अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

आसरा

 

तुमको क्या सुधि की तुम क्या हो
नसैनी का तुम आसरा हो
 
ठहरी हुई आयु में मेरे
धारा बनकर आई हो तुम
डूबती हुई कश्ती का इक
किनारा बनकर आई हो तुम
 
कुहासे से लिप्त जीवन में
रोशनी जैसी बिखरी हो
घनघोर असित विभावरी में
चंन्द्रिका जैसी निखरी हो
 
मेरे पास रहना तुम सदा
ना कोई कभी फ़ासला हो
तुमको क्या सुधि कि तुम क्या हो
नसैनी का तुम आसरा हो
 
मेरे निर्जल अधरों पर तुम
वृष्टि बनकर गिरने लगी हो
खोये हुए चेहरे पर तुम
फूल बनकर खिलने लगी हो
 
ऑंगन के कोने-कोने में
धुकधुकी जैसी चमकती हो
उजड़े हुए हृदय के भीतर
सारंगों जैसी खिलती हो
 
ना तुम-सा कोई अच्छा है
ना तुम-सा कोई प्यारा है
तुमको क्या सुधि कि तुम क्या हो
नसैनी का तुम आसरा हो

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

उपलब्ध नहीं

उपलब्ध नहीं