाह माफ़ हैं"

और उनके मन के संकल्प, भारत माँ के सीने से सब बोझ हटाकर उसे एक हँसता, खेलता, महकता चमन बनाने को आतुर कह उठते हैं -

"काँटों को चुन लिया, फूल का झीना गलीचा बिछाया/ सूखी इस धरती पर/ बीज दिया इंद्रधनुष/ पसीने का तिलक ढूँढता / है मेरा भाग्य ललाट ।

ये भारत के सेनानियों के वाक्य हैं। ये वो पल हैं जो उन्होने अपने सुखों को त्यागकर समस्त विश्व के शांतिपूर्ण विकास के लिए समर्पित किए हैं। हमारा राष्ट्र ध्वज एक आदर्श का प्रतिनिधित्व करता है और अपने रंगों से हमें दशा और दिशा दर्शाता है—

केसरिया-हिम्मत और त्याग/ श्वेत-सत्य और शांति / हरा-विश्वास और शौर्य

अल्लामा इक़बाल का अमर गीत :

सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलसिताँ हमारा

आज भी हौसलों में परवाज़ भर देता है। इसी ऊर्जा को क्रांतिमय शब्दों में मोदी जी की क़लम बयां करते हुए ऐलान करती है -

"वन्दे मातरम.... ये शब्द नहीं है/ यह मंत्र है हमारा / स्वतन्त्रता संग्राम की ऊर्जा का स्रोत अपना/ विकास का ये राजमार्ग है/ संकल्पित इस राष्ट्रजीवन का महामार्ग है/

आज हम फिर उसी राष्ट्रीय युग के नवनिर्माण के मोड़ पर खड़े हैं हम, जहाँ अपनी बात रखते हुए मोदी जी ने लिखा है-

"मेरी रचनाओं का यह नीड़/ आपको निमंत्रण देता है/ पल दो पल आराम लेने पधारो /मेरे इस नीड़ में/ आपको भाव जगत मिलेगा/

हैरानी हुई पढ़कर। ये कवितायें तो उनके प्रधान मंत्री बनने से पहले गुजराती भाषा में प्रकाशित हुईं। अब डॉ. अंजना संधीर के सार्थक प्रयासों से हिन्दी में अनुवाद स्वरूप हमारे सामने आया है। आभास होता है इन रचनाओं में हमारे भारतवर्ष की आन, बान, और शान के प्रतीकात्मक बिम्ब रचे बसे हैं।

आज़ादी के महयज्ञ की आहुति है ये / राष्ट्रभक्ति का सूत्रधार ये/ गणतंत्र के हृदयतंत्र का महामंत्र है ये/ विकास की निरंतर धड़कती / झुके नहीं ऐसी बेमिसाल पहचान रहे/

पठनीयता के इस मोड़ पर विषम और विचित्र नाम की कविता पर सोच ठिठक कर सवाल करती है- क्या प्रेम इतना विषम और विचित्र हो सकता है ? ऐसे कैसे हो सकता है कि एक फूल खिले और भँवरा गुंजन न करे?, घंटा बजे, और देवालय न खुले? दीपक जले, और मंदिर न जगमगाए? ऐसे कैसे हो सकता है?

नहीं हो सकता! एक विश्वास का दीपक झिलमिलाता है और मोदी जी की आँखों में निष्ठा भरा आत्मविश्वास कह उठता है –

मेरे देश को प्रेम करे / वो मेरा परमात्मा !

ये शब्द नहीं दस्तावेज़ है। संग्रह के आखिरी पन्ने पर शथप नुमाँ तहरीर, हर भारतवासी के लिए एक अनूठा मान-सम्मान व उपलब्द्धि के रूप में दस्तावेज़ है -

इन सभी सकारात्मक संभावनाओं के साथ "आँख ये धन्य है" कृति के साथ जुड़ी हुई हमारी आशाएँ उन अच्छे और ज़्यादा बेहतर कृतियों की उम्मीद में आँखें बिछाये हुए हैं। आमीन

समीक्षक: देवी नगरानी 
पता; ९-डी॰ कॉर्नर व्यू सोसाइटी, १५/ ३३ रोड, बांद्रा , मुंबई ४०००५० फ़ोन: 9987938358

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