अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

बंजर ज़मीं

दिल से मिलाये बिन भी दिल रहता कभी कभी,
दुश्मन भी बनके दोस्त है डसता कभी कभी।

इक जंग सी छिड़ी हुई इस उस के ख़्‍याल में,
कुछ सोच के गुमसुम ये मन रहता कभी कभी।

ये ख़्‍वाब ही तो ख़्‍वाब है, हाथों में रेत ज्यों,
बहकर ये अश्क आँखों से बहता कभी कभी।

रुख क्यों बदल रही है यूँ, मुझे देख ज़िन्दगी
इस बेरुखी को देख दिल जलता कभी कभी।

बंजर जमीन पर उगे काँटों भरी क्यारी,
उस बीच में गुलाब है पलता कभी कभी।

देता है ज़ख्म ख़ार तो देता महक गुलाब
फिर भी उसे है तोड़ना पड़ता कभी कभी।।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

 कहने लगे बच्चे कि
|

हम सोचते ही रह गये और दिन गुज़र गए। जो भी…

 तू न अमृत का पियाला दे हमें
|

तू न अमृत का पियाला दे हमें सिर्फ़ रोटी का…

 मिलने जुलने का इक बहाना हो
|

 मिलने जुलने का इक बहाना हो बरफ़ पिघले…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

उपलब्ध नहीं

उपलब्ध नहीं

लेखक की पुस्तकें

  1. ऐसा भी होता है
  2. और गंगा बहती रही
  3. चराग़े दिल
  4. दरिया–ए–दिल
  5. एक थका हुआ सच
  6. लौ दर्दे दिल की
  7. पंद्रह सिंधी कहानियाँ
  8. परछाईयों का जंगल
  9. प्रांत प्रांत की कहानियाँ
  10. माटी कहे कुम्भार से
  11. दरिया–ए–दिल
  12. पंद्रह सिंधी कहानियाँ
  13. एक थका हुआ सच
  14. प्रांत-प्रांत की कहानियाँ
  15. चराग़े-दिल

लेखक की अनूदित पुस्तकें

  1. एक थका हुआ सच